योगी का गोरखपुरः बुनकरों की सुध लेने वाला कोई नहीं- लोकसभा चुनाव 2019

  • 16 मई 2019
गोरखपुर में योगी का मठ

योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक कर्मभूमि गोरखपुर में घूमते हुए कई स्तरों पर विकास दिखता है.

यहां चिड़ियाघर और फर्टिलाइज़र कारखाना निर्माणाधीन है. एम्स में इलाज शुरू हो चुका है और इसके परिसर में नई इमारतों का निर्माण चल रहा है. रामगढ़ ताल के किनारे सुंदरीकरण करके 'नौका विहार' की व्यवस्था कर दी गई है.

लेकिन इस शहर का 'पावर सेंटर' कहे जाने वाले गोरखनाथ मठ से सटे इलाक़ों में बुनकर परिवारों की स्थिति 'चिराग़ तले अंधेरा' वाली ही बनी हुई है.

मठ के आस-पास का इलाक़ा भी गोरखनाथ ही कहलाता है. इसमें पुराना गोरखपुर, रसूलपुर, दशहरी बाग, नौरंगाबाद, जाहिदाबाद और जमुनइयाबाग़ के इलाक़े आते हैं.

यहां रहने वाली ज़्यादातर आबादी पिछड़े मुस्लिम बुनकरों की है. लेकिन बुनकरों के काम में अब वैसी बरक़त न रहने से कई परिवारों ने अपना पुश्तैनी कारोबार छोड़कर आमदनी की वैकल्पिक व्यवस्थाएं कर ली हैं.

जो लोग पूंजी न होने से इस कारोबार से नहीं निकल पाए, वे अब तक परेशान हैं.

गोरखनाथ में जिन बुनकरों से बातचीत हुई, उनकी शिकायत ये है कि भाजपा की अगुवाई वाली प्रदेश और केंद्र सरकार ही नहीं, उससे पूर्ववर्ती 'सेक्युलर' कही जाने वाली प्रदेश और केंद्र सरकार ने भी उनकी सुध नहीं ली.

कब से शुरू हुई समस्या

गोरखपुर का ये इलाक़ा हैंडलूम के लिए मशहूर था और बुनकरों की हर ज़रूरत इस काम से पूरी हो जाती थी. लेकिन अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में बुनकरों के बुरे दिन शुरू हुए जब कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने प्रदेश का हैंडलूम कॉरपोरेशन बंद कर दिया.

यह कॉरपोरेशन सीधे बुनकरों का माल ख़रीदता था. साथ ही उन्हें सस्ते दामों पर कपास उपलब्ध कराता था.

गोरखपुर के पत्रकार मनोज सिंह बताते हैं, "हैंडलूम कॉरपोरेशन के होने से बुनकरों को सरकार का सहारा था. लेकिन सरकार ने उसे बंद करके अपने हाथ वापस खींच लिए और बुनकरों को बाज़ार के हवाले कर दिया."

इस घटना के बाद धड़ाधड़ हैंडलूम कारखाने बंद होने लगे. पेशे से दांतों के डॉक्टर मोहम्मद इमरान ख़ान भी ऐसे ही एक परिवार से हैं. वो बताते हैं, "मेरे पिता ने भी उसी समय ये काम छोड़ दिया और बच्चों की पढ़ाई को तवज्जो दी."

इमरान बताते हैं कि उनके पिता के बड़े भाई ने चार-पांच साल पहले ही अपने बीस पावरलूम बेचे हैं और अपने बेटों को दुकानें खुलवा दी हैं.

वो कहते हैं, "हम लोग वहां से बाहर निकल गए, लेकिन हर कोई ऐसा नहीं कर पाया."

समस्या आख़िर है क्या?

गोरखनाथ के इस इलाक़े में लोगों ने अपने घरों में ही छोटे-छोटे कारखाने बनाए हुए हैं. एक कारखाने में छह से लेकर 15-20 तक पावरलूम हैं जिनके ज़रिये धागे को कपड़े में तब्दील किया जाता है.

क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि ये बुनकर, विक्रेता नहीं बल्कि मज़दूर की तरह काम करते हैं. नब्बे के दशक के बाद बुनकर उद्योग की बुरी हालत का फ़ायदा मारवाड़ी महाजनों ने उठाया और इस व्यवसाय को उन्होंने अपने नियंत्रण में ले लिया.

अब बुनकरों को काम का ऑर्डर और कपास या धागा महाजनों से मिलता है, जिस पर प्रति मीटर के हिसाब से उन्हें बिनाई की मज़दूरी मिलती है.

यहां मिले ओबैद-उर-रहमान ने इस समस्या का अर्थशास्त्र समझाया. उन्होंने बताया कि 1995 में उन्हें 5.10 रुपये प्रति मीटर की बुनाई मिलती थी. तब महंगाई कम थी. जबकि आज उन्हें प्रति मीटर बुनाई के सिर्फ 4.10 रुपये मिलते हैं. उसमें से भी 1.90 रुपये वे उनके यहां काम करने वाले कारीगर को दे देते हैं.

वो कहते हैं, "आज मैं 80 हज़ार में पावरलूम ख़रीदूं और फिर उसे बेचना चाहूं तो बीस-बाइस हज़ार से ज़्यादा कोई नहीं देता. इससे आप इस धंधे की हालत का अंदाज़ा लगा लीजिए."

हम यहां पहुंचे तो इस गली में सिर्फ एक कारख़ाने से पावरलूम चलने का शोर आ रहा था, बाक़ी बंद थे.

बुनकरों के लिए पावरलूम संख्या के हिसाब से बिजली के रेट फिक्स किए गए हैं, लेकिन काम मंदा होने पर ये पावरलूम उनके लिए हाथी पालने की तरह हो गए हैं.

अपनी पावरलूम मशीनों के पास आराम करते मिले अशफ़ाक अंसारी ने बताया, "मुलायम सिंह सरकार के समय हमारे लिए सस्ती बिजली की व्यवस्था की गई थी. आज हम प्रति पावरलूम 143 रुपये महीना बिजली का बिल देते हैं. काम मिलता रहे तो ये ज़्यादा नहीं है. लेकिन समस्या ये है कि फरवरी-मार्च में मुझे काम नहीं मिला फिर भी मुझे 16 पावरलूम का बिजली का बिल देना पड़ा."

बुनकरों का कहना है कि बिजली के फिक्स्ड रेट का सबसे ज़्यादा फ़ायदा समृद्ध महाजनों ने उठाया. बिजली लोड की लिमिट ज़्यादा होने की वजह से उन्होंने एक ही जगह पर सौ-सौ पावरलूम के कारखाने बना लिए और बुनकरों को मज़दूरी पर रखकर दो-दो शिफ़्ट में काम कराने लगे.

इस तरह बुनकरों पर उनकी निर्भरता कम होती चली गई और दूर-दराज़ जो बचे-खुचे बाज़ार थे, वहां से भी बुनकरों का असर कम होता गया.

एक समस्या धागे की क़ीमत की है. पहले इन लोगों को हैंडलूम कॉरपोरेशन से सस्ता और अच्छा कपास मिल जाता था जिसे कातकर वे धागा बनाते थे. लेकिन अब कपास और धागे दोनों के दामों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है और मुनाफ़ा कम हुआ है.

28 साल के अशफ़ाक बताते हैं कि उनके सामने धागे की क़ीमत 100 रुपये से बढ़कर 250 रुपये प्रति किलो हो गई. वो बताते हैं कि अगर किसी के पास छह पावरलूम हैं तो औसतन हर महीने वह चार-पांच हज़ार रुपये कमा पाता है.

वह कहते हैं, "असल समस्या तो उनके लिए है जिनके पास एक-दो पावरलूम हैं. ऐसे कई लोग अब सब्ज़ी और फल बेचने का काम करने लगे हैं."

क्या हैंमांगें?

इन बुनकरों की मांगें दो स्तरों पर हैं. पहला, बुनकरों की प्रति मीटर मज़दूरी बढ़ाई जाए. दूसरा, सरकार ऐसे प्रोत्साहन कार्यक्रम चलाए कि बुनकर किसी महाजन के दिए ठेके पर काम न करें बल्कि ख़ुद अपना माल बेच पाएं.

शफ़ीक-उर-रहमान कहते हैं कि उन्हें सबसे पहले एक बाज़ार की ज़रूरत है. असल समस्या ये है कि कोई ख़रीदने वाला नहीं है जबकि महाजनों की पहुंच दूसरे प्रदेशों के बाज़ारों तक है.

अशफ़ाक के पास एक सुझाव है. वह कहते हैं कि सरकार अगर सरकारी स्कूलों में बच्चों की वर्दी के लिए इस्तेमाल होने वाले कपड़ा हमसे ख़रीदने लगे तो बुनकरों की हालत सुधर सकती है.

वो कहते हैं कि अगर इस पर जल्दी कुछ नहीं किया गया तो बुनकरों की पीढ़ियां मज़दूरी करती रह जाएंगी.

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ओबैद अचानक भावुक होकर कहते हैं, "मैं आपको बता रहा हूं कि हमारे मज़हब में अगर ख़ुदकुशी हराम न होती तो जाने कितने लोग अपनी जान ले चुके होते. "

लेकिन क्या वे इन मांगों को लेकर महज़ दो सौ मीटर दूर स्थित मठ में योगी आदित्यनाथ के पास गए?

ओबैद-उर-रहमान कहते हैं, "हम लोगों ने कई बार मिलने की कोशिश की, लेकिन उनकी दिलचस्पी ही नहीं रहती. शायद बिचौलिए बात को आगे नहीं बढ़ने देते."

अशफ़ाक कहते हैं कि जब से उन्होंने होश संभाला है कभी योगी आदित्यनाथ को जाहिदाबाद की इन गलियों में नहीं देखा. वो कहते हैं, "वो यहां वोट मांगने भी नहीं आते."

अशफ़ाक बताते हैं कि झगड़े-लड़ाई का कोई मामला हो तो योगी के जनता दरबार में उनकी सुनवाई हो जाया करती थी. लेकिन बुनकरों की समस्या को अलग से कभी नहीं सुना गया.

राजनीतिक दलों का पक्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद ऐलान किया था कि बुनकरों की मदद के लिए उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर में दिवालिया हो गए सहकारी बैंकों को 2375 करोड़ रुपये के पैकेज से पुनर्जीवित किया जाएगा. लेकिन इस पैकेज से कौन मज़बूत हुआ, ये गोरखपुर के बुनकर नहीं जानते.

हमने भाजपा और सपा के ज़िलाध्यक्षों से बात की तो वे भी गोरखनाथ इलाक़े के बुनकरों की मदद के लिए कोई विशेष योजना नहीं बता सके.

बल्कि यूं लगा कि भाजपा ज़िलाध्यक्ष जनार्दन तिवारी इसे एक कारोबारी समस्या के बजाय, एक मज़हबी समस्या के तौर पर देखते हैं.

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उन्होंने कहा, "बीजेपी सबका साथ, सबका विकास के लक्ष्य पर चलती है, इसलिए अलग से किसी जाति या धर्म के लिए काम करने का क्या अर्थ है. "

वो कहते हैं कि बुनकर अगर मानें तो उनके दो बड़े फायदे तो यही हुए कि आज उन्हें 22 से 24 घंटे बिजली मिल रही है. दूसरा, मुद्रा योजना के तहत कोई भी पचास हज़ार से पांच लाख रुपये तक का लोन ले सकता है. उनके मुताबिक, "अगर बुनकर ये बात स्वीकार करें तो उन्हें विकास ही विकास दिखेगा."

वहीं सपा ज़िलाध्यक्ष प्रहलाद यादव से जब बात हुई तो वे अखिलेश सरकार की प्रदेश स्तर की योजनाओं को गिनाने लगे.

उन्होंने कहा, "बुनकरों के लिए सबसे ज़्यादा काम हमने ही अपने कार्यकाल में किया था. हमने बिजली सस्ती की. उनके लिए सहकारिता को बढ़ावा दिया. उनके बच्चों को लैपटॉप दिया और उनकी बच्चियों को तीस हज़ार रुपये दिए."

लेकिन बुनकरों का कहना है कि न मोदी की मुद्रा योजना उन्हें बचा सकती है और न अखिलेश का लैपटॉप. उन्हें अपने लिए एक बाज़ार की ज़रूरत है और सरकार अगर बाज़ार नहीं खड़ा कर सकती तो वो ख़ुद ख़रीदार बने.

हर दल से निराशा है तो फिर वोट किसे देंगे?

ये पूछने पर ओबैद थोड़ा रुके और फिर कहा, "क़ायदे से तो इस चुनाव में हमें किसी को वोट नहीं देना चाहिए. लेकिन ज़ेहनियत यही बनी है कि मोदी को हटाना है तो उसे वोट दें जो उन्हें हरा सके. तो इस बार भी वही होगा, जो हर बार होता है."

अशफ़ाक ने कहा कि बनारस के बुनकर कम से कम साड़ियां और चादर तो बुनते हैं. यहां तो हम सिर्फ़ टेरीकॉट का कपड़ा बुनते रह जाते हैं.

इसके बाद उन्होंने एक पावरलूम चलाकर दिखाया तो पास में सो रहे कारीगर की लंबी नींद अचानक टूट गई और वह देर तक इस रिपोर्टर के माइक को देखता रहा.

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