चुनावी मुद्दा: क्या प्रदूषण पर किसी ने बात की ?

  • 11 मई 2019
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सरकारी और गैर-सरकारी, दोनों तरह की रिपोर्ट्स की मानें तो साल 2017 में प्रदूषण की वजह से देशभर में 12 लाख लोगों की मौत हुई थी. प्रदूषण भारतीय शहरों के लिए एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है.

भारत में चुनाव हो रहे हैं, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के लिए यह कोई चुनावी मुद्दा नहीं है. पिछले साल दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की वैश्विक सूची में कानपुर सबसे ऊपर था.

चुनावी मौसम है, देश भर में राजनीतिक पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए रैलियां कर रही हैं. कानपुर भी इससे अछूता नहीं है.

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दो पूर्व मुख्यमंत्री, अखिलेश और मायावती ने यहां रैली की, लेकिन इनमें से किसी ने भी प्रदूषण का मुद्दा नहीं उठाया.

ठंड के दिनों में प्रदूषण से जुड़ी ख़बरें मीडिया में खूब जगह पाती हैं. उत्तर भारत के कई शहरों के आसमान में धुंध की चादर और प्रदूषण की परत नज़र आती है. लोगों को सांस तक लेने में परेशानी होती है. लोग सुबह सैर करना बंद कर देते हैं.

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पिछले साल मई के महीने में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कानपुर को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया था. यह हवा में पीएम 2.5 की मात्रा पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के आधार पर कहा गया था.

पीएम 2.5 के कण इतने छोटे होते हैं कि वे फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं, जिससे लोगों को दिल और सांस से जुड़ी गंभीर बीमारी होने का ख़तरा रहता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक प्रति क्यूबिक मीटर हवा में पीएम 2.5 की 25 माइक्रोग्राम तक की मात्रा को सुरक्षित समझा जाता है. हालांकि भारतीय अधिकारी इसे 60 माइक्रोग्राम तक सुरक्षित मानते हैं. पिछले साल जब दुनिया के सबसे प्रदूषण शहरों की सूची तैयार की जा रही थी, तब कानपुर में पीएम 2.5 की मात्रा 173 माइक्रोग्राम थी.

आईआईटी कानपुर के इनवायरमेंटल इंजीनियर प्रोफेसर सच्चिदानंद त्रिपाठी कहते हैं कि इस सूची में सिर्फ कानपुर का ही नाम नहीं था.

वो कहते हैं, "शीर्ष 50 सबसे प्रदूषित शहरों में वाराणसी, लखनऊ और प्रयागराग सहित गंगा के किनारे बसे हुए 20 से अधिक शहरों के नाम थे. एक के बाद एक आंकड़े यह बता रहे हैं कि प्रदूषण एक बड़ी समस्या है और हवा की गुणवत्ता बहुत ख़राब है."

प्रोफेसर सच्चिदानंद त्रिपाठी वायु प्रदूषण की कई वजहें गिनाते हैं, जैसे निर्माण कार्य, धूल, उद्योग और वाहनों से निकलने वाले ज़हरीले धुएं, खेतों में जलाई जाने वाली पराली आदि.

वो कहते हैं, "ये भी हमारे शहरों की हवा को ज़हरीला बना रहे हैं, जिससे पीएम 2.5 और पीएम 10 की मात्रा बढ़ती जा रही है."

बढ़ रही है मरीज़ों की संख्या

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कानपुर के सबसे बड़े अस्पताल जीएसवीएस मेडिकल कॉलेज के फेफड़ा रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, "साल 2015 में हमने एक साल में 40 हज़ार मरीज़ों को देखा. पिछले साल यह संख्या बढ़कर 60 हज़ार हो गई. यहां आने वाले सभी मामले किसी न किसी तरह से प्रदूषण से जुड़े थे."

मरीज़ों की सबसे आम शिकायत सांस लेने में हो रही तकलीफ से जुड़ी होती है. गले में खराश, इंफेक्शन, छाती का भारी लगना और खांसी जैसी समस्याएं भी सुनने को मिलती हैं.

डॉ. आनंद बताते हैं कि उनके पास वे लोग ज़्यादा आते हैं जो खुले में काम करते है या रहते हैं, जैसे ट्रैफिक पुलिस, ड्राइवर, सफ़ाई कर्मी, सड़कों पर सामान बेचने और रहने वाले ग़रीब.

क्या हैं उपाय?

डॉ. आनंद कुमार के पास 50 साल के सेवा राम परिहार इलाज कराने आए हैं, जिन्हें दमा की बीमारी है.

वो एक रिक्शा चालक हैं और आठ-नौ साल से इसका इलाज करवा रहे हैं. पिछले एक महीने से उनकी हालत ज़्यादा ख़राब हो गई है.

डॉ. कुमार बताते हैं कि सड़कों पर लगातार रहने की वजह से उन्हें यह बीमारी हुई है.

डॉ. कुमार कहते हैं कि भारत में फेफड़ों के कैंसर के मरीज़ों की संख्या बढ़ रही है. पहले 55 साल से ऊपर वाले ही इस बीमारी के शिकार होते थे, अब 40 साल वाले भी इससे ग्रस्त हो रहे हैं. स्थिति तेज़ी से बिगड़ रही है.

कानपुर के मुख्य प्रदूषण अधिकारी घनश्याम मानते हैं कि प्रदूषण का स्तर बढ़ा है और यह चिंता का विषय है. लेकिन वो कहते हैं कि जब से कानपुर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची में नंबर एक पर आया है, तब से कई कदम उठाए गए हैं.

वो कहते हैं, "हमलोग कोशिश कर रहे हैं किसान पराली न जलाए. धूल पर नियंत्रण के लिए कई उपाय अपनाए गए हैं और गाड़ियों की प्रदूषण जांच की जा रही है."

कुंभ के दौरान कुछ राहत

जनवरी में सरकार ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की शुरुआत की थी, जिसका मकसद 100 शहरों को पांच सालों में साफ़ हवा मुहैया कराना है.

कार्यक्रम के लिए सरकार के सलाहकार प्रोफेसर त्रिपाठी कहते हैं कि पहले सोच थी कि पर्यावरण मुद्दे सतत विकास में बाधा डाल सकते हैं, लेकिन धीरे-धीरे ये सोच बदल रही है.

वो कहते हैं, "ये समझ आ चुका है कि ख़राब हवा इंसानी शरीर को नुकसान पहुंचाती है, इसलिए सरकार को इसे अपने एजेंडे में लाना पड़ा. लेकिन असली बदलाव लाने के लिए केंद्र सरकार, राज्य सरकार और शहरों को मिलकर काम करना होगा."

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गंगा को नुकसान

पर्यावरण कार्यकर्ता राकेश जायसवाल का कहना है कि प्रदूषण सिर्फ हवा में नहीं है. प्रदूषण ने भारत की सबसे पवित्र नदी, गंगा को भी नुकसान पहुंचाया है."

कानपुर एक औद्योगिक शहर है, जहां 40 लाख लोग रहते हैं. यहां चमड़ा उद्योग है, जहां जानवरों के चमड़े को उपयोग में लाने के लिए 400 से अधिक ट्रीटमेंट कारखाने हैं. यहां से बहुत सारी गंदगी निकलती है, जिसे गंगा में बहा दिया जाता है.

उन्होंने कहा, "शहर से हर दिन 43 करोड़ लीटर बेकार पानी निकलता है. जिसमें से सिर्फ 25 करोड़ लीटर को साफ़ करके नदियों में छोड़ा जाता है."

जनवरी में प्रयागराज में कुंभ मेले का आयोजन किया गया था, जिसमें क़रीब लाखों हिंदू श्रद्धालुओं ने गंगा में डुबकी लगाई थी. प्रयागराज कानपुर से लगभग 200 किलोमीटर दूर है.

इस दौरान सभी चमड़ा कारखाने बंद कर दिये गये थे, जिससे प्रदूषण का स्तर थोड़ा घटा था. लेकिन मार्च की शुरुआत में कुंभ के खत्म होने पर ये फिर से खोल दिए गए.

पिछले 30 सालों में गंगा की सफ़ाई पर 310 अरब रुपये खर्च किए गए हैं लेकिन यह पूरी तरफ साफ़ नहीं दिखती है. आज भी इसके कई हिस्से नाले की तरह दिखते हैं.

कानपुर में एक चुनावी सभा के दौरान मैंने रैली में शामिल कई लोगों से पूछा कि क्या प्रदूषण चुनावी मुद्दा होना चाहिए?

एक दिहाड़ी मज़दूर दुर्गा प्रसाद ने कहा कि उन्हें प्रदूषण के प्रभाव को लेकर चिंता है.

उन्होंने कहा, "इसका असर सब पर पड़ता है. अमीर, ग़रीब, मर्द, औरत और बच्चों पर. लेकिन किसी ने इसे मुद्दा नहीं बनाया और मैं आपको ये बता दूं कि कोई बनाएगा भी नहीं."

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