लोकसभा चुनाव 2019 - ग़ाज़ीपुर में कितने मज़बूत हैं अफ़ज़ाल अंसारी

  • 15 मई 2019
अफ़ज़ाल अंसारी

उत्तर प्रदेश की ग़ाज़ीपुर लोकसभा सीट इस बार कई वजहों से चर्चा में है. यहां से केंद्र सरकार में रेलवे और दूरसंचार जैसे अहम मंत्रालयों के राज्य मंत्री मनोज सिन्हा सांसद हैं.

यह सीट इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ख़ुद मनोज सिन्हा के नामांकन में उनके साथ रहे.

2014 में नरेंद्र मोदी की लहर में मनोज सिन्हा यहां से महज़ 33 हज़ार वोटों के अंतर से जीते थे. इस बार उनका मुक़ाबला हाथी के निशान पर सपा-बसपा गठबंधन से लड़ रहे अफ़ज़ाल अंसारी से है.

अफ़ज़ाल उसी अंसारी परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं जिसका पूर्वांचल के इस इलाक़े में मज़बूत असर माना जाता है.

अफ़ज़ाल अंसारी के छोटे भाई मुख़्तार अंसारी बाहुबली कहे जाते हैं और 2017 विधानसभा चुनाव में वह जेल में रहते हुए पड़ोस की मऊ विधानसभा से विधायक चुने गए थे.

ख़बरें यह भी रहीं कि 2017 विधानसभा चुनाव में अंसारी परिवार अपने क़ौमी एकता दल का सपा में विलय चाहता था लेकिन मुख़्तार अंसारी की दाग़ी छवि की वजह से अखिलेश यादव इस पर तैयार नहीं हुए.

इसके बाद अंसारी बंधुओं को बसपा प्रमुख मायावती ने अपना लिया.

लेकिन इस बार सपा-बसपा गठबंधन से अंसारी परिवार के लिए भी हालात बदले हैं. 13 मई को ही अखिलेश यादव ने ग़ाज़ीपुर में रैली करके अफ़ज़ाल अंसारी का प्रचार किया.

अफ़ज़ाल अंसारी ग़ाज़ीपुर से एक बार साल 2004 में मनोज सिन्हा को पटखनी दे चुके हैं. इस बार वोटरों का गणित उनके पक्ष में माना जा रहा है.

ग़ाज़ीपुर के लोहिया भवन स्थित चुनाव कार्यालय पर जब हमारी उनसे मुलाक़ात हुई तो वो एक राष्ट्रीय चैनल को एक लंबा इंटरव्यू देकर उठे थे.

हमने उनसे संसदीय क्षेत्र के साथ-साथ, अंसारी परिवार की राजनीति, अखिलेश यादव की पुरानी नाराज़गी और हिंदुत्व की सियासत समेत तमाम मुद्दों पर बात की.

पढ़िए अफ़जाल अंसारी से बातचीत

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पिछली बार मनोज सिन्हा सिर्फ़ 33 हज़ार वोटों से जीत पाए थे. तब कई उम्मीदवार उनके सामने थे. इस बार गणित आपके पक्ष में तो लग रहा है पर मनोज सिन्हा कह रहे हैं कि चुनाव गणित नहीं होता, केमिस्ट्री होती है. तो केमिस्ट्री क्या है?

उनकी केमिस्ट्री वो बता सकते हैं. मैं इस सिलसिले में सिर्फ़ ये कह सकता हूं कि ग़ाज़ीपुर की लोकसभा के लिए ना मनोज सिन्हा का चेहरा नया है, न अफ़ज़ाल अंसारी का चेहरा नया है. एक बात हुई है जिससे उनका मनोबल बढ़ा हुआ है. पिछले लोकसभा चुनाव में पहली बार ग़ाज़ीपुर के चुने हुए सांसद को देश की सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल होने का मौक़ा मिला.

लेकिन मनोज सिन्हा की यहां एक विकास पुरुष जैसी छवि भाजपा की ओर से प्रचारित की जाती है. आपकी क्या राय है?

मनोज सिन्हा नौ बार संसद का चुनाव लड़ चुके हैं. वह 96 में पहली बार जीते और फिर 99 में जीते. उसके बाद वह 2014 में जीते. उसके पहले कई बार जीत से ज़्यादा हार ग़ाज़ीपुर की जनता उनके ख़ाते में लिख चुकी है.

भाजपा का जो प्रचार यहां है, उसकी एक लाइन है कि प्रगतिशील ग़ाज़ीपुर चाहिए या ज्वलनशील ग़ाज़ीपुर. ऐसा क्यों है कि आपकी छवि के साथ ज्वलनशील जैसा शब्द नत्थी कर दिया गया है?

उनके नारे पर आपकी कृपा है. मीडिया की कृपा है. आप उनके नारे की हेडिंग बनाएंगे. उनका नारा और उस नारे पर जनता का रिस्पॉन्स क्या है...

बीबीसी ने उनके किसी नारे की हेडिंग नहीं बनाई. मैं आपसे ये समझना चाह रहा हूं कि उनके इस नारे पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

मेरी क्या हैसियत है कि मैं उनके नारे की परिभाषा बताऊं.

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आप चाहें तो तार्किक आधार पर उसकी आलोचना कर सकते हैं

क्यों करें? उस पर निर्णय देगी ग़ाज़ीपुर की जनता जो कॉपी जांचने का अधिकार रखती है. वो 19 तारीख़ को कॉपी जांचेगी और नतीजा 23 को देगी. तो विकास पुरुष सच बोलता था या विकास पुरुष ने ढोंग रचा था विकास का, ये सामने आएगा.

विकास पुरुष के सामने कुछ सवाल हैं जो आपकी हेडिंग नहीं बनेंगे. ग़ाज़ीपुर जनपद में नंदगंज में शराब का कारख़ाना चलेगा लेकिन वहां शुगर मिल नहीं चलेगी. ग़ाज़ीपुर में बड़ौरा सूती कताई मिल 1985 में स्थापित हुई थी, जब मैं विधायक हुआ था. वो मिल बंद पड़ी है.

हम विकास पुरुष हैं. हम केंद्र सरकार के हिस्सेदार हैं. संचार मंत्रालय इनके पास हैं. राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह इनका पर्चा भरवाता है. मोदी के आंखों के तारे ये हैं. रेल राज्य मंत्रालय इनके पास है.

पर रेलवे में तो काम हुआ है यहां

बता तो रहे हैं कि भारत में रेलवे की लाइन अंग्रेज़ों ने बिछाया था. भारतवर्ष में रेलवे अंग्रेजों की देन है तो क्या अंग्रेजों की सरकार फिर से बनाएंगे? सरकार का व्यवहार क्या है जनता के प्रति. रेल प्लेटफार्म बना हुआ है, रेल चल रही है आपने बस रोगन लगा दिया है. आप टिकट कराइए. आज आठ सौ का मिलेगा और चार दिन बाद करेंगे तो बारह सौ का मिलेगा. ये सौदागरी है जनता के साथ.

वो एक आरोप आप पर और लगाते हैं....

मैं उन पर कोई आरोप नहीं लगाता. मैं उनके हर आरोप के आगे सरेंडर करता हूं. मैं उनके आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे सकता. इसलिए कि वो जिस स्थिति में हैं, मैं समझ सकता हूं कि जो डिप्रेशन में होता है, वो क्या करता है.

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वो कहते हैं कि आप डरा धमका कर लोगों से वोट लेते हैं.

हां मुझे नज़रबंद करा दो आज ही. सरकार तुम्हारी है और देखो गणना करा लेना.

आपके राजनीतिक गुरु कॉमरेड सरयू पांडे के बेटे भी सीपीआई से आपके ख़िलाफ चुनाव लड़ रहे हैं.

वो पार्टी का फ़ैसला है, हम दोनों में आज भी भाई की तरह रिश्ते हैं. आमने-सामने एक दूसरे को गले लगाते हैं.

आपकी राजनीतिक विचारधारा समझना चाहता हूं, क्योंकि थोड़ी सी अस्पष्टता उसमें होने लगी है. सीपीआई से आपने राजनीति शुरू की. फिर आप सपा-बसपा दोनों पार्टियों में रहे. अपना अलग दल भी बनाया. अब फिर बसपा में है. विचारधारा के स्तर पर ये तो अलग-अलग पार्टियां हैं.

किसी को आकलन करना है तो इतिहास भूगोल को जानना ज़रूरी है. इस समाजसेवा और राजनीति की शुरुआत मैं नहीं कर रहा हूं. मेरे पूर्वजों ने देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ी है. पूर्वजों के ज़माने से हमें ये विरासत मिली है.

आज़ादी के बाद से हमने देश के निर्माण में हर तरह का योगदान किया है. जब हमने कम्युनिस्ट पार्टी से शुरुआत की तो हारी-बेगारी के सवाल पर. उस समय मज़दूरों से बेगारी कराई जाती थी और मज़दूरी नहीं दी जाती थी.

उस समय चालीस बोझ कटिया करने के बाद मज़दूर के खाते में एक बोझ अनाज जाता था. तब से हम आंदोलन कर रहे हैं. आज 12 बोझ कटिया के बाद एक बोझ अनाज असंगठित क्षेत्र के मज़दूर के खाते में जाता है. तो हमने ज़मीन से राजनीति की है.

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Image caption अफ़ज़ाल अंसारी के नाना और दादा की तस्वीरें

ये समझना चाहता हूं कि आज भी आप भीतर से वामपंथी विचारधारा से क़रीबी महसूस करते हैं?

मेरे अंदर की वो विचारधारा जिसमें ग़रीब, कमज़ोर और मजबूर का साथ दिया जाए, वो कभी नहीं मरी और कभी नहीं मरेगी.

आप उसे कोई नाम नहीं देना चाहते? समाजवादी हैं, बहुजनवादी हैं या वामपंथी हैँ?

नाम क्यों नहीं. सपा का सिद्धांत क्या है. लोहिया जी ने यही चाहा था कि समाज के हर अंतिम व्यक्ति के होंठों पर मुस्कान हो. मुलायम सिंह का यही नारा था कि पानी उसे मिले, जो प्यासा हो.

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने एक दर्शन पर आधारित समाज बनाया. मान्यवर कांशीराम ने पिछड़े समाज के लोगों को संगठित किया. उस अधूरे मिशन को मायावती जी पूरा करने के लिए आगे बढ़ रही हैं.

सपा और बसपा के गठबंधन की ज़रूरत देश को थी. आज संविधान ख़तरे में था. आज मोदी और संघ के लोग बाबासाहब आंबेडकर के संविधान को दरकिनार करना चाहते हैं.

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2017 विधानसभा चुनाव का ज़िक्र बार-बार होता है. कहते हैं कि अंसारी परिवार ने मुलायम सिंह यादव परिवार में फूट डलवा दी. मुलायम सिंह चाहते थे कि अंसारी बंधुओं की पार्टी का सपा में विलय हो जाए, लेकिन मुख़्तार अंसारी की बाहुबली छवि की वजह से अखिलेश यादव ने ऐसा नहीं होने दिया.

ये कौन कहता है? ये बात आप लोग चलाते हैं. मीडिया के लोग चलाते हैं.

आप कह रहे हैं कि क़ौमी एकता दल का विलय सपा में नहीं होने वाला था? आप कह रहे हैं कि अखिलेश यादव कभी अंसारी परिवार से नाराज़ नहीं थे?

अखिलेश यादव मेरे घर, मेरे छोटे भाई तन्नू की शादी में, घर के अंदर परिवार में बैठ चुका है. मेरे घर में बीवी-बच्चों के साथ भोजन कर चुका है. हम परिवार जैसे हैं.

आप उनकी कहानी क्यों नहीं पढ़ते कि आज मार्गदर्शक मंडल के लाल कृष्ण आडवाणी जिन्होंने जीवनदान दिया मोदी जी को. मिज़ाज बना लिया था अटल बिहारी वाजपेयी जी ने गुजरात दंगों के बाद.

लेकिन आडवाणी जी मोदी जी की ढाल बनकर खड़े हुए और क्या हश्र हो गया आज आडवाणी जी का. क्या हश्र हो गया आज मुरली मनोहर जोशी का.

ठीक है, वो हम आडवाणी जी से बात करेंगे तो पूछेंगे. अभी मैं अफ़ज़ाल अंसारी से बात करता हूं. अभी अखिलेश यादव से आपके रिश्ते कैसे हैँ?

हमारे रिश्ते ऐसे हैं कि अखिलेश यादव कल ग़ाज़ीपुर में लाखों जनता के बीच में मेरे लिए वोट मांगकर गए. हमारे और उनके बीच के रिश्ते के तार बीजेपी और आपको पहले पता चलते हैं. आप जितना आलोचना करेंगे...

Image caption अफ़ज़ाल अंसारी अपने भतीजे अब्बास अंसारी के साथ

हमारा तो काम है हर ख़बर पर बात करना.

आप जितनी झूठी ख़बरें बनाएंगे उतना हमारा रिश्ता मज़बूत होगा.

हम कोई झूठी ख़बरें नहीं बना रहे. कम से कम बीबीसी संवाददाता के तौर पर आपके इस आरोप को मैं स्वीकार नहीं करूंगा.

आप मत करिए. मैं बीबीसी पर आरोप नहीं लगा रहा हूं. यहां की जो मीडिया, कॉरपोरेट घरानों की मीडिया है, वो उन्हीं लोगों के हाथों में खेलने वाली मीडिया है. यहां अखिलेश यादव का कार्यक्रम थोड़े ना होना था. वो तो आप लोगों ने इतना छाप दिया कि हमें कहना पड़ा कि यहां भी एक कार्यक्रम दे दीजिए.

सपा कार्यकर्ता पूरे मन से लगा है आपके साथ?

सपा और बसपा का कार्यकर्ता ऐसे मिल गया जैसे पानी में पानी मिलता है. न कोई लकीर होती है और न उसके जोड़ में कोई दरार होती है. 23 तारीख़ को गणना के समय इसका मुज़ाहिरा आपको पता लगेगा.

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एक सवाल और बार-बार उभरता है कि आपके छोटे भाई मुख़्तार अंसारी और आपकी राजनीति का स्टाइल अलग-अलग है. उन्होंने दबंगों की राजनीति को अपनाया और आपने जन नेता की छवि बनाई. इसे 'गुड कॉप, बैड कॉप' रणनीति कहते हैं.

वर्तमान हिंदुस्तान में एक नेता का नाम बताइए जो जेल में रहने के बाद भी तीन बार जनता का प्यार पाने में सफल रहा हो. आप उसे जेल में बंद रखते हैं. मुक़दमा उसका ग़ाज़ीपुर में, उसे भेज देंगे झांसी, उसे भेज देंगे आगरा. लेकिन क्या वजह है कि जनता उसको प्यार करती है, उसको वोट देती है. एक आदमी बता दीजिए जिसको जेल में रहने पर इतना प्यार मिलता हो.

योगी बाबा को नेताजी ने सात दिनों के लिए भेजा था जेल में तो पार्लियामेंट में खड़े होकर रोने लगे थे. और इस बार तो आपने सुना, अखिलेश जी ने कहा कि ये हमारी टोंटी खोजवा रहे थे, मौक़ा आएगा तो हम भी प्रेस वालों को ले जाकर उनकी चिलम खोजवाएंगे.

ये तो आपका आरोप है, इसका कोई तथ्य हम पेश नहीं कर सकते. मेरा सवाल ये था कि बार-बार ये बात होती है कि राजनीति में दाग़ी लोग कम होने चाहिए. इसका क्या मतलब आप समझते हैं. क्या राजनीति संभव ही नहीं है मुक़दमों के बिना?

आप देश के सारे न्यायालयों को ख़त्म कर दीजिए और ये अधिकार पुलिस को दे दीजिए कि किसी पर मुक़दमा हो गया तो उसका करियर ख़त्म. हमारे या मुख़्तार अंसारी के ख़िलाफ़ किसी न्यायालय ने दोष ठहराया हो तो आप जो चाहे कहो.

आरोप के स्तर पर जेल अमित शाह गए, योगी गए. ये अपना मुक़दमा अपने आप उठा लेते हैं और फिर पाक साफ़ हो जाते हैं. हमारे मुक़दमे छूट भी जाते हैं तो हम गंदे हो जाते हैं. आप हमको अपराधी और बाहुबली कहते हैं?

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एक सवाल राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा पूछना चाहता हूं. बीते चार-पांच साल से हिंदुत्व की राजनीति का उभार हुआ. लेकिन जवाब में कांग्रेस के बारे में भी कहा गया कि उन्होंने सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति को अपनाया. अखिलेश यादव ने कहा कि मैं नवरात्र में झूठ न बोलने की कसम खाता हूं क्या ऐसी कसम भाजपा नेता खा सकते हैं. ममता बनर्जी ने एक इंटरव्यू में कहा कि राम पर भाजपा का हक़ नहीं है. आपको लगता है कि सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति क्या ज़रूरी है या क्या यह भाजपा की पिच पर खेलना है?

जिस बिंदु पर सपा या बसपा के राष्ट्रीय नेताओं की टिप्पणी आ चुकी है, उस पर हम कोई कमेंट नहीं करना चाहते.

सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति पर आपकी कोई राय तो होगी?

हमारी राय है कमेरा हिंदू बनाम लुटेरा हिंदू. एक कमाने वाला है और एक लूटने वाला. विजय माल्या, नीरव मोदी, ललित मोदी, मेहुल चौकसी. समस्या यहां है.

नेताओं को मंदिरों में जाना चाहिए या नहीं, इतना बता दीजिए?

ये हम कौन हैं बताने वाले. आस्था का सवाल है. जिसका मन भरता है उसे जाना चाहिए. लेकिन ये ज़रूर है कि आप किसी दूसरे की आस्था को ठेस पहुंचाएं तो ग़लत है. हमारा संविधान इजाज़त देता है कि आप किसी भी धार्मिक पद्धति को मानिए. लेकिन मनुवादी सोच के लोग आरएसएस के माध्यम से नफ़रत की बात थोपना चाहते हैं.

आख़िरी सवाल, किसे भारत का अगला प्रधानमंत्री बनना चाहिए?

मैं समझता हूं कि हालात ऐसे बन रहे हैं और ज़रूरत है इस देश को बहुत ही ठोस निर्णय लेने वाला. तो बहन कुमारी मायावती से और अच्छा नहीं दिखाई पड़ता. वो प्रधानमंत्री बनीं तो ये लोग जेल जाएंगे.

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