छत्तीसगढ़ में अब क्यों हो रही हैं आदिवासियों की महापंचायतें?

  • 22 मई 2019
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छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित दंतेवाड़ा में सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ आदिवासी एकजुट हो रहे हैं. अपनी मांगों को लेकर आदिवासी हर दिन बैठकें कर रहे हैं. इन बैठकों में एक के बाद एक गांव और पंचायत जुड़ते जा रहे हैं.

अब तक कम से कम 17 पंचायतों के आदिवासी दो बड़ी बैठकें कर चुके हैं.

आदिवासियों की मांग है कि उनके इलाक़े से सुरक्षाबलों को हटाया जाए और सुरक्षाबलों के नए कैंप स्थापित न किए जाएं.

आदिवासी इसके लिए अपने-अपने ग्राम पंचायतों में विशेष ग्राम सभा करने की भी तैयारी कर रहे हैं.

आदिवासियों का दावा है कि सरकार द्वारा घोषित आदिवासी बहुल पांचवीं अनुसूची के इलाके में पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया यानी पेसा क़ानून लागू है और इन पंचायतों में ग्राम सभा की अनुमति के बिना कोई भी काम नहीं किया जा सकता है.

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वहीं पुलिस का कहना है कि सुरक्षाबलों की कार्रवाई से घबराए माओवादी नहीं चाहते कि उनके प्रभावक्षेत्र वाले इलाके में किसी भी स्थिति में सुरक्षाबलों की उपस्थिति दर्ज़ हो. यही कारण है कि वे गांव वालों को ढाल की तरह उपयोग कर रहे हैं.

छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान के डीआईजी सुंदरराज पी ने बीबीसी से कहा, "हक़ीकत तो ये है कि कई जगह आदिवासी अपने-अपने इलाकों में सुरक्षाबलों के स्थायी कैंप या थाने की मांग करते रहते हैं. अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे माओवादियों के पास कोई चारा नहीं बचा है तो अब वे गांव वालों को सामने कर के माओवादियों के ख़िलाफ़ सुरक्षाबलों के अभियान को रोकने की असफल कोशिश में जुटे हुए हैं."

मारपीट का विरोध

सुरक्षा बलों के विरोध की कार्रवाई इस महीने सुरक्षाबलों और संदिग्ध माओवादियों के बीच हुई एक कथित मुठभेड़ की घटना के बाद शुरू हुई.

8 मई को पुलिस ने दावा किया कि दंतेवाड़ा और सुकमा ज़िले की सीमा पर स्थित गोंडेरास में एक मुठभेड़ में दो माओवादी मारे गए हैं.

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हालांकि माओवादियों ने एक बयान जारी कर इसे फर्ज़ी मुठभेड़ करार दिया था. लेकिन ग्रामीण इस मुठभेड़ की बहस में नहीं उलझना चाहते.

गोंडेरास गांव के एक आदिवासी ने कहा, "पुलिस माओवादियों को मारे, हमें क्या? लेकिन इस घटना के बाद पुलिस के जवान हमारे घरों में घुस आए और सभी गांव वालों को माओवादी समर्थक बता कर पीटना शुरु किया. 30 से अधिक लोगों को बुरी तरह से मारा गया."

इसके बाद गांव वाले एकत्र हुए और इस मारपीट का विरोध करना शुरु किया. विरोध की इस प्रक्रिया में एक-एक कर दूसरी पंचायतों के सरपंच और गांवों के लोग भी जुड़ते चले गए.

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पंचायतों ने अधिकारियों और मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर वनोपज की क़ीमत बढ़ाने, गांवों से हटाए गए छात्रावास, स्कूल और अस्पतालों को फिर से उसी ग्राम पंचायत में संचालित करने की मांग रखी है. इसके अलावा पंचायतवार ऐसे लोगों की सूची उपलब्ध कराने की मांग की गई है, जिनके ख़िलाफ़ पुलिस ने स्थायी वारंट जारी किया हुआ है.

इसके अलावा ग्राम पंचायत में विशेष ग्राम सभा आयोजित करने व निर्दोष व फर्जी प्रकरणों में जेलों में बंद आदिवासियों को बिनाशर्त रिहा करने की मांग भी पंचायतों ने रखी है.

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ग्राम पंचायतों ने फूलपाड़, समेली, पोटाली और नंदाराज में भूमि विस्थापन और कोड़नार जैसे पंचायतों में कथित फर्जी ग्राम सभा कर ज़मीन हड़पने के विरोध का ज़िक़्र भी अपने पत्र में किया है. इस पत्र में पोटाली, बुरगुम में नए पुलिस कैंप खोलने के साथ-साथ ग्राम सभा की अनुमति के बिना बड़े पुल व बड़ी सड़कों के निर्माण पर भी रोक लगाने की मांग की गई है.

आदिवासी बनाम माओवादी

इलाके की आदिवासी नेता सोनी सोरी का आरोप है कि सुरक्षाबलों के जवान अक्सर निर्दोष ग्रामीणों के साथ मारपीट करते हैं, जिसके कारण ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है.

सोरी का कहना है कि बस्तर के आदिवासी इस इलाके में माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच पिसकर रह गए हैं.

उन्होंने दावा किया कि माओवाद प्रभावित नीलवाया, फूलपाड़, बुरगुम, समेली, रेवाली, बड़ेबेड़मा, पोटाली, नहाड़ी, जबेली, गोंडेरास, गोनपाली, पोरदेम, अरनपुर, वानकापाल जैसे ग्राम पंचायत के लोग एकजुट होकर सुरक्षाबलों की कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं.

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सोनी सोरी ने कहा, "अगर पुलिस कहती है कि माओवादियों के कहने पर गांव के लोग सुरक्षाबलों के कैंप का विरोध कर रहे हैं तो क्या पुलिस मानती है कि सारे के सारे आदिवासी माओवादी या माओवादी समर्थक हैं? पुलिस को इस मानसिकता से बाहर आ कर आदिवासियों की तकलीफ़ को समझना चाहिए."

मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल के अध्यक्ष डॉ. लाखन सिंह का कहना है कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में वन अधिकार कानून और पंचायत कानून पर चर्चा हो रही है, ग्राम सभा को मज़बूत करने के लिए पंचायतें एकत्र हो रही हैं, इसका स्वागत किया जाना चाहिए.

लाखन सिंह कहते हैं, "पांचवी अनुसूची के क्षेत्र में ग्राम सभा को अपने गांव के बारे में निर्णय लेने का अधिकार है. अगर गांव के लोग अपने अधिकार के लिए एकजुट हुए हैं तो राज्य सरकार और ज़िला प्रशासन को इसमें मदद करनी चाहिए."

हालांकि नक्सल विरोधी अभियान के डीआईजी सुंदरराज पी का कहना है कि जिन इलाकों में आदिवासियों के कथित विरोध की बात सामने आई है, वे माओवादियों के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील हैं और उन इलाकों में लगातार विकास के काम हो रहे हैं.

सुंदरराज ने कहा, "विकास कार्यों के लिए सुरक्षा मुहैया करवाना हमारी ज़िम्मेवारी है और हम अपनी ज़िम्मेवारी से पीछे नहीं हटेंगे. हम सभी पक्षों को विश्वास में लेकर लगातार काम कर रहे हैं और माओवादियों के ख़िलाफ़ संघर्ष और विकास का हमारा अभियान जारी रहेगा."

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