बिहार के लाखों शिक्षक नीतीश सरकार से क्यों हुए नाराज़

  • 11 मई 2019
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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

"10 मई, 1857 ही वह दिन था जब अंग्रेजों ने भारत के पहले स्वतंत्रता आंदोलन को कुचल कर रख दिया था. सालों बाद 10 मई का ही दिन है, जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को हम लोगों के सपनों और उम्मीदों को कुचल कर रखने की अनुमति दे दी है."

बिहार के पूर्वी चंपारण के मध्य विद्यालय, केसरिया के समायोजति शिक्षक ओम प्रकाश सिंह की यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के बाद देखने को मिली है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने बिहार हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें समायोजित शिक्षकों को समान काम के लिए समान वेतन देने का प्रावधान किया गया था.

दरअसल, बिहार के स्कूलों में तैनात समायोजित शिक्षक, काम के आधार पर शिक्षकों जितना वेतन की मांग बीते दस सालों से कर रहे हैं, बीते साल उनकी मांग पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीन अक्टूबर, 2018 को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.

पूर्वी चंपारण के ही मध्यक्रम विद्यालय बबनोलिया के शिक्षक रूमित रोशन बताते हैं, "हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा है, सुप्रीम कोर्ट ने अब तक की सुनवाई में इस तरह का साथ दिया था कि हमें ऐसा लगता था कि वे हमारे वकीलों से भी ज्यादा बेहतर कर रहे हैं, वे राज्य सरकार के वकीलों से पूछते थे कि आप लोग एक चपरासी से कम पैसा शिक्षकों को कैसे दे सकते हैं. बावजूद इसके हम सब सुप्रीम कोर्ट ने हमारी समस्याओं के हल का फैसला क्यों नहीं दिया, ये समझ नहीं पा रहा हूं."

एक अन्य शिक्षक सुबोध कुमार कहते हैं- एक समान काम के लिए समान वेतन हमारा संवैधानिक अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट भी हम लोगों के अधिकार की मांग को नहीं मान रहा है. सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में समान काम के बदले में समान वेतन लागू करा चुका है..ऐसी स्थिति में निराशा के अलावा अभी हमलोग कर ही क्या सकते हैं.

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कौन हैं ये शिक्षक

दरअसल, ये शिक्षक कौन हैं और आम शिक्षकों के मुकाबले में इन्हें कितना कम वेतन मिलता है, ये सवाल आपके जेहन में भी कौंध रहा होगा.

बिहार में 2003 से सरकारी स्कूलों में शिक्षा मित्र रखे जाने का फैसला किया गया था, उस वक्त में दसवीं और बारहवीं में प्राप्त अंकों के आधार पर इन शिक्षकों को 11 महीने के अनुबंध पर रखा गया था. इन्हें मासिक 1500 रुपये का वेतन दिया जा रहा था. फिर धीरे धीरे उनका अनुबंध भी बढ़ता रहा और उनकी आमदनी भी बढ़ती रही.

2006 में इन शिक्षा मित्रों को नियोजित शिक्षक के तौर पर मान्यता मिली. मौजूदा समय में इन नियोजित शिक्षकों में प्राइमरी टीचरों को 22 हजार से 25 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते हैं, वहीं माध्यमिक शिक्षकों को 22 से 29 हजार रुपये मिलते हैं, हाई स्कूलों के ऐसे शिक्षकों को 22 से 30 हजार रुपये मिलते हैं.

बिहार पंचायत नगर प्राथमिक शिक्षक संघ के मुताबिक बिहार में मौजूदा समय में तीन लाख 73 हजार समायोजित शिक्षक हैं, जिन्हें अपने काम के हिसाब से वेतन नहीं मिल रहा है.

इनमें 2011 में शिक्षा के अधिकार के तहत राज्यस्तरीय परीक्षा के बाद तैनात किए गए करीब 80 हजार शिक्षक भी शामिल हैं, जिन्हें भी नियुक्ति के बदले समायोजित किया गया था. इन शिक्षकों की तुलना में नियुक्ति के आधार पर तैनात शिक्षकों का वेतन 60 से 70 हजार रुपये के करीब है.

Image caption शिक्षक सज्जाद अली का मानना है कि नियोजित शिक्षक बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहे हैं

फ़ैसले से कितना नुकसान

पूर्वी चंपारण में तैनात एक अन्य शिक्षक सज्जाद अली बताते हैं, "बिहार सरकार बंधुआ मजदूरों की तरह काम ले रही है, हमलोग काम कर रहे हैं लेकिन हमारा हक नहीं मिल रहा है. सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ने के लिए हमलोगों ने काफी पैसा खर्च किया, इसलिए हमलोग काफी आहत हैं.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से इन शिक्षकों का कितना नुकसान हो रहा है, इसको बताते हुए अररिया जिले के मध्य विद्यालय खादर डुमरिया में तैनात शिक्षक निखिल कुमार बताते हैं, "मैं और मेरी पत्नी दोनों शिक्षक हैं, आप समझिए कि हमारा तो महीने में साठ-सत्तर हजार का सीधा-सीधा नुकसान हो गया है."

निखिल की पत्नी सपना कुमारी अररिया के ही मध्य विद्यालय चकला में शिक्षिका हैं, वो कहती हैं, "मासिक नुकसान तो होइए रहा है, हमारा दिसंबर, 2009 से एरियर भी मिलना था, वह एरियर भी एक एक शिक्षक का सात-आठ लाख रुपया बन रहा था."

इन शिक्षकों ने 2009 से बिहार में अपनी लड़ाई समान वेतन पाने के लिए शुरू की थी, कई चरणों की लड़ाई के बाद शिक्षकों के पक्ष में हाईकोर्ट का फ़ैसला आया था.

Image caption राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के प्रांत अध्यक्ष रजनीश कुमार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर संदेह जता रहे हैं

अगले दो चरण के मतदान होंगे प्रभावित

बिहार पंचायत नगर प्राथमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष पूरण कुमार कहते हैं कि 31 अक्टूबर, 2017 को हम लोगों के पक्ष में फैसला आया था, जिसके खिलाफ बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर दी थी. शिक्षक संघों ने इस एसएलपी पर कैविएट लगाने के लिए अपील की थी, जिसमें हमारे पक्ष में फैसला नहीं हुआ.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के प्रांत अध्यक्ष रजनीश कुमार कहते हैं, "हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इतना अंतर तो अमूमन होता नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है, वो 136 पन्नों का फैसला है, उसे देखना होगा लेकिन जो बात उभर कर सामने आ रही है, वह संदेहास्पद है. ऐसा लगता है कि न्यायपालिका भी कार्यपालिका से प्रभावित हो रही है."

पूर्वी चंपारण के एक अन्य शिक्षक रंजीत कुमार के मुताबिक इस पूरे मामले में बिहार की नीतीश कुमार सरकार की भूमिका ने उन्हें सबसे ज्यादा निराश किया है. रंजीत कुमार कहते हैं- हाईकोर्ट ने तो हमलोगों के पक्ष में फैसला दिया ही था, नीतीश कुमार की सरकार ही उसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गई है.

उनके मुताबिक ये फ़ैसला अगर चुनाव से पहले आ जाता तो बिहार में एनडीए गठबंधन को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता, हालांकि वे ये भी दावा करते हैं कि बाकी के दो चरण के मतदान में शिक्षक एनडीए गठबंधन का विरोध करेंगे.

अररिया जिले के निखिल कुमार कहते हैं, "ये करीब साढ़े तीन लाख शिक्षकों का मामला नहीं है, बल्कि यह साढ़े तीन लाख परिवारों का सवाल है."

Image caption शिक्षक ओम प्रकाश सिंह सरकार की नीयत पर संदेह जताते हैं

बिहार सरकार इस मामले में संसाधनों की कमी का हवाला देती आई है, जिस पर शिक्षक ओम प्रकाश सिंह कहते हैं, "ये सब बहाना है, बताइए आप एक दिन के लिए भी चुनाव जीत जाएं तो जीवन पर पेंशन पाते हैं, हम लोग जीवन पर खप जाएं तो पेंशन छोड़िए हमारा अपना पैसा सरकार नहीं देना चाहती है."

शिक्षकों की नीतीश सरकार की नाराजगी पर जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं, "शिक्षकों को ये भी देखना चाहिए कि नीतीश कुमार की सरकार ने ही बेरोजगारी के दलदल से निकाल कर इन्हें रोजगार दिया है. सीमित संसाधनों के बावजूद भी समय समय उनका मानदेय बढ़ाया जाता रहा है. अब सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है वह सभी पक्षों को मान्य होना चाहिए."

सियासी नुकसान

राजीव रंजन भी समझते हैं कि चुनाव का वक्त है और इसका नुकसान उनकी पार्टी और गठबंधन को हो सकता है, लिहाजा इस मुद्दे पर बहुत ज्यादा बात करने से बचते हैं.

मोटे तौर पर आंकलन है कि अगर बिहार सरकार हाईकोर्ट के फैसले को स्वीकार कर लेती तो उसे इन शिक्षकों के मद के लिए सालाना एक हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ता. शिक्षकों की मांग है ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं है क्योंकि शिक्षकों को लगता है कि अभी भी शिक्षा के कई क्षेत्रों का बजट पूरा खर्च नहीं हो पाता और शिक्षा के क्षेत्र में बजट भी बढ़ाया जाना चाहिए.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन शिक्षकों के सामने आगे का रास्ता क्या होगा.

बिहार में शिक्षकों के एक दूसरे संघ टीईटी-एसटीई शिक्षक संघ के अध्यक्ष मार्केंडय पाठक कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के फैसले में हम हारे जरूर हैं लेकिन हमारा मनोबल टूटा नहीं है. हम सड़क पर उतर कर संघर्ष करेंगे और नीतीश कुमार की सरकार को झुकने पर मजबूर कर देंगे."

उल्लेखनीय है कि मौजूदा नियोजित शिक्षकों को जो वेतन मिल रहा है, वह भी इन शिक्षकों ने 41 दिनों के हड़ताल के बाद हासिल किया था. 2015 विधानसभा चुनाव से पहले इन शिक्षकों राज्य के 74000 स्कूलों में हड़ताल कर दिया था.

इसके बाद राज्य सरकार ने एक नए तरह के वेतनमान निर्धारित कर इन लोगों का वेतन बढ़ाया था. मौजूदा शिक्षकों को लग रहा है कि राज्य सरकार ने तब भी इनके साथ छल किया था और आज भी कर रही है.

संघर्ष के अलावा इस मुद्दे पर बिहार के शिक्षक संघ कानूनी विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं और उनके सामने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ फिर से पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की रूपरेखा पर काम कर रहे हैं.

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