मोदी को भारी बहुमतः विपक्ष में सभी होंगे लेकिन सिर्फ़ नाम के लिए

  • 24 मई 2019
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आप चाहे जैसे भी देखें, लोकसभा चुनाव के नतीजे अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हैं.

नेहरू युग के बाद 1971 में इंदिरा गांधी के दोबारा जीत कर आने के बाद से नरेंद्र मोदी केवल दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हें जनता ने दोबारा पूर्ण बहुमत से चुना है.

बीजेपी ने न केवल अपने मज़बूत पश्चिमी और उत्तरी किलों पर फ़तह हासिल की बल्कि पूरब और यहां तक की दक्षिण में भी नए रास्ते बनाये हैं.

कांग्रेस ने अपने वोट शेयर में सुधार ज़रूर किया लेकिन अपनी सीटों की संख्या में मामूली सुधार ही कर सकी.

लेकिन राहुल गांधी परिवार के गढ़ अमेठी में हार गये- कांग्रेस यहां 1999 के बाद पहली बार हारी है, आज़ादी के बाद से यह अमेठी में कांग्रेस की तीसरी पराजय है.

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मोदी का जादू

बीजेपी को यह जीत पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के कारण मिली, जो अब भारत के ऐसे सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री बन गए हैं जिसे इंदिरा गांधी के बाद देश ने देखा है. बीते पांच साल के कार्यकाल के दौरान काम करने में विफल रहे सांसदों और पार्टी के भीतर मौजूद कई ख़ामियों के बावजूद मोदी आसानी से सभी बाधाओं को पार करते हुए मतदाताओं से सीधी अपील करने में कामयाब रहे.

इसका मतलब है कि सभी वर्गों, ग्रामीण और शहरी विभाजन, जाति आदि को देखते हुए जिस सामाजिक गठबंधन के आधार पर विपक्ष बड़ी सावधानी से एकजुट हुआ था, प्रधानमंत्री से सामना होते ही बिखर गया.

नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया कि बेरोज़गारी, आर्थिक विकास और कृषि संकट जैसे सामाजिक-आर्थिक मसलों पर काबू पाने के लिए हिंदुत्व के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्धा एक बेहद मजबूत युग्म हो सकता है.

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विपक्ष का पतन

राहुल गांधी को विपक्ष की हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है और निश्चित ही उनके पास जवाब देने के लिए बहुत कुछ है. 'चौकीदार चोर है' के साथ नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत हमला करने की उनकी रणनीति एक बेहद ही ख़राब कदम था जो बुरी तरह विफल रहा.

गठबंधन करने में उनकी नाकामयाबी, प्रत्याशियों के चयन में देरी और प्रियंका गांधी को अंतिम समय में उतारने की चाल भी असफल रही.

लेकिन वास्तविकता यह है कि बीजेपी ने न केवल राहुल गांधी को बल्कि हर बड़े विपक्षी नेता को कुचल दिया है.

अखिलेश यादव और मायावती, जिन्होंने उत्तर प्रदेश में महागठबंधन बनाया था और यह कुछ चुनौती देता दिख रहा था. लेकिन आख़िरकार यह भी एक ओर बह गया.

नरेंद्र मोदी का सीधा सामना करने वाली तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को उनके ही गढ़ पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी की हार का अपमान सहना पड़ा.

यहां तक कि उनके पूर्व सहयोगी जिन्होंने उन्हें आड़े हाथ लेने की कोशिश की, उन्हें भी उनकी जगह दिखा दी- चाहे वो ओडिशा में नवीन पटनायक हों या टीएसआर नेता के चंद्रशेखर राव जिन्होंने खुद को प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में भी पेश करते हुए दक्षिण में विपक्षी गठबंधन बनाने की कोशिश की.

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विस्तारवादी बीजेपी

भारत का राजनीतिक मानचित्र आज बीजेपी के शानदार प्रदर्शन का प्रतिबिंब है. जो बात सबसे असाधारण है वो यह कि बीजेपी गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में 2014 की ही तरह ही लगभग सभी सीटों को जीतने के अपने प्रदर्शन को दोहराने में कामयाब रही है. (इस रिपोर्ट के फाइल होने तक के रुझानों और परिणामों के अनुसार)

भले ही बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में सीटें गंवाई है, लेकिन उनसे इतनी सीटों पर जीत की उम्मीद भी नहीं की गई थी. बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और असम जैसे राज्यों में इसने अपने पहले के प्रदर्शन में सुधार भी किया.

लेकिन बीजेपी की मोदी-शाह जोड़ी को इस बात की सबसे अधिक खुशी होगी कि पार्टी ने नए इलाकों में अपनी पहुंच बनाई है.

बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना में बीजेपी ने विपक्ष के रूप में पहले की तुलना में अपना जनाधार बढ़ाया है और यह यहां की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए निश्चित ही ख़तरा है, खास कर बंगाल और ओडिशा में.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी का प्रदर्शन शानदार रहा, यहां तक कि खुद पार्टी को इसकी उम्मीद नहीं रही होगी. बीजेपी और संघ परिवार खास कर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को इस बात की खुशी होगी कि यह जीत वामपंथियों के बदले में मिली है.

कभी वामपंथियों का गढ़ रहे बंगाल से आज एक भी वामपंथी सांसद नहीं है.

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वंशवाद का ख़ात्मा

अमेठी में राहुल गांधी की हार देश के कई इलाकों में परिवार और वंशवाद की राजनीति की हार का प्रतिबिंब भी है.

हालांकि हिमाचल प्रदेश से अनुराग ठाकुर, राजस्थान से दुष्यंत सिंह और महाराष्ट्र से पूनम महाजन कुछ ऐसे नाम हैं जो बीजेपी में राजनीतिक परिवार से आने वाले नेता हैं- लेकिन वंशवाद की राजनीति के लिए विपक्ष की कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का ही नाम आता है. और लोगों ने इनमें से कई नेताओं को खारिज कर दिया. राहुल के अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितेन प्रसाद, अशोक चह्वाण जैसे कांग्रेसी वंशवादी नेता हैं जो हार गये.

इसके अलावा मुलायम सिंह यादव की बहु डिंपल यादव और उनके भतीजे धर्मेंद्र यादव, लालू यादव की बेटी मीसा भारती और टीआरएस नेता तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर की बेटी कविता भी हैं. (इस रिपोर्ट के फाइल होने तक के रुझानों और परिणामों के अनुसार)

निश्चित ही, कनिमोई और भतीजे दयानिधि मारन की जीत के साथ करुणानिधि के डीएमके घराने के कुछ ऐसे लोग भी हैं जो हार से बच गये. लेकिन यह साफ़ है कि वोट पाने के लिए अब आपके पास केवल परिवार के नाम ही काफी नहीं होगा. कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार शायद यह स्पष्ट करती है.

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दक्षिण ने कांग्रेस को बचाया

तो आख़िर इस चुनाव के बाद भारत की सबसे पुरानी पार्टी अब कहां खड़ी है? यदि दक्षिण के राज्य में उसे जीत न मिली होती तो यह उनका अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन होता.

जिन 50 के क़रीब जिन सीटों पर उन्हें जीत मिली है उनमें से लगभग 30 दक्षिण के राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना से हैं. बाकी ज़्यादातर सीटें पंजाब से आई हैं.

लेकिन तथ्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में उनका सफ़ाया हो गया है जबकि हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में वो वोट भुनाने में नाकाम रहे वहीं छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी हार गये जहां कुछ दिनों पहले ही हुए विधानसभा चुनावों में उन्हें जीत मिली थी.

राहुल गांधी का नेतृत्व गंभीर सवालों के घेरे में है लेकिन यह भी स्पष्ट है कि उनकी बहन प्रियंका भी प्रभाव छोड़ने में विफल रही हैं. तो, क्या कांग्रेस वैकल्पिक नेतृत्व की तलाश करेगी?

अब उल्लेखनीय यह है कि एनडीए को लोकसभा में भारी बहुमत हासिल है. और जैसा कि संभावना है, यदि जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी भी एनडीए का समर्थन करती है तो यह निचले सदन में दो तिहाई का आंकड़ा पार कर जायेगी. इसका मतलब यह होगा कि विपक्ष में सभी होंगे लेकिन केवल नाम के लिए.

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