हेमंत सोरेन: दिल्ली की पॉलिटिक्स रांची आकर रास्ता भूल जाती है

  • 17 मई 2019
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"भारत के पॉलिटिकल सिस्टम में आदिवासियों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है. मेनस्ट्रीम की पॉलिटिक्स में हमारी बात उस तरीके से नहीं सुनी जाती है, जैसे दूसरे बड़े वर्ग के राजनेताओं की. यही वजह है जो नरेंद्र मोदी सरकार में आदिवासी मंत्रियों की मौजूदगी के बावजूद उनका कोई महत्व नहीं है. वे डिसिजन मेकिंग में शामिल नहीं हैं या फिर उन्हें शामिल ही नहीं होने दिया गया है. चाहे जुएल उरांव हों या फिर सुदर्शन भगत, वे रबर स्टांप बन कर रह गए हैं. यह आज की राजनीति का सबसे स्याह सच है. यह अनुचित है. ऐसा नहीं होना चाहिए. यह व्यवस्था ठीक करनी पड़ेगी."

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यह बात बीबीसी से विशेष साक्षात्कार के दौरान कही.

वे यहां की प्रमुख विपक्षी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के कार्यकारी अध्यक्ष हैं और झारखंड की सबसे बड़ी राजनीतिक शख्सियत शिबू सोरेन के राजनीतिक वारिस भी.

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Image caption शिबू सोरेन

उनके पिता शिबू सोरेन तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे. हेमंत सोरेन खुद भी झारखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं. उनकी भाभी सीता सोरेन विधायक हैं. उनकी बहन अंजलि ओडिशा से लोकसभा का चुनाव लड़ रही हैं और उनके दिवंगत भाई दुर्गा सोरेन भी विधायक रह चुके हैं.

मौजूदा लोकसभा चुनाव में विपक्षी पार्टियों का महागठबंधन उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ रहा है.

कुछ महीने बाद होने वाले झारखंड विधानसभा चुनाव में वे महागठबंधन के मुख्यमंत्री प्रत्याशी होंगे.

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दिल्ली की राजनीति से ख़फ़ा क्यों सोरेन?

विपक्षी पार्टियां यह घोषणा कर चुकी हैं. इस महागठबंधन में जेएमएम के साथ झारखंड विकास मोर्चा, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल भी शामिल है.

फिर भी उन्हें ऐसा क्यों लगता है.

इस सवाल का जवाब देते हुए हेमंत सोरेन कहते हैं कि इसके कई कारण हैं. दिल्ली के रायसीना हिल्स की पॉलिटिक्स रांची के पहाड़ पर आकर रास्ता भूल जाती है.

उन्होंने कहा कि न केवल आदिवासी, बल्कि दलितों और वंचित समुदाय से निकले हुए तमाम राजनेता यह भेदभाव झेलते हैं, पिछले पांच साल के भाजपा शासन के दौरान यह स्थिति और विकराल हुई है.

हेमंत सोरेन ने बीबीसी से कहा, "अगर आप संसद या विधानसभाओं में भागीदारी देखें, तो अधिकतर आदिवासी या दलित सासंद उन जगहों से चुनकर आए मिलेंगे, जो सीटें इनके लिए आरक्षित कर दी गई हैं. सामान्य सीटों पर तो कोई आदिवासियों को टिकट ही नहीं देता. अगर भूले-भटके टिकट मिल भी गया, तो बड़े लोग उन्हें चुनाव नही जीतने देते. अब तो भाजपा की ही यूपी की दलित सासंद (सावित्री भाई फूले) यह सवाल उठा रही हैं. इससे आप देश की हालत समझ सकते हैं."

दलितों के घर खाना 'भाजपा की नौटंकी'

उन्होंने कहा, "भाजपा नेताओं ने पिछले साल दलितों के घर जाकर भोजन करने की 'नौटंकी' की. जबकि, सच यह है कि उन नेताओं के खाने में लगने वाला नमक तक बाहर से खरीद कर भेजा गया. यह ढोंग है. भाजपा ने बड़ी बेशर्मी से दलितों को इस्तेमाल करने की कोशिश की."

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हेमंत सोरेन बताते हैं, "अगर इतनी ही हमदर्दी थी, तो भाजपा के बड़े नेताओं को इन दलितों के घर खाने के बजाय इन्हें अपने घर बुलाकर खाना खिलाना चाहिए था. अपने पत्नियों और बच्चों से मिलवाना चाहिए था. दरअसल, इनके दो चेहरे हैं. जो बाहर दिखता है, वह अंदर नहीं है."

हेमंत सोरेन ने यह भी कहा, "पहले चीजें छिपी रहती थीं, अब यह क्लियर कट बाहर दिखता है. यह भेदभाव अब सीधे दिखने लगा है. मेनस्ट्रीम में वंचित कम्युनिटी के लोग राष्ट्रीय स्तर पर है ही नहीं. इक्का-दुक्का जो लोग हैं भी वे निरीह बने हुए हैं. उनके पास कोई ताकत नहीं है. लेकिन, मौजूदा राजनीतिक दौर ट्रांजिशन फ़ेज में है. इसलिए हम बेहतरी की उम्मीद रख सकते हैं."

उन्होंने कहा, "आज भी रुढ़िवादी ताकतें काम कर रही हैं. वे वहां सक्रिय हैं, जहां आदिवासियों, दलितों गरीबों और वंचित समुदाय को रोकने का कुचक्र रचा जाता है. वहां कई तरह के बैरियर हैं. अगर आप सिर्फ फेस बना कर अधिकार देने की बात करेंगे, तो यह सफल नहीं हो पाएगा."

हेमंत सोरेन ने कहा, "मुझे गर्व है कि मैं हेमंत सोरेन हूं, लेकिन हेमंत पांडेय का भी सम्मान करता हूं. लेकिन, दूसरे तरफ से क्या सोच आती है, आगे का रिश्ता इस पर निर्भर करता है."

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