कर्नाटक: कॉलेज में छात्राओं के लिए कट ऑफ़ छात्रों से अधिक

  • 18 मई 2019
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आमतौर पर शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए जारी होने वाली कट ऑफ़ विषय के अनुसार या फिर आरक्षण के मुताबिक़ तय की जाती है, लेकिन कर्नाटक की राजधानी बैंगलुरू में एक निजी कॉलेज में प्रवेश के लिए जारी की गई कट ऑफ़ में छात्राओं के साथ भेदभाव का मामला सामने आया है.

यहाँ 11वीं क्लास में एडमिशन के लिए लड़कियों के लिए कट ऑफ़ लड़कों के मुक़ाबले अधिक रखी गई है. यानी जितने नंबर पर किसी छात्र का एडमिशन हो रहा है, छात्रा का एडमिशन उससे अधिक अंक पर.

विज्ञान जैसे विषय में कट ऑफ़ तो हैरान करने वाली है और ये 95 प्रतिशत को भी पार कर गई है.

ऐसा करने वाला यह है क्राइस्ट जूनियर कॉलेज, जो क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के तहत आता है. क्राइस्ट यूनिवर्सिटी को 'डीम्ड' का दर्जा हासिल है. क्राइस्ट जूनियर कॉलेज ने विज्ञान, कॉमर्स और आर्ट में लड़कियों के लिए कट ऑफ़ फ़िक्स कर दिया है.

विज्ञान वर्ग में ये लड़कों के मुक़ाबले एक फ़ीसदी अधिक, कॉमर्स वर्ग में ये 0.4 फ़ीसदी अधिक और आर्ट में ये 4.7 फ़ीसदी अधिक है.

यूनिवर्सिटी का तर्क है कि लड़के-लड़कियों की संख्या में संतुलन के लिए ऐसा क़दम उठाया गया है.

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विश्वविद्यालय के तर्क

विश्वविद्यालय के कुलपति फ़ादर अब्राहम वीएम ने बीबीसी हिंदी को बताया कि छात्र-छात्राओं के बीच संतुलन बनाए रखने का यह यूनिवर्सिटी का अपना तरीक़ा है.

उन्होंने कहा, "हमारा कॉलेज 1969 में शुरू हुआ था और तब यहाँ सिर्फ़ छात्रों को प्रवेश दिया जाता था. 1978 में बोर्ड ने छात्राओं को भी प्रवेश की इजाज़त दी और हमने ये सुनिश्चित किया है कि कॉलेज परिसर में छात्राओं की संख्या 50 फ़ीसदी से अधिक न हो. ये सिर्फ़ छात्राओं का कॉलेज नहीं है, इसलिए हम कट ऑफ़ के ज़रिये इस कोटा को कायम रखना चाहते हैं."

उन्होंने कहा कि कट ऑफ़ सिर्फ़ कुछ ऐसे पाठ्यक्रमों के लिए लागू की गई है, जिनकी बहुत अधिक मांग है. अब्राहम ने कहा, "हमें प्रवेश के लिए 70 हज़ार से अधिक आवेदन मिले हैं, इसलिए हमने ये (कट ऑफ़ की) कसौटी रखी है."

वर्तमान में यूनिवर्सिटी में लड़कों की संख्या 50.2 प्रतिशत और छात्राओं की तादाद 49.2 प्रतिशत है.

लेकिन पुराने छात्रों और शिक्षाविदों ने यूनिवर्सिटी के इस क़दम पर नाराज़गी जताई है. यूनिवर्सिटी की एक पुरानी छात्रा दीपिका अरविंद का कहना है कि निजी विश्वविद्यालय का ये फ़ैसला क़ानून के सामने नहीं टिकेगा.

उन्होंने कहा, "ये तो लगभग ऐसा है कि अच्छा प्रदर्शन करने के लिए लड़कियों को दंडित किया जा रहा है. अगर लड़के अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो ऐसा भेदभाव नहीं है. "

2006-07 में कॉलेज से पास हुई एक और छात्रा ने कहा, "मैं समझती हूँ कि ये लड़कियों को कॉलेज से बाहर रखने का एक तरीक़ा है. सिर्फ़ एक ही विकल्प है कि लड़कों के लिए भी एक जैसी कट ऑफ़ रखी जाए. सिर्फ़ लड़कों के लिए ही क्यों तर्क गढ़े जा रहे हैं."

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ड्रेस कोड

एक छात्रा ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा, "मैं इस कॉलेज में कभी भी सहज नहीं रही और इसकी वजह ये थी कि वहाँ लड़कियों के लिए ड्रेस कोड तय किया गया था कि वे सिर्फ़ सलवार सूट ही पहन सकती हैं. अगर सलवार सूट ज़रा सा भी तंग हुआ तो टीचर आपकी तरफ़ देखते थे और पूछते थे कि ऐसी ड्रेस क्यों पहनी है. हम पर लगातार निगरानी रखी जाती थी."

लेकिन, बैंगलोर यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति डॉक्टर एमएस थिमप्पा ने बीबीसी हिंदी से कहा, "ऐसे पाँच-छह और दूसरे संस्थान भी हैं जिनमें इसी तरह की नीति है. मैं उनके नाम तो नहीं ले सकती. लेकिन अलग स्तर पर अस्थाई तौर पर कुछ साल के लिए इस तरह के क़दम उठाने को लेकर मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है."

थिमप्पा ने कहा, "ऐसे क़दमों से लड़कों की पढ़ाई बेहतर होने में मदद मिलती है. ये प्रतिस्पर्धा का दौर है और इस तरह के संस्थानों में लड़कों को लड़कियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए अतिरिक्त कोचिंग की ज़रूरत होगी."

बैंगलोर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफ़ेसर एस जफेट कहते हैं, "कट ऑफ़ तो अभी से उलट होनी चाहिए थी. यूनेस्को के मुताबिक़ भारत में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले कम है. अगर आप इसे कम भेदभावपूर्ण बनाना चाहते हैं तो आपको ये सुनिश्चित करना चाहिए कि छात्र और छात्राओं की कट-ऑफ़ पर्सेंटेज एक समान हो."

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कॉलेज के एक पूर्व छात्र ने अपनी पहचान ज़ाहिर न करने की शर्त पर कहा, "छात्र-छात्राओं का संतुलन रखने का यूनिवर्सिटी का तर्क अजीब है. जब पहले वहाँ लड़कियां एडमिशन के लिए कम संख्या में जाती थीं, तो क्या उनके लिए अधिक सीटें रखी गई थीं."

एक पूर्व प्रधानाचार्य के.ई राधाकृष्ण कहते हैं, "बहुत से कॉलेज लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों को इसलिए तरजीह देते हैं क्योंकि वो अधिक परिश्रमी होती हैं, और संस्था के लिए अच्छे परिणाम देती हैं. वे पढ़ाई में लड़कों के मुकाबले अधिक फोकस्ड होती हैं. कट ऑफ़ का ये नियम क़ानून सम्मत नहीं है और लैंगिक समानता के ख़िलाफ़ है."

यूनिवर्सिटी के रजिसट्रार एलेक्स पिंटो ने बीबीसी हिंदी से कहा, "शुरुआती सालों में हमने लड़कियों के लिए कम कट ऑफ़ रखी थी. इसे आप भेदभावपूर्ण नहीं कह सकते. हम यूजीसी द्वारा दी गई नियामक स्वतंत्रता के आधार पर काम कर रहे हैं. हमें राज्य सरकार नहीं चलाती है, हम निजी संस्थान हैं. यह शिक्षा के लिए हमारा एक नज़रिया है."

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