लोकसभा चुनाव 2019 नतीजे: वो 50 सीटें जिन पर है नज़र

  • 23 मई 2019
राहुल मोदी

11 अप्रैल से 19 मई तक 7 चरणों में लोकसभा की 542 सीटों के लिए चुनाव में कुल 8040 उम्मीदवार मैदान में उतरे और अब 17वीं लोकसभा के गठन के लिए 23 मई यानी गुरुवार को मतगणना हो रही है.

यानी आज 8040 उम्मीदवारों की किस्मत का फ़ैसला होना है. चलिए देखते हैं कि कौन कौन से कद्दावर नेताओं की किस्मत का फ़ैसला होना है और इस चुनाव में किन-किन सीटों पर सबकी निगाहें टिकी हैं.

उत्तर प्रदेश

वाराणसी

नरेंद्र मोदी. 2014 में मोदी ने आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को 3.3 लाख वोटों से हराया था. एक बार फिर नरेंद्र मोदी यहां से चुनाव मैदान में हैं और उनके ख़िलाफ़ कांग्रेस के अजय राय और सपा-बसपा-रालोद की शालिनी यादव खड़ी हैं.

सहारनपुर

2014 में बीजेपी के राघव लखनपाल ने कांग्रेसी उम्मीदवार इमरान मसूद को हराया था. सहारनपुर में कुल 56.74 फीसदी हिंदू, 41.95 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है. (2011 के जनगणना के अनुसार). इस लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें बेहट, सहारनपुर नगर, सहारनपुर, देवबंद और रामपुरमनिहारन आती हैं. इनमें से दो पर बीजेपी, दो कांग्रेस जबकि एक पर समाजवादी पार्टी के विधायक हैं. लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान सहारनपुर के देवबंद में ही 7 अप्रैल को बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन की पहली संयुक्त रैली का आयोजन किया गया था. पहली बार अखिलेश, मायावती और अजित सिंह ने मंच साझा किया. बीजेपी ने एक बार फिर राघव लखनपाल को उतारा है तो सपा-बसपा-रालोद ने हाजी फजर्लुरहमान और कांग्रेस ने इमरान मसूद को टिकट दिया है.

कैराना

2014 में यहां से बीजेपी की जीत हुई थी लेकिन बीजेपी सांसद हुकुम सिंह के निधन से खाली हुए इस सीट पर उप चुनाव में विपक्षी एकता के सहारे रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन की जीत हुई. 2019 के चुनाव में सपा-बसपा-रालोद के गठबंधन की वजह से बीजेपी के लिए 2014 का प्रदर्शन फिर से दोहराना एक बड़ी चुनौती है. सपा-बसपा-रालोद की वर्तमान सांसद तबस्सुम हसन के सामने बीजेपी ने यहां से प्रदीप चौधरी को तो कांग्रेस ने हरेंद्र मलिक को उतारा है.

बाग़पत

भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से मौजूदा सांसद सत्यपाल सिंह यहां से चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं, आरएलडी से जयंत चौधरी जबकि, शिवपाल सिंह यादव की पार्टी ने चौधरी मोहम्मद मोहकम को अपना प्रत्याशी बनाया है.

देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की इस संसदीय सीट से उनके बेटे अजित सिंह कई बार चुनाव जीत चुके हैं लेकिन 2014 की मोदी लहर में बीजेपी ने यहां जीत का परचम लहराया और मुंबई पुलिस के पूर्व कमिश्नर सत्यपाल सिंह सांसद चुने गए जबकि अजित सिंह तीसरे नंबर पर रहे.

इस बार यहां से उनके बेटे जयंत सिंह प्रत्याशी हैं जबकि खुद अजित सिंह मुज़फ़्फ़रनगर से चुनाव मैदान में हैं. अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी यहां से सपा-बसपा-रालोद के प्रत्याशी हैं. वहीं बीजेपी ने एक बार फिर सत्यपाल सिंह को टिकट दिया है जबकि कांग्रेस ने कोई भी प्रत्याशी नहीं उतारे हैं.

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गाज़ियाबाद

2008 में अस्तित्‍व में आई गाज़ियाबाद सीट पर 2009 से ही बीजेपी का वर्चस्व बना हुआ है. यहां से जनरल विजय कुमार सिंह वर्तमान बीजेपी सांसद हैं.

2014 में उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी राज बब्बर को 5.57 लाख वोटों से हराया था. सिंह को मोदी कैबिनेट में राज्य मंत्री बनाया गया. सिंह एक बार फिर बीजेपी प्रत्याशी हैं जबकि कांग्रेस की तरफ से डॉली शर्मा मैदान में हैं.

गौतमबुद्ध नगर

यह सीट भी 2008 में ही परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी. 2015 में दादरी क्षेत्र के बिसाहड़ा गांव में हुई मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या मामले को लेकर यह लोकसभा सीट चर्चा में रही है. 2009 में यहां पहली बार लोकसभा चुनाव हुए जिसमें बसपा ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की.

यहां से वर्तमान में सांसद बीजेपी के डॉ महेश शर्मा हैं. इस बार यहां से महागठबंधन से बीएसपी प्रत्याशी सतवीर नागर और कांग्रेस के डॉ. अरविंद कुमार सिंह मैदान में हैं.

इस सीट पर गुर्जर वोटरों की संख्या अधिक है. यहां से बीजेपी की तरफ से एक बार फिर डॉ. महेश शर्मा मैदान में हैं जबकि सपा-बसपा-रालोद के प्रत्याशी सतवीर नागर और कांग्रेस की तरफ से डॉ. अरविंद कुमार सिंह मैदान में हैं.

मथुरा

2014 के आम चुनाव में हेमा मालिनी यहां से बीजेपी सांसद बनी थीं. उन्होंने राष्ट्रीय लोक दल प्रमुख अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी को हराया था.

हेमा मालिनी एक बार फिर मैदान में हैं और इस बार सपा-बसपा-रालोद गठबंधन ने यहां से बीजेपी को रोकने के लिए कुंवर नरेंद्र सिंह को मैदान में उतारा है. वहीं कांग्रेस ने महेश पाठक को उतारा है.

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Image caption संतोष कुमार गंगवार

बरेली

बरेली लोकसभा सीट पर एक बार फिर बीजेपी के संतोष कुमार गंगवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. उनका मुक़ाबला कांग्रेस के प्रवीण सिंह एरन और सपा के गठबंधन प्रत्याशी भगवत शरण गंगवार से है.

मुज़फ़्फ़रनगर

2014 में बीजेपी के संजीव कुमार बालियान बसपा के कादिर राणा को चार लाख वोटों से हराकर निर्वाचित हुए थे. इस बार यहां से राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजित सिंह यहां से मैदान में है और बीजेपी ने एक बार फिर संजीव बालियान पर भरोसा जताया है. कांग्रेस ने अपना कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है. मुज़फ़्फ़रनगर लोकसभा सीट 2013 के दंगों के कारण काफी चर्चा में रहा है. यहां लगभग 16.5 लाख मतदाता हैं. जिसमें मुसलमानों के वोट 5 लाख, जाटों के डेढ़ लाख और जाटवों के ढाई लाख वोट हैं.

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Image caption अटल बिहारी वाजपेयी के साथ राजनाथ सिंह

लखनऊ

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह यहां से मौजूदा सांसद हैं और इस बार भी बीजेपी से उम्मीदवार हैं. उनके सामने सपा-बसपा गठबंधन ने फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को टिकट दिया जो पहली बार चुनाव लड़ रही हैं.

बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि उनका किसी से मुक़ाबला नहीं है और वो इस चुनाव को बड़ी आसानी से जीत रही हैं. कांग्रेस पार्टी ने आचार्य प्रमोद कृष्णन को उतारा है.

उन्नाव

उन्नाव लोकसभा सीट से बीजेपी के साक्षी महाराज वर्तमान सांसद हैं. 2017 में यहां की छह विधानसभा सीटों में से पांच पर बीजेपी का कब्जा रहा था जबकि एक सीट पर बसपा प्रत्याशी को जीत मिली थी. हालांकि 2004 में बसपा और 2009 में कांग्रेस यहां जीत दर्ज कर चुकी हैं.

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Image caption राहुल गांधी और स्मृति ईरानी

अमेठी

2004 से इस सीट पर राहुल गांधी सांसद रहे हैं. इससे पहले भी यह सीट (दो बार छोड़ कर) कांग्रेस के ही खाते में रही है.

2014 में यहां से बीजेपी ने स्मृति ईरानी को उतार कर मुक़ाबला दिलचस्प बना दिया था और उन्हें तीन लाख वोट भी पड़े थे. इस बार भी स्मृति ईरानी मैदान में हैं और गठबंधन ने यहां से अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है. यानी इन दोनों प्रत्याशियों के बीच सीधा मुक़ाबला है.

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Image caption रवि किशन और मनोज तिवारी

गोरखपुर

इस सीट से बीजेपी के रवि किशन और सपा-बसपा-रालोद उम्मीदवार रामभुआल निषाद मैदान में हैं जबकि कांग्रेस के मधुसूदन तिवारी मुक़ाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं.

2014 में इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी कृष्ण प्रताप सिंह महज 42 हज़ार वोटों से जीते लेकिन 2018 में हुए उपचुनाव में बीजेपी ने ये सीट गंवा दी थी और सपा-बसपा और निषाद पार्टी के संयुक्त प्रत्याशी प्रवीण निषाद विजयी हुए थे. हालांकि इस बार मामला कुछ पेंचीदा है क्योंकि निषाद पार्टी ने बीजेपी का दामन थाम लिया है.

गाज़ीपुर

2014 में इस सीट से बीजेपी के मनोज सिन्हा निर्वाचन हुए थे. उन्होंने समाजवादी पार्टी के शिवकन्या कुशवाहा को क़रीब 32 हज़ार वोटों से हराया था. इस बार मनोज सिन्हा फिर मैदान में हैं और उनके सामने गठबंधन ने अफजाल अंसारी को खड़ा किया है.

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Image caption अखिलेश यादव

आज़मगढ़

2014 में मुलायम सिंह यादव यहां से मैदान में थे तो इस बार उनके बेटे अखिलेश महागठबंधन के उम्मीदवार हैं.

कांग्रेस पार्टी ने यहाँ इस बार अपना प्रत्याशी खड़ा नहीं किया है और इलाक़े के जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने भी अपना कैंडिडेट एक स्थानीय और बेहद लोकप्रिय भोजपुरी गायक दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' को मैदान में उतारा है. यह पूर्वी उत्तर प्रदेश की एकमात्र ऐसी लोकसभा सीट है जिसपर 2014 की 'मोदी लहर' का असर नहीं दिखा था.

रामपुर

रामपुर वो लोकसभा सीट है जिस पर चुनाव जीत कर अबुल कलाम आज़ाद देश के पहले शिक्षा मंत्री बने थे.

2014 में यहां से मोदी लहर का फायदा बीजेपी के नेपाल सिंह को मिला था हालांकि उससे पहले 2004 और 2009 में तब समाजवादी प्रत्याशी रहीं जयाप्रदा जीतकर संसद पहुंची थी जो इस बार बीजेपी के चुनाव चिह्न से मैदान में हैं.

हालांकि इसे आज़म ख़ान के प्रभाव वाली सीट माना जाता है. और इस बार आज़म और सपा छोड़कर बीजेपी में गईं जयाप्रदा के बीच सीधा मुक़ाबला है. दोनों के बीच जुबानी जंग भी हो चुका है. और उस दौरान आज़म ख़ान को चुनाव आयोग ने 72 घंटे प्रचार करने से रोक दिया था.

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Image caption मुलायम सिंह यादव

मैनपुरी

1996 से लेकर अब तक इस सीट पर समाजवाटी पार्टी का कब्‍जा रहा है. इस बार इस सीट से खुद मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़ रहे हैं. 2014 में भी यहां से मुलायम सिंह यादव चुनाव जीते थे, लेकिन उन्होंने इस सीट को छोड़ दिया था.

इसके बाद उनके पोते तेजप्रताप सिंह यादव ने यहां हुए उपचुनाव में बड़े अंतर से जीत हासिल की थी. कांग्रेस ने इस सीट से अपना प्रत्याशी नहीं उतारने का फ़ैसला किया है. बीजेपी ने प्रेम सिंह शाक्य पर दांव लगाया है, जो उपचुनाव में भी बीजेपी प्रत्याशी थे.

फ़तेहपुर सीकरी

बीजेपीः राज कुमार चाहर

सपा-बसपा-रालोदः राजवीर सिंह

कांग्रेसः राज बब्बर

पीलीभीत

बीजेपीः वरुण गांधी

सपा-बसपा-रालोदः हेमराज वर्मा

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Image caption मेनका गांधी और वरुण गांधी

सुल्तानपुर

2014 में इस सीट से बीजेपी प्रत्याशी वरुण गांधी बीजेपी की टिकट पर जीते थे. इस बार वरुण गांधी पीलीभीत सीट से मैदान में उतरे हैं जबकि उनकी मां केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी यहां से उम्मीदवार हैं. चुनाव प्रचार के दौरान मेनका गांधी मुसलमानों पर दिये अपने बयान को लेकर विवादों में रहीं.

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बिहार

मधेपुरा

महागठबंधन ने मधेपुरा से शरद यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है. लेकिन मुक़ाबला दिलचस्प हो गया जब पप्पू यादव ने भी इसी सीट से लड़ने की घोषणा कर दी जो कभी खुद राष्ट्रीय जनता दल की सीट से लड़कर शरद यादव को 2014 चुनावों में हरा चुके हैं.

पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन कांग्रेस की सुपौल से उम्मीदवार हैं जो बिहार में महागठबंधन का हिस्सा है. इस बार जेडीयू ने दिनेश चंद्र यादव को यहां से टिकट दी है जो पहले भी कई बार सांसद रह चुके हैं और बिहार सरकार में मंत्री भी.

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Image caption शत्रुघ्न सिन्हा

पटना साहिब

गांधी मैदान पटना साहिब की एक बड़ी पहचान है जहां कई बड़े नेताओं ने रैलियां की हैं. कभी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी भी रैलियां कर चुके हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यहां रैली की है. जयप्रकाश नारायण ने 1974 में इसी मैदान से संपूर्ण क्रांति की बात कही थी.

परिसीमन के बाद 2009 में पहली बार यहां लोकसभा चुनाव हुए जिसमें बीजेपी के टिकट पर शत्रुघ्न सिन्हा की जीत हुई. 2014 में वे फिर से यहीं से सांसद बने. इस बार बीजेपी ने उनका टिकट काटकर केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद को दे दिया. कायस्थ बहुल इस सीट पर शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस के प्रत्याशी हैं.

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Image caption कन्हैया कुमार

बेगूसराय

राष्ट्रद्रोह के केस से सुर्खियों में आए जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार इस सीट से सीपीआई की टिकट पर चुनाव मैदान में हैं. 2014 में पहली बार इस सीट से बीजेपी के भोला सिंह को जीत मिली थी लेकिन अक्तूबर 2018 में उनकी मौत हो गई.

इस बार बीजेपी ने गिरिराज सिंह को यहां से टिकट दी है. महागठबंधन के सीट बंटवारे में ये सीट आरजेडी ने अपने पास रखी और एक बार फिर डॉ. तनवीर हसन को मैदान में उतारा है. बेगूसराय में मुस्लिम और ओबीसी से कहीं ज्यादा भूमिहार वोट मायने रखता है और अब तक यहां से सबसे ज़्यादा भूमिहार उम्मीदवार ही जीतते आये हैं. बीजेपी और सीपीआई के उम्मीदवार गिरिराज सिंह और कन्हैया कुमार दोनों ही भूमिहार हैं. आबादी के लिहाज से यहां मुसलमान दूसरे नंबर पर हैं लिहाजा महागठबंधन ने मुस्लिम प्रत्याशी को तरजीह दी है.

सिवान

सिवान लोकसभा सीट पर जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने कविता सिंह को उतारा है. बाहुबली अजय सिंह की पत्नी कविता सिंह दरौंदा सीट (सिवान लोकसभा की छह विधानसभा सीटों में से एक) से विधायक हैं. इस सीट पर राजद नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन का दबदबा रहा है जो कि फिलहाल कत्ल के आरोप में जेल में बंद हैं. 1996 से लगातार चार बार शहाबुद्दीन यहां सांसद रहे हैं. शहाबुद्दीन को तेज़ाब कांड में सज़ा होने के बाद 2009 और 2014 में बीजेपी के ओमप्रकाश यादव यहां से सांसद रहे. 2014 में आरजेडी की हीना शहाब दूसरे नंबर पर रही थीं. सिवान की छह विधानसभा सीटों में से 3 जेडीयू, 1 बीजेपी, 1 आरजेडी और एक सीपीआईएमएल के पास है.

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हाजीपुर

लोक जनशक्ति पार्टी के प्रमुख रामविलास पासवान यहां 2014 में सांसद बने थे. रामविलास पासवान नौ बार लोकसभा सांसद और एक बार राज्यसभा सांसद रहे हैं और ज़्यादातर इसी सीट से उन्होंने चुनाव जीता है. इस बार ये सीट उन्होंने अपने भाई पशुपति कुमार पारस को लड़ने के लिए दे दी है.

महागठबंधन से यहां शिव चंद्र राम लड़ रहे हैं जो आरजेडी के राजा पाकड़ से विधायक हैं. पिछले साल ही उन्होंने कह दिया था कि वे हाजीपुर से चुनाव लड़ेंगे. ये सीट 1977 से सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और तब पहली बार रामविलास पासवान यहां से सांसद बने थे. पासवान ही यहां से वर्तमान सांसद भी हैं. अब तक इस सीट से वे 10 बार चुनाव लड़कर 8 बार सांसद बने हैं. 2014 में पासवान की लोक जन शक्ति पार्टी बिहार में सात सीटों पर चुनाव लड़ी थी, इनमें से छह सीटों पर उसे जीत मिली.

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Image caption मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया

मध्य प्रदेश

भोपाल

इस सीट पर बीजेपी की प्रज्ञा ठाकुर और कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के बीच सीधा मुक़ाबला है. 2014 में हुए चुनाव में बीजेपी के आलोक संजर ने यहां से जीत हासिल की थी. इस सीट से जीत कर कांग्रेस के शंकरदयाल शर्मा (पूर्व राष्ट्रपति), बीजेपी की उमा भारती, सुशील चंद्र वर्मा और कैलाश जोशी कभी संसद पहुंचे थे. बीजेपी प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर इस चुनाव के दौरान बहुत विवादों में रही हैं. उन्हें मालेगांव बम ब्लास्ट मामले के एक अभियुक्त के तौर पर जाना जाता है. साध्वी प्रज्ञा ने पत्रकारों से बात करते हुए दिग्विजय सिंह को देश का दुश्मन बताया. उन्होंने कहा, "मैं देश के दुश्मनों के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए तैयार हूं." इसके अलावा भी उन्होंने कई ऐसे बयान दिये जिस पर बहुत विवाद हुआ. इसमें से एक था "नाथूराम गोडसे को देशभक्त" बताना.

गुना

2014 के आम चुनाव में कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस सीट से जीत हासिल की थी. इस बार फिर वो मैदान में हैं. यहां मुक़ाबला सिंधिया और बीजेपी के डॉ. केपी यादव के बीच है. तीन पीढ़ियों से गुना लोकसभा सीट पर सिंधिया घराना जीतता आया है. ग्वालियर के बाद गुना ही वह सीट है, जहां से सिंधिया परिवार चुनाव लड़ना पसंद करता है. ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी विजयराजे सिंधिया और पिता माधवराव सिंधिया ने यहां से निर्दलीय चुनाव जीतकर इतिहास रचा था.

छिंदवाड़ा

छिंदवाड़ा मध्य प्रदेश की हाईप्रोफ़ाइल सीटों में से एक है. यहां से मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुल कमल नाथ चुनावी मैदान में हैं और उनके ख़िलाफ़ ज्ञानेश्वर गजभ‍िए (बहुजन समाज पार्टी), नाथनसाहा कुरैती (भारतीय जनता पार्टी), मनमोहन शाह बट्टी (अख‍िल भारतीय गोंडवाना पार्टी), एडवोकेट राजकुमार सरयाम (गोंडवाना गणतंत्र पार्टी), राजेश तांत्र‍िक (अहिंसा समाज पार्टी), एमपी विश्वकर्मा (राष्ट्रीय आमजन पार्टी) चुनाव लड़ रहे हैं. यह सीट कमलनाथ का गढ़ रहा है. कमलनाथ साल 1980 से इस सीट से लोकसभा का चुनाव जीतते आ रहे हैं. छिंदवाड़ा की जनता ने कमलनाथ को सिर्फ एक बार निराश किया है, जब 1997 में वे यहां से हारे थे.

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Image caption शरद पवार परिवार

महाराष्ट्र

2014 के चुनाव में बीजेपी ने महाराष्ट्र की 23 सीटों पर और शिवसेना 18 सीटों पर जीत हासिल की थी. कांग्रेस को 2 सीटों और एनसीपी को चार सीटों पर कामयाबी मिली थी.

बारामती

महाराष्ट्र की बारामती लोकसभा सीट पर 2014 के चुनाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सुप्रिया सुले ने जीत दर्ज की थी. यह लोकसभा सीट राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार और उनके परिवार के लिए जानी जाती है. बारामती सीट से शरद पवार 6 बार सांसद बने उसके बाद उनकी बेटी सुप्र‍िया सुले 2 बार से सांसद हैं. एक बार शरद पवार के भतीजे अजीत पवार भी इसी सीट से सांसद बन चुके हैं. बीते 27 सालों से इस सीट पर पवार परिवार का एकछत्र राज है. 2014 के मोदी लहर में भी पवार परिवार ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा. इस बार सुप्रिया का मुकाबला बीजेपी के सहयोगी राष्ट्रीय समाज पक्ष (आरएसपीएस) और दौंद विधानसभा सीट से विधायक राहुल कूल की पत्नी कंचन कूल से होगा, जो बीजेपी के चुनाव चिह्न पर मैदान में हैं.

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Image caption प्रीतम मुंडे

बीड

बीड सीट से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने एक बार फिर गोपीनाथ मुंडे की बेटी प्रीतम मुंडे को चुनाव मैदान में उतारा है, वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने बजरंग मनोहर सोनवणे को टिकट दिया है. 2014 में गोपीनाथ मुंडे यहां से बीजेपी सांसद बने थे. जून 2014 में सड़क दुर्घटना में हुई उनकी मौत के बाद यहां उपचुनाव में उनकी बेटी प्रीतम मुंडे ने रिकॉर्ड (क़रीब 7 लाख) वोटों के अंतर से कांग्रेस के अशोक पाटिल को हराया था. 2004 को छोड़कर 1996 से ही इस सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा है.

मुंबई उत्तर-मध्य

इस सीट पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है. बीजेपी ने तरफ से पूनम महाजन तो कांग्रेस की ओर से प्रिया दत्त मैदान में हैं. इस सीट पर बसपा ने भी उम्मीदवार उतारा है. बसपा ने यहां से इमरान मुस्तफा खान को टिकट दिया है. इस सीट पर कभी किसी एक पार्टी का दबदबा नहीं रहा. 2014 में बीजेपी की पूनम महाजन वहीं 2009 में कांग्रेस से सुनील दत्त की बेटी प्र‍िया दत्त ने बाजी मारी. 1999 में शिवसेना के मनोहर जोशी तो 1998 में आरपीआई के रामदास अठावले ने कब्जा जमाया. इससे पहले 1996 में शिवसेना के नारायण अठावले और 1991 में कांग्रेस के शरद दिघे यहां से सांसद रहे हैं.

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Image caption उर्मिला मातोंडकर

मुंबई उत्तर

2014 में इस लोकसभा सीट पर बीजेपी के गोपाल शेट्टी ने कांग्रेस के संजय ब्रजकिशोरलाल निरूपम को हरा कर जीत हासिल की थी. यह सीट 1989, 1991, 1996, 1998 और 1999 में भी बीजेपी के खाते में गई थी. जबकि 2004 कांग्रेस के टिकट पर गोविंदा यहां से जीते थे तो 2009 में कांग्रेस के संजय निरुपम. इस बार के लोकसभा चुनाव में मुंबई उत्‍तर लोकसभा सीट सबसे चर्चित सीटों में से एक रही है क्योंकि कांग्रेस ने यहां से बॉलीवुड अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर को उम्‍मीदवार बनाया है.

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Image caption संजय निरुपम

मुंबई उत्तर-पश्चिम

फ़िल्म से राजनीति का सफ़र तय करने वाले सुनील दत्त की वजह से यह सीट मशहूर रही है. सुनील दत्त यहां से 18 साल सांसद रहे. 1967 से 1977 तक ये सीट कांग्रेस के पास रही और उसके बाद जानेमाने वकील राम जेठमलानी पहले जनता पार्टी बाद में बीजेपी के सांसद बने. फिर 1984 से 1996 तक कांग्रेस के सांसद और फिल्म अभिनेता सुनील दत्त का दौर रहा. 2005 में सुनील दत्त की मौत के बाद हुए उपचुनाव में उनकी बेटी प्रिया दत्त सांसद चुनी गई थीं. 2009 में भी ये सीट कांग्रेस के पास रही लेकिन फिर 2014 में शिवसेना के गजानन कीर्तिकर ने इस सीट को जीत लिया. इस चुनाव में यहां शिवसेना और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है. शिवसेना ने मौजूदा सांसद गजानन कीर्तिकर को टिकट दिया, वहीं कांग्रेस की ओर से कभी शिवसेना में रहे पूर्व पत्रकार संजय निरुपम मैदान में हैं.

मुंबई दक्षिण

यह वो ही सीट है जिससे 1967 में जार्ज फर्नांडिस पहली बार सांसद बने थे. 2014 में शिवसेना के अरविंद गनपत सावंत ने कांग्रेस के मिलिंद देवड़ा को हराया था. इस बार शिवसेना ने एक बार फिर अरविंद सावंत पर अपना दांव लगाया तो कांग्रेस ने भी मिलिंद देवड़ा को ही उतारा है. वहीं बीएसपी की ओर से मिस्त्रीलाल गौतम मैदान में हैं.

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Image caption अमित शाह

गुजरात

गांधीनगर

इस सीट पर बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह चुनाव लड़ रहे हैं. शाह पहली बार चुनावी मैदान में हैं. उनके ख़िलाफ़ कांग्रेस ने स्थानीय विधायक सी जे चावड़ा को अपना प्रत्याशी बनाया है. 2014 के आम चुनाव में बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने यहां से जीत हासिल की थी. परंपरागत रूप से यह लोकसभा सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती है और 1989 से ही इस पर बीजेपी का कब्जा रहा है. 2014 में लाल कृष्ण आडवाणी ने इस सीट पर 4 लाख 80 हज़ार से अधिक मतों के अंतर से जीत हासिल की थी. क्या अमित शाह जीत के अंतर को और बड़ा करेंगे, इसे लेकर इस सीट पर सबकी नज़र बनी हुई है.

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Image caption दुष्यंत सिंह

राजस्थान

झालावाड़-बारां

इस सीट से बीजेपी की ओर से राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह, कांग्रेस की ओर से प्रमोद शर्मा और बीएसपी के बद्री लाल चुनावी मैदान में हैं. बीजेपी के इस गढ़ में बीते आठ चुनावों में कांग्रेस को जीत नसीब नहीं हुई है. दुष्यंत इस सीट पर 2004 से लगातार चुनकर संसद पहुंचते रहे हैं. 1989 में इसी सीट से दुष्यंत की मां वसुंधरा राजे ने जीत दर्ज की थी.

जोधपुर

राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत यहां से कांग्रेसी प्रत्याशी हैं. वो पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं. उनका मुक़ाबला बीजेपी के वर्तमान सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत से है. जोधपुर लोकसभा सीट के तहत आठ विधानसभा सीटें फलौदी, लोहावत, शेरगढ़, सरदारपुरा, जोधपुर, सूरसागर, लूनी और पोखरण आती हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरदारपुरा विधानसभा सीट से ही विधायक हैं.

बीकानेर

हवेलियों का शहर बीकानेर राजस्थान के उत्तर पश्चिमी इलाके का बड़ा शहर है. यहां से दो मौसेरे भाई चुनावी मैदान में हैं. बीजेपी अर्जुनराम मेघवाल और कांग्रेस के मदनगोपाल मेघवाल आपस में मौसेरे भाई हैं. मदनगोपाल पहली बार चुनावी मैदान में हैं वहीं अर्जुनराम मेघवाल वर्तमान सांसद. 2004 से लगातार यह सीट बीजेपी के हाथों में रही है. 1998 में कांग्रेस के बलराम जाखड़ यहां से सांसद रहे जबकि 2004 में फिल्म अभिनेता धर्मेन्द्र. 2009 में यह सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हो गई. तब से अर्जुनराम मेघवाल ही यहां से जीत रहे हैं.

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Image caption भगत सिंह कोश्यारी

उत्तराखंड

नैनीताल-उधमसिंह नगर

2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड के पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी ने कांग्रेस के करण चंद सिंह बाबा को ढाई लाख से अधिक वोटों से हराया था. तीसरे नंबर पर रहे थे बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार लायक अहमद. लेकिन इस बार बीजेपी ने अपने मौजूदा सांसद कोश्यारी का टिकट काटकर अजय भट्ट पर भरोसा जताया है. वहीं कांग्रेस की तरफ से उत्तराखंड के कद्दावर नेताओं में शुमार पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव मैदान में हैं.

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Image caption रमेश पोखरियाल निशंक

हरिद्वार

2014 के चुनाव में इस सीट से पूर्व मुख्यमत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक बीजेपी के सांसद बने थे. 2014 में निशंक ने हरिद्वार के सांसद और केन्द्र में मंत्री रहे हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत को पौने दो लाख से ज्यादा वोटों से हराया था. बीजेपी ने एक बार फिर निशंक पर भरोसा जताया है जबकि कांग्रेस ने अंबरीश कुमार को मैदान में उतारा है. 1977 में इस लोकसभा सीट का गठन हुआ और इसे अनुसूचित जाति के आरक्षित कर दिया गया. यह उन सीटों में से है जहां पहली बार सम्पन्न हुए चुनाव में ही कोई गैर कांग्रेसी सांसद बन गया था. जब 1977 में हरिद्वार में पहला चुनाव हुआ तो भारतीय लोक दल के भगवान दास ने यहां से जीत हासिल की थी. हरिद्वार लोकसभा सीट हरिद्वार की सभी 11 और देहरादून के 3 विधानसभाओें को मिलाकर बनी है. इनमें से अधिकतक पर बीजेपी के विधायक काबिज हैं. लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाले 14 विधानसभाओं में से 11 पर बीजेपी जबकि 3 पर कांग्रेस के विधायक हैं.

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Image caption गुरजीत सिंह औजला

पंजाब

अमृतसर

इस लोकसभा सीट से केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी पहली बार चुनाव मैदान में हैं. 2014 में इस सीट पर कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बीजेपी के अरुण जेटली को हरा कर जीत हासिल की थी. 2017 में अमरिंदर सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद यहां से कांग्रेस के ही गुरजीत सिंह औजला जीते. औजला एक बार फिर मैदान में हैं. हालांकि 2004, 2007 के उपचुनाव और 2009 के आम चुनाव में बीजेपी के नवजोत सिंह सिद्धू ने इस सीट पर कब्‍जा किया था.

छत्तीसगढ़

बस्तर

छत्तीसगढ़ में 11 लोकसभा सीटें हैं जिनमें से सबसे संवेदनशील मानी जानेवाली बस्तर लोकसभा सीट पर चुनाव करवाना एक जंग लड़ने के बराबर माना जाता है. बस्तर के सुदूर इलाक़ों में माओवादी छापामारों की समानांतर सरकार चलती है जो चुनावी प्रक्रिया को ख़ारिज करते हैं. चुनाव में यहां के लोगों के सामने वोट डालना एक बड़ी चुनौती रही है. इस बार यहां से सात प्रत्याशी भाग्य आजमा रहे हैं. बीजेपी से बैदूराम कश्यप, कांग्रेस से दीपक बैज, शिवसेना से सुरेश कवासी, बसपा से आयतूराम मंडावी, सीपीआइ से रामूराम मौर्य और निर्दलीय पनीषप्रसाद नाग और मंगलाराम चुनाव मैदान में हैं. यह पहला मौका है जब बस्तर से चुनाव मैदान में बसपा को छोड़कर बाकी सभी प्रत्याशी पहली बार मैदान में उतरे हैं. 2014 में बस्तर से बीजेपी के दिनेश कश्यप निर्वाचित हुए थे. उन्होंने कांग्रेस के प्रत्याशी दीपक कर्मा को हराया था.

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Image caption डॉ हर्षवर्धन

दिल्ली

चांदनी चौक

2014 में इस सीट से जीत हासिल करने वाले के हर्षवर्धन एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं. 2014 में उन्होंने आम आदमी पार्टी के आशुतोष को हराया था जबकि कांग्रेस के कपिल सिब्बल तीसरे स्थान पर रहे थे. इस बार इस सीट से हर्षवर्धन के सामने आम आदमी पार्टी के पंकज गुप्ता और कांग्रेस के जेपी अग्रवाल चुनावी मैदान में हैं. इस सीट पर 1998 और 1999 में बीजेपी के विजय गोयल जबकि 2004 और 2009 में कांग्रेस के कपिल सिब्बल जीते थे.

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Image caption सोनिया गांधी के साथ शीला दीक्षित

नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली

2014 में इस सीट पर बीजेपी के मनोज तिवारी ने कांग्रेस के तब के सांसद जेपी अग्रवाल को हराया था. इस बार मनोज तिवारी के सामने तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित हैं. दिल्ली की सातों सीटों में से सबसे कड़ा मुक़ाबला इसी सीट पर माना जा रहा है. माना तो यहां तक जा रहा है कि इस पर आने वाला नतीजा दिल्ली में कांग्रेस और बीजेपी का भविष्य तय करेगी क्योंकि 2020 में यहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

दक्षिण दिल्ली

इस सीट पर 2014 में बीजेपी के रमेश बिधूड़ी ने कांग्रेस के रमेश कुमार को हराया था. इस सीट से जीत कर भारतीय जनसंघ के बलराज मधोक, अर्जुन सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना, बीजेपी की वरिष्ठ नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री सुषमा स्वराज और बीजेपी के विजय कुमार मल्होत्रा संसद जा चुके हैं.

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Image caption किरन रिजीजू

पश्चिम अरुणाचल

अरुणाचल पश्चिम लोकसभा सीट से जीतकर 2014 में बीजेपी के केंद्रीय मंत्री किरन रिजीजू संसद पहुंचे थे. इस बार उनका मुक़ाबला कांग्रेस से नबाम तुकी (पूर्व मुख्यमंत्री) और पीपीए से सुबु केची के बीच है.

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Image caption जुएल उरांव

ओडिशा

सुंदरगढ़

सुंदरगढ़ ओडिशा के 21 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है. सुंदरगढ़ ओडिशा की एकमात्र ऐसी सीट है जिस पर 2014 में बीजेपी के प्रत्याशी की जीत हुई थी. ओडिशा के बाकी सभी सीट बीजेडी की झोली में गयी थीं. तब भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी जुएल उरांव वहां से जीते थे. बीजेपी ने एक बार फिर अपने इस केंद्रीय मंत्री पर दांव खेला है. उनके सामने

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Image caption अपने पिता पी चिदंबरम के साथ कार्ति चिदंबरम

तमिलनाडु

शिवगंगा

तमिलनाडु की शिवगंगा सीट इस बार कई मायनों में खास है. इस सीट पर कार्ति चिदंबरम को उम्मीदवार बनाया गया है. उनके पिता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम यहां से 7 बार सांसद रह चुके हैं. इस बार यहां से कांग्रेस और बीजेपी के साथ ही साथ अभिनेता से नेता बने कमल हासन की पार्टी मक्कल नीधि मय्यम के कविंगनर शेनकन के बीच त्रिकोणीय लड़ाई है.

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Image caption पोन राधाकृष्णन

कन्याकुमारी

तमिलनाडु की एकमात्र सीट जहां से 2014 में बीजेपी जीती थी. कांग्रेस ने इस सीट से एच. वसंताकुमार को टिकट दिया है. वहीं बीजेपी ने पोन राधाकृष्णन को ही मैदान में उतारा है. बसपा ने ई. बालासुब्रमण्यम को उम्मीदवार बनाया है तो सीपीएम ने पॉलराज सी.एम को टिकट दिया है.

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Image caption डॉक्टर ममताज़ संघमिता

पश्चिम बंगाल

बर्धमान-दुर्गापुर

बीजेपी के केंद्रीय मंत्री सुरेंद्रजीत सिंह अहलूवालिया यहां से चुनाव मैदान में हैं. तृणमूल कांग्रेस ने एक बार फिर डॉक्टर ममताज़ संघमिता को चुनाव मैदान में उतारा है. सीपीएम की ओर से अभास राय चौधरी चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस ने रंजीत मुखर्जी को उतारा है तो बहुजन समाज पार्टी की ओर से रामकृष्ण मलिक मैदान में हैं. दुर्गापुर सीट के गठन के बाद पहले चुनाव में ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने अपना झंडा बुलंद कर दिया, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इस सीट पर जीत हासिल की.

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Image caption बाबुल सुप्रियो

आसनसोल

पश्चिम बंगाल में 2014 के चुनाव में बीजेपी जिन दो सीटों को जीती थी उनमें से एक आसनसोल था. इस पर बाबुल सुप्रियो ने टीएमसी के डोला सेन को हराया था. मोदी सरकार में सुप्रियो मंत्री हैं. इस बार उनके सामने ममता बनर्जी ने मुनमुन सेन को उतारा है.

मिदनापुर

पश्चिम बंगाल की मिदनापुर संसदीय सीट पर बीजेपी ने प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष को टिकट दिया है. सीपीआई की ओर से बिपल्ब भट्ट और टीएमसी की ओर से मानस रंजन भुइयां चुनाव लड़ रहे हैं. 2014 के चुनाव में यहां पर टीएमसी के दीपक कुमार घोष ने जीत दर्ज की थी.

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Image caption नरेंद्र मोदी के साथ क्वीन ओझा

असम

गुवाहाटी

2014 के चुनाव में बीजेपी की बिजया चक्रवर्ती ने यहां से जीत हासिल की थी. बीजेपी ने इस बार यहां से क्वीन ओझा को खड़ा किया है. वहीं कांग्रेस ने बोबीता शर्मा तो तृणमूल कांग्रेस ने मनोज शर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है.

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