#ElectionResults2019: मतदान से नतीजे तक, चुनाव के दौरान क्या-क्या हुआ?

  • 23 मई 2019
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10 मार्च को तारीख़ों के ऐलान से शुरू हुआ भारतीय लोकतंत्र का महापर्व लोकसभा चुनाव 2019 आज यानी 23 मई को नतीजों के साथ समाप्त होने जा रहा है. लोकसभा की 542 सीटों के लिए 11 अप्रैल से 19 मई तक के दौरान सात चरणों में वोट डाले गये ताकि देश को नई सरकार, नया प्रधानमंत्री मिले.

लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान 8040 उम्मीदवारों की किस्मत का फ़ैसला करने के लिए 90 करोड़ मतदाताओं के स्याही का इंतज़ाम करने से लेकर 10 लाख मतदान केंद्र बनाए जाने तक यह आयोजन इतना आसान नहीं था. यहां तक कि दूरदराज के गांव में महज़ एक व्यक्ति के लिए मतदान केंद्र तक बनाया गया.

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ये प्रत्येक वोटर तक पहुंचने का संघर्ष था. कर्मचारी कई घंटे चले, घने जंगल और रेगिस्तान पार किये, ऊंची चोटियों और पहाड़ियों तक पहुंचे, यहां तक कि हिंसा प्रभावित इलाकों में भी मतदान कराने पहुंचे. पूरी चुनावी प्रक्रिया के दौरान 01 करोड़ से ज़्यादा कर्मचारियों ने अपनी सेवाएं दीं.

लेकिन यह लोकतांत्रिक महापर्व बिना किसी विवाद के ख़त्म नहीं हुआ. जो सबसे पहला विवाद हुआ, वो था पुलवामा हमले में मारे गये सीआरपीएफ़ के जवानों और बालाकोट एयरस्ट्राइक के नाम पर वोट मांगना और चरमपंथियों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे करना.

सत्ताधारी पार्टी पर सेना के राजनीतिकरण का आरोप लगाया गया और इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में भी अपील की गई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के ख़िलाफ़ ('मोदी की सेना' बोलने की) भी चुनाव आयोग में शिकायतें की गईं.

सबसे बड़ा विवाद

इस दौरान भोपाल से बीजेपी प्रत्याशी 'प्रज्ञा ठाकुर का नाथूराम को देशभक्त कहना' सबसे बड़ा विवाद था. जिससे खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी नाराज़गी जताई और कहा कि प्रज्ञा ठाकुर के इस बयान या जो भी इस तरह का बयान देगा उसे वो माफ़ नहीं करेंगे.

मोदी ने कहा, "गांधी जी या गोडसे के बारे में जो भी बात की गई है या जो भी बयान दिए गए हैं, वो ग़लत हैं."

उन्होंने कहा, "यह हर प्रकार से घृणा के लायक हैं. आलोचना के लायक हैं, सभ्य समाज के अंदर इस तरह की भाषा नहीं चलती है. इस प्रकार की सोच नहीं चल सकती. इसलिए ऐसा करने वालों को सौ बार आगे सोचना पड़ेगा. दूसरा, उन्होंने माफ़ी मांग ली, ये अलग बात है. लेकिन मैं अपने मन से माफ़ नहीं कर पाऊंगा."

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प्रज्ञा ठाकुर ने कहा था कि, "नाथूराम गोडसे देशभक्त थे, देशभक्त हैं और देशभक्त रहेंगे. जो लोग उन्हें आतंकवादी कहते हैं, उन्हें अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए. ऐसे लोगों को इन चुनावों में लोग मुंहतोड़ जवाब देंगे."

इससे पहले साध्वी पर चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र एटीएस के पूर्व प्रमुख हेमंत करकरे और 'बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल होने पर मुझे गर्व है' के उनके बयान को लेकर उनके चुनाव प्रचार पर 72 घंटे का प्रतिबंध भी लगाया था.

साध्वी के अलावा देश के कुछ अन्य नेता भी अपने बयानों की वजह से विवादों में फंसे. कई नेताओं के विवादित बयानों के कारण चुनाव आयोग ने उनके चुनाव प्रचार पर 24 से 72 घंटे तक का प्रतिबंध भी लगाया.

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चुनाव ने हिंसा भी देखी

इस बार पूरी चुनावी प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाने का डर भी पैदा किया गया. सबसे अधिक हिंसा पश्चिम बंगाल के चुनाव के दौरान देखने को मिली. चुनाव आयोग को इसकी आशंका पहले से थी लिहाजा यहां सात चरणों में चुनाव कराने का फ़ैसला लिया गया था.

19 मई को अंतिम चरण के मतदान के लिए चुनाव प्रचार 17 मई की शाम को ख़त्म होने थे लेकिन चुनाव आयोग ने अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा को देखते हुए 19 घंटे पहले ही ऐसा करने का फ़ैसला किया. चुनाव आयोग ने अपने ऐलान में कहा कि यह शायद पहली बार है जब इलेक्शन कमिशन ऑफ़ इंडिया ने अनुच्छेद 324 का इस्तेमाल किया है.

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चुनाव आयोग ने अनुच्छेद 324 का हवाला देते हुए पश्चिम बंगाल के एडीजी (सीआईडी) राजीव कुमार और प्रधान सचिव (गृह) अत्रि भट्टाचार्य को भी हटा दिया.

चुनाव आयोग कोलकाता में हिंसा और ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने को दुखद बताया और उम्मीद जताई कि प्रदेश की सरकार दोषियों को जल्द पकड़ लेगी.

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Image caption वीवीपैट

वीवीपैटकी गिनती पर विपक्ष अड़ा

मतगणना में गड़बड़ियों की आशंका के मद्देनज़र विपक्षी पार्टियों ने मांग की थी कि चुनाव आयोग वीपीपीएटी (वीवीपैट) पर्चियों का मिलान मतों की गिनती से पहले करे, न कि मतगणना के अंत में. किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में किसी ख़ास लोकसभा क्षेत्र में सभी मतों का मिलान पर्चे से करने की मांग की गई थी.

लेकिन चुनाव आयोग ने इस मांग को ख़ारिज कर दिया.

इससे पहले, मतगणना में 100 फ़ीसदी वीवीपैट पर्चियों के मिलान की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने भी ख़ारिज कर दिया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ही चुनाव आयोग से पांच बूथों पर पर्चियों के मिलान का आदेश भी दिया था.

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Image caption अशोक लवासा

विवादों में चुनाव आयोग भी

इस चुनाव में खुद चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर आवाज़ उठते रहे और खुद चुनाव आयोग के आयुक्त इस पर एकमत नहीं दिखे.

यह बात तब निकल कर सामने आयी जब आदर्श आचार संहिता को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को क्लीन चिट दिए जाने पर चुनाव आयुक्त अशोक लवासा की एक चिट्ठी मीडिया में लीक हो गई. दरअसल, आयोग ने आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के छह मामलों में पीएम मोदी को क्लीन चिट दी थी और अशोक लवासा उससे सहमत नहीं थे.

लवासा चाहते थे कि उनकी अल्पमत की राय को भी रिकॉर्ड किया जाए. उनका आरोप था कि उनकी अल्पमत की राय को दर्ज नहीं किया जा रहा है, इसलिए इस महीने के शुरू से उन्होंने आचार संहिता से संबंधित बैठकों में जाना बंद कर दिया है. लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर बैठकों से अलग रहने की जानकारी दी थी.

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Image caption भारतीय रुपया

कितना खर्च किया गया?

एक रिसर्च के मुताबिक चुनाव लड़ने वाली पार्टियां और उम्मीदवार चुनाव के दौरान 50 हज़ार करोड़ से ज़्यादा खर्च करते हैं. यह अमरीका में 2016 में हुए राष्ट्रपति चुनाव से 10 फ़ीसदी ज़्यादा है जबकि भारत में 2014 में हुए लोकसभा चुनाव से भी डेढ़ गुना अधिक है.

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की रिपोर्ट के मुताबिक इस चुनाव में पांच हज़ार करोड़ रुपया तो सोशल मीडिया पब्लिसिटी पर खर्च किये गये हैं और 2014 के मुक़ाबले यह 20 गुना अधिक है. इस दौरान गैर क़ानूनी रूप से 850 करोड़ के कैश, शराब 300 करोड़ रुपये की जबकि बाकी नशीले पदार्थ 1,270 करोड़ रुपये के पकड़े गये हैं.

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नई सरकार के सामने चुनौतियां

अब जबकि आज यानी 23 मई को बीते दो महीने के दौरान चले मतदान का नतीजा आ रहा है. इसके बाद नई सरकार का गठन होगा. लिहाजा आने वाली नई सरकार के सामने कई चुनौतियां भी होंगी.

जिस सबसे बड़ी चुनौती से नई सरकार को निपटना होगा वो है बेरोज़गारी और ढीली पड़ती अर्थव्यवस्था. जिसकी आवाज़ पूरे चुनाव प्रचार के दरम्यान गूंजती रही है.

इसके अलावा राष्ट्रीय सुरक्षा और कृषि संकट जैसे कई बड़े मुद्दे भी होंगे जिनसे नई सरकार को मुस्तैदी से निपटना होगा. कृषि के अलावा जल संसाधन, पोषण और स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य समस्याओं पर जो चुनौतियां हैं उससे कैसे निपटा जाये, इस पर भी नई सरकार को मुस्तैदी से लगना होगा.

बीते पांच सालों के दौरान हिंदू राष्ट्रवाद का मुद्दा मुख्यधारा बन गया है, लेकिन आगे क्या होगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा?

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