‘छोटे लालू’ तेजस्वी यादव पर क्यों हैं सब की निगाहें?

  • 10 मई 2019
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बिहार के राजनीतिक भूगोल में पटना की 10, सर्कुलर रोड स्थित कोठी की ख़ास अहमियत है.

जब से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद चारा घोटाले मामले में राँची में जेल की सज़ा काट रहे हैं, इस घर में उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उनके बेटे तेजस्वी यादव और छह बहनें रह रही हैं. लालू की सबसे बड़ी दो संतानें तेज प्रताप और मीसा भारती दूसरे घरों में रहते हैं.

तेजस्वी को मैंने पहली बार 2009 के आम चुनाव के दौरान देखा था जब बीबीसी टीम का ट्रेन क़ाफ़िला भारत के कई नगरों से होता हुआ पटना पहुंचा था और लालू ने पूरी बीबीसी टीम को अपने यहाँ चाय पर बुलाया था.

तब 19 साल के तेजस्वी हाथ में क्रिकेट के बल्ला लिए थोड़ी देर के लिए कमरे में दाख़िल हुए थे, लेकिन इससे पहले कि लालू उनका परिचय हमसे करवा पाते, वो वापस चले गए थे.

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व्हाट्सऐप पर शादी के संदेशों की भरमार

26 साल की उम्र में जब वो बिहार के उप मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने ये कहते हुए अपना मोबाइल नंबर सार्वजनिक कर दिया था कि इस पर लोग उन्हें अपने इलाक़े की ख़स्ता-हाल सड़कों और गड्ढ़ों का विवरण एसएमएस कर सकते हैं.

लेकिन कुछ ही दिनों में उनके पास 'व्हाट्सऐप' संदेशों की झड़ी लग गई, लेकिन उनमें से ज़्यादातर में टूटी हुई सड़कों का नहीं, बल्कि टूटे हुए दिलों का ज़िक्र था. पता नहीं कितनी युवतियों ने 26 साल के इस युवा को शादी का प्रस्ताव भेजा. वो उस समय और शायद इस समय भी बिहार के सब से 'एलिजिबल बैचलर' हैं.

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पहले उप मुख्यमंत्री, फिर नेता विपक्ष

भारत में कितने युवा राजनेता हैं जो मात्र 26 साल की उम्र में किसी राज्य के उप मुख्यमंत्री बनने की क़ाबिलियत रखते हों?

लेकिन राजनीति में सब कुछ स्थाई नहीं होता. कुछ ही समय बाद उन्हें अपने पद से हाथ गंवाना पड़ा लेकिन विपक्ष के नेता की अपनी नई भूमिका में भी तेजस्वी ने राजनीतिक पंडितों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा.

उनके पिता लालू प्रसद यादव ने अपनी आत्मकथा 'गोपालगंज टू रायसिना-माई पॉलिटिकल जर्नी' में लिखा, 'जिस तरह बिहार विधान सभा में 28 जुलाई, 2017 को उन्होंने नीतीश कुमार के विश्वास मत प्रस्ताव का विरोध करते हुए भाषण दिया, ये बताता है कि उनमें कितनी राजनीतिक प्रतिभा और दिव्य दृष्टि है.

उन्होंने नीतीश से पूछा, "आप तो संघ मुक्त भारत की बात किया करते थे, आप दोबारा उनकी शरण में कैसे चले गए? आपके उस कथन का क्या हुआ कि 'मिट्टी में मिल जाएंगे, बीजेपी में नहीं जाएंगे?' राष्ट्रीय जनता दल से चुनाव गठबंधन करने से पहले क्या आपको पता नहीं था कि लालू प्रसाद चारा घोटाला मामले में फंसे हुए हैं? आपने इस आधार पर गठबंधन से किनारा कर लिया कि मेरे और मेरे परिवार के ख़िलाफ़ एक जाँच एजेंसी ने एफ़आईआर दर्ज की है. क्या आप में अपने प्रधानमंत्री से ये कहने की हिम्मत है कि जिस भी शख़्स के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज कराई जाए, उसे वो अपने मंत्रिमंडल में न लें?"

तेजस्वी पर भी आरोप

तेजस्वी यादव को उस समय बहुत बड़ा राजनीतिक धक्का लगा जब चारा घोटाला मामले में सज़ा पाए उनके पिता को 14 साल की सज़ा सुनाए जाने के बाद राँची की बिरसा मुंडा जेल में भेज दिया गया.

दिलचस्प बात ये है कि तेजस्वी यादव पर भी आरोप लगे कि 2006 में लालू प्रसाद यादव के रेल मंत्री रहने के दौरान उन्होंने एक निजी होटल कंपनी को फ़ायदा पहुंचाने की ऐवज़ में रिश्वत ली थी. ये देखते हुए भी कि उस समय उनकी उम्र 15 साल की भी नहीं रही होगी, प्रवर्तन निदेशालय के लोग उनसे सवाल पूछने से बाज़ नहीं आए.

इसके जवाब में तेजस्वी कहते हैं, "ये तो शुक्र रहा कि मेरी शादी नहीं हुई है, वर्ना वो लोग मेरे सास-ससुर से भी सवाल-जवाब कर रहे होते."

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नीतिश को कहा 'पलटू चाचा'

कुछ लोग कह सकते हैं कि तेजस्वी यादव अपने असली रंग में अपने पिता के जेल जाने के बाद आए जब पार्टी के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी उनके सिर पर आ पड़ी.

जब तेजस्वी से ये सवाल पूछा गया तो उनका जवाब था, "मेरे पिता के जेल जाने ने नहीं बल्कि नीतीश कुमार की अवसरवादिता ने मुझे अपने असली रूप में आने के लिए मजबूर किया. जब मैं उप मुख्यमंत्री बना तो लोग कहा करते थे ये पहली बार चुनाव लड़ा, पहली बार डिप्टी सीएम बना. जो लोग मुझे नहीं जानते थे, वो सवाल उठाया करते थे कि मैं इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी कैसे उठा पाऊंगा?"

भारत के युवा नेताओं पर बहुचर्चित किताब 'कंटंडेर्स- हू विल लीड इंडिया टुमॉरो' लिखने वाली प्रिया सहगल लिखती हैं, "उप मुख्यमंत्री के तौर पर इतना नहीं, बल्कि बिहार विधानसभा के विपक्ष के नेता के तौर पर तेजस्वी ने राष्ट्रीय स्तर पर सबका ध्यान अपनी तरफ़ आकृष्ट किया है, उन्होंने जिस तरह से नीतीश को 'पलटू चाचा' संबोधित करते हुए उनकी राजनीति पर हमला बोला, उससे लोग प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके."

वो लिखती हैं, "काग़ज़ों पर सिर्फ़ सरसरी निगाह डाल कर 'एक्सटेंपोर' बोलते हुए तेजस्वी ने नाटकीय अंदाज़ में 'ट्रेज़री बेंच' के सदस्यों को 'बॉस' कह कर संबोधित किया."

जून 11, 2013 का ज़िक्र करते हुए तेजस्वी ने बीजेपी पर कटाक्ष किया, "इन साहब ने आपको उस तरह अपने मंत्रिमंडल से बाहर किया जिस तरह दूध से मक्खी को निकाला जाता है. उन्होंने न सिर्फ़ ये कहा बल्कि हाथ से ताली भी बजाई, जैसे वो मक्खी को मार रहे हों."

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उप चुनावों में दिलाई जीत

प्रिया सहगल आगे लिखती हैं, 'इस भाषण में लालू का पुट साफ़ दिखाई दे रहा था. ये अलग बात है कि उनमें लालू जैसी आक्रमकता नहीं थी. उस दिन लोगों को इस सवाल का जवाब मिल गया कि लालू ने अपने इस छोटे और अनुभवहीन बेटे को ही अपना उत्तराधिकारी क्यों चुना?'

'द वायर' के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वर्दराजन ने भी कहा, "इस भाषण के बाद लगा कि तेजस्वी पर महानता थोप दी गई हो. अगर आरजेडी अगला विधानसभा चुनाव जीतती है तो तेजस्वी यादव संभवत: किसी राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री होंगे."

मार्च और मई 2018 के बीच बिहार में चार उप चुनाव हुए. उनके नेतृत्व में ही उनकी पार्टी ने इनमें से तीन सीटें जीतीं. तब विजयी भाषण देते हुए तेजस्वी यादव ने सीधे नीतीश कुमार को संबोधित करते हुए कहा था, 'चाचा, लड़का अब लड़का नहीं रहा!'

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तेजस्वी बनाम तेज प्रताप

लालू और उनकी पत्नी राबड़ी के नौ बच्चों में से सात लड़कियां हैं, उनके बड़े भाई तेजप्रताप और बेटी मीसा राजनीति में हैं.

लेकिन जब पार्टी से उप मुख्यमंत्री चुनने की बात आई तो लालू ने इन सब में से तेजस्वी को चुना. मीसा को राष्ट्रीय स्तर पर राज्यसभा साँसद के तौर पर उतारा गया और तेज प्रताप को उसी सरकार में स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया जिसमें तेजस्वी उप मुख्यमंत्री थे.

ये उनके लिए एक तरह से साँत्वना पुरस्कार था जो उनकी माँ राबड़ी देवी की पैरवी से आया था. तेज प्रताप की आदत है हर सभा से पहले शंख बजाना. वो लालू की गंवई शैली की नक़ल करने की कोशिश करते हैं. वो अच्छे भाषण ज़रूर देते हैं, लेकिन उनमें 'पॉलिश' की कमी है. उनको गाड़ियों का शौक़ है. उनके गैरेज में चमकती हुई 'बीएम डब्ल्यू' और 'होंडा फ़ायरब्लेड सुपरबाइक' को देखा जा सकता है.

दोनों भाई जानते हैं कि भीड़ को किस तरह बाँध कर रखा जाता है. लेकिन आमने-सामने की बातचीत में छोटा भाई ज़्यादा व्यवहारिक नज़र आता है.

तेजप्रताप जहाँ बहुत धार्मिक हैं, तेजस्वी के लिए धर्म इतना महत्वपूर्ण नहीं है. वो अक्सर कहते सुने जाते हैं, ईश्वर तक पहुंचने की कुंजी मंदिर की घंटी नहीं, बल्कि अच्छे कर्म हैं. भगवान को भी दिखावा पसंद नहीं है.

हाल में तेजप्रताप ने बिना उनका नाम लिए तेजस्वी पर हमला बोला है. वो कहते है, "हमारे पिता लालू बहुत ऊर्जावान व्यक्ति थे. वो दिन में 10-12 चुनाव सभा किया करते थे. अब तो लोग 2-4 सभाओं में ही थक जाते हैं." उनका इशारा उनके छोटे भाई तेजस्वी यादव की तरफ़ था.

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दिल्ली डेयरडेविल की टीम में थे तेजस्वी

दिल्ली के डीपीएस आरके पुरम और वसंत विहार के छात्र रहे तेजस्वी ने सिर्फ़ कक्षा 9 तक पढ़ाई की है. हमेशा 'बैक-बेंचर' रहे तेजस्वी ने 'क्लास रूम' के बजाए खेल के मैदान को प्राथमिकता दी है. स्कूल छोड़ने के बाद उन्होंने अपना सारा ध्यान क्रिकेट खेलने की तरफ़ लगाया है.

वो कहते हैं, "मेरे अभिभावकों ने कभी मुझे कोई चीज़ करने के लिए मजबूर नहीं किया है, चाहे वो पढ़ाई हो या क्रिकेट. उन्होंने मुझे हमेशा सलाह दी है, जो करो मन से करो, दिल लगा के करो. मैं अंडर 15 टीम का दिल्ली का और अंडर 17 टीम का राष्ट्रीय कप्तान रहा हूँ. मैं अंडर 19 में भी उस टीम का हिस्सा रहा हूँ, जिसके कप्तान विराट कोहली हुआ करते थे."

तेजस्वी आईपीएल के पहले चार संस्करणों में दिल्ली डेयरडेविल टीम के सदस्य रहे हैं, लेकिन उन्हें एक भी मैच खेलने का मौक़ा नहीं मिला.

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लालू उनकी इस उपलब्धि से कभी प्रभावित नहीं दिखाई दिए. एक बार उन्होंने कहा भी था, "मेरा बेटा तेजस्वी दिल्ली की टीम का सदस्य है. लेकिन वो उससे मैदान के अंदर पानी ले जाने का ही काम करवाते हैं. उन्होंने उसे खेलने का मौक़ा नहीं दिया है."

तेजस्वी ने दो रणजी मैच भी खेले हैं लेकिन मांसपेशी में चोट लग जाने की वजह से उन्होंने अपने क्रिकेट जीवन को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.

जब लालू ने तेजस्वी को मीडिया के सामने किया पेश

तेजस्वी के राजनीति में आने की कहानी भी दिलचस्प है. एक सुबह जब उनके पिता पार्टी दफ़्तर में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने जा रहे थे तो तेजस्वी भी उनके साथ चले गए.

वो कहते हैं, "मैंने सोचा देखते हैं, क्या होता है पापा की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में. बहुत कम मौक़ा मिलता था मुझे अपने पापा के साथ समय बिताने का, क्योंकि मैं दिल्ली में रहता था और बहुत सफ़र किया करता था. उस कांफ़्रेंस में मीडिया मौजूद थी और मेरे पिता ने सबसे मेरा परिचय करवाया था."

लेकिन मीडिया में इसको इस तरह से प्रचारित किया गया जैसे लालू ने अपने बेटे को राजनीति में उतार दिया हो.

उस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में मौजूद एक पत्रकार बताते हैं कि "लालू ये बताने की कोशिश कर रहे थे कि उनके बेटे अनायास ही उस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पहुंच गए थे, लेकिन ये बाक़ायदा योजना बना कर हुआ था, क्योंकि तेजस्वी ने बहुत करीने की पैंट और कमीज़ पहन रखी थी और वो हमारे सवालों से तनिक भी विचलित नहीं हुए थे."

इसके बाद तेजस्वी ने पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करना शुरू कर दिया था. तेजस्वी कहते हैं, "जहाँ पापा नहीं जा पाते थे, उम्मीदवार मुझे चुनाव प्रचार के लिए बुलाते थे, क्योंकि उनको ये बताया गया था कि राजनीति में मेरा पदार्पण हो चुका है. मैंने भी सोचा चले जाते हैं. रणजी ट्रॉफ़ी का सत्र भी अभी ख़त्म हुआ था. मैंने सोचा कि अगर मेरे जाने से किसी की मदद हो जाती है तो क्यों न उनकी मदद की जाए."

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तेजस्वी और राहुल की दोस्ती

तेजस्वी का राहुल गाँधी के साथ अच्छा 'कनेक्ट' है. कुछ दिनों पहले दोनों को दिल्ली में डिफ़ेंस कॉलोनी के एक रेस्तराँ में साथ खाना खाते देखा गया था.

उत्तर प्रदेश के दो बड़े नेताओं अखिलेश यादव और जयंत चौधरी से भी उनकी अच्छी दोस्ती है. उनके पिता के वोट बैंक में भी अब तक कोई बड़ी सेंध लगती नहीं दिखाई दी है.

2015 के विधानसभा चुनाव में जब सब को पता था कि लालू यादव मुख्यमंत्री नहीं होंगे, तब भी राष्ट्रीय जनता दल को सबसे अधिक सीटें मिली थीं, जनता दल (यू) से भी अधिक.

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फ़र्क़ लालू और तेजस्वी की सोच का

जब तेजस्वी से उनकी उपलब्धियों के बारे में पूछा जाता है तो वो कहते हैं, "बिना भ्रष्टाचार का एक आरोप लगे मैंने बिहार में 18 महीनों में 5,000 किलोमीटर सड़कें बनवाई हैं. ये मेरा ही प्रस्ताव था कि ठेका दिए जाने की कोई भी फ़ाइल मंत्री के पास नहीं जाएगी."

प्रिया सहगल लिखती हैं, "मुझे एक चीज़ ने बहुत प्रभावित किया कि कोई शैक्षिक डिग्री न होते हुए भी तेजस्वी नए ज़माने के मुद्दों जैसे 'परफ़ॉरमेंस', वादों और छवि की बात करते हैं. मैं नहीं समझती कि उनके पिता लालू के लिए इन बातों का कोई महत्व होता. उनके लिए इससे ज़्यादा उनका वोट बैंक माने रखता था."

बिहार के एक बड़े बीजेपी नेता नाम न बताए जाने की शर्त पर कहते हैं, "नीतीश के महागठबंधन छोड़ने के बाद मैं कहूँगा कि तेजस्वी ने 10 के मापदंड पर अपने-आप को 3 से 7 तक पहुंचा दिया है. वो अपने पिता के जेल जाने और नीतीश के बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद ख़ाली हुई विपक्ष की जगह पर क़ाबिज़ होने में सफल रहे हैं. उन्होंने दिल्ली के 'लुटियंस मीडिया' से भी अच्छा राब्ता क़ायम किया है."

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नीतिश ने अड़ंगा लगाया था बिहार के विशेष दर्जे में

तेजस्वी अक्सर मीडिया से कहते सुने जाते हैं कि जब वो क्रिकेट खेलते हुए पूरा देश घूम रहे थे तो एक चीज़ ने उन्हें सबसे अधिक दुखी किया, वो थी बिहार की नकारात्मक छवि. लेकिन क्या इसके लिए उनके अभिभावकों लालू और राबड़ी को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए जिन्होंने पूरे 15 साल बिहार पर राज किया है?

तेजस्वी इसे मीडिया का 'प्रोपेगंडा' बताते हैं. वो कहते हैं, "जब मेरे पिता बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तो पटना के गांधी मैदान और रेलवे स्टेशन को गिरवी रखने की नौबत आ गई थी. मेरे पिता ने बिहार को उस मुसीबत से बाहर निकाला जिसमें जगन्नाथ मिश्रा ने उसे ला खड़ा किया था."

तेजस्वी कहते हैं, "पहले बिहार और झारखंड एक थे और सारे उद्योग दक्षिणी बिहार में थे जो झारखंड को चले गए. जब राज्य का विभाजन हुआ तो मेरी माँ ने उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से बिहार को विशेष दर्जा दिए जाने की माँग की थी. नीतीश तब केंद्रीय मंत्री थे. उन्होंने उस माँग का इस आधार पर विरोध किया था कि इसका सारा श्रेय राबड़ी और लालू को मिल जाएगा."

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तेजस्वी की चुनौतियाँ

तेजस्वी अपने-आप को एक धर्म-निरपेक्ष और विकास के समर्थक नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं. बीजेपी पर हमला करते हुए वो उसे सांप्रदायिक मुद्दों और नौकरियाँ पैदा न कर पाने के मुद्दों पर आड़े हाथों लेते हैं. नरेंद्र मोदी के इस कथन पर कि 'पकौड़े बेचना भी एक तरह का रोज़गार है,' तेजस्वी कहते हैं, "अगर 2 करोड़ लोग पकौड़े तलेंगे, तो उन्हें खाएगा कौन?"

सक्रिय राजनीति में बहुत कम समय बिताने के बावजूद तेजस्वी की उपलब्धियों की कमी नहीं है. लेकिन अभी उनकी असली परीक्षा होनी बाक़ी है. उनकी सबसे बड़ी चुनौती है अपने दल के लोगों को अपने साथ रखना, संगठन को मज़बूत बनाना और राष्ट्रीय जनता दल के आधार को यादवों और मुस्लिम के वोट बैंक से आगे ले जाना. परिवार के अंदर मचे घमासान की ख़बरें बाहर आने से भी पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराया ही है.

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तेजस्वी के कुछ फ़ैसलों पर सवाल

लोकसभा चुनाव 2019 के चुनावी मैदान से संकेत आ रहे हैं कि उपेंद्र कुशवाहा से हुए चुनावी गठबंधन में औरंगाबाद को छोड़ कर कुशवाहा वोट गठबंधन को स्थानांतरित नहीं हो रहे हैं. कई सीटों पर सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध उम्मीदवार न चुनने का ख़ामियाज़ा भी तेजस्वी को भुगतना पड़ रहा है.

टिकट न मिलने से ख़फ़ा राजद के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अली अशरफ़ फ़ातमी ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर मधुबनी से अपना पर्चा दाख़िल कर दिया था. हालांकि बाद में उन्होंने नामांकन वापिस ले लिया था. जानकारों का कहना है कि आपसी लड़ाई, दलबदल और ख़राब फ़ैसलों ने कम से कम पाँच सीटों मोतिहारी, शिवहर, मधुबनी, दरभंगा और सुपौल पर महागठबंधन को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. मोतीहारी और शिवहर में अभी चुनाव होना बाक़ी है लेकिन बाक़ी तीन सीटों पर चुनाव हो चुके हैं.

देखना ये है कि पहले से ही अनुभवहीनता का तमग़ा झेल रहे तेजस्वी यादव आगामी चुनाव में इनसे पार पा पाते हैं या नहीं. इसका फ़ैसला बहुत हद तक 23 मई को नतीजों के साथ ही होगा.

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