इन राजनीतिक परिवारों के लिए चुनाव कितना बड़ा झटका?

  • 25 मई 2019
राहुल गांधी, सिंधिया, मीसा इमेज कॉपीरइट Getty Images

लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों में बीजेपी ने साल 2014 की जीत के आंकड़ों को भी ध्वस्त कर दिया है. अकेले बीजेपी को 303 सीटें मिली हैं तो वहीं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को 350 सीटों पर जीत मिली है.

इन आंकड़ों ने साल 2014 की जीत को पीछे छोड़ दिया है जिसमें बीजेपी को 282 और एनडीए को 336 सीटें मिली थीं.

मोदी के नाम की इस आंधी में ना उत्तर प्रदेश और बिहार का गठबंधन काम आया और ना ही कांग्रेस की 'न्याय योजना' काम कर सकी. साल 2014 से साल 2019 के बीच देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस आठ सीटें ही ज्यादा जोड़ सकी.

साल 2014 में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई थी. इस बार मोदी लहर में कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों के वो नेता भी हार गए जिनकी पुश्तों ने कभी सियासी हार का चेहरा नहीं देखा.

जानिए राजनीति के ऐसे ही परिवारों की कहानी जो इस बार शायद पहली बार अपने गढ़ में पटखनी खा गए.

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अमेठीः गांधी परिवार की सीट से राहुल गांधी की हार

बीते गुरुवार तक देश में कांग्रेस की दो सीटें अमेठी और रायबरेली सबसे सुरक्षित मानी जाती रही हैं लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद ही कांग्रेस को अपने ही गढ़ से सबसे बड़ा झटका लगा है. अमेठी में राहुल गांधी को बीजेपी उम्मीदवार स्मृति ईरानी ने 55 हज़ार वोटों से हराया है.

ये झटका कांग्रेस के लिए देश भर में उसकी बुरी हार से भी बड़ा झटका है. साल 2014 में कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली थी और ऐसे वक्त में भी राहुल गांधी ने स्मृति ईरानी को एक लाख वोटों के अंतर से हराया था.

कांग्रेस ने देश में भले आठ सीटें बढ़ा ली हों लेकिन अपना गढ़ उसके हाथ से फिसल गया.

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अमेठी सीट और गांधी परिवार के रिश्ते पर एक नज़र डालें तो साल 1980 में संजय गांधी ने यहां से चुनाव जीता और उनकी मौत के बाद 1981 में हुए उपचुनाव में अमेठी ने राजीव गांधी को सांसद बनाया. इसके बाद राजीव गांधी ने 1984 में,1989 में और 1991 में इस सीट से जीत दर्ज की.

साल 1991 और 1996 में गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले कैप्टन सतीश शर्मा ने इस सीट पर जीत दर्ज की. इसके बाद 1998 में बीजेपी उम्मीदवार संजय सिंह को जीत मिली लेकिन 13 दिन में ही अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के गिर जाने के बाद साल 1999 में दोबारा चुनाव हुए.

साल 1999 में सोनिया गांधी ने राजनीति में एंट्री ली और अमेठी को फिर कांग्रेस की झोली में पहुंचाया. साल 2004 से राहुल गांधी इस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं और तीन बार अमेठी से सांसद रह चुके हैं. ये राहुल गांधी के सियासी करियर की पहली हार है.

हालांकि राहुल गांधी ने इस बार केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ा था जहां से उन्हें 4 लाख से ज़्यादा वोटों से जीत हासिल हुई. जाहिर है इस बार भी वो संसद में पहुंच तो रहे हैं लेकिन इस बार उनका पता नया होगा.

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सिंधिया परिवारः वाजपेयी को हराया आज मोदी लहर में खुद हारे

ग्वालियर के सिंधिया राजघराने से ताल्लुक रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना सीट से एक लाख 25 हज़ार वोटों से हारे हैं, और उन्हें हराया है बीजेपी उम्मीदवार कृष्णपाल सिंह ने.

पिता माधवराव सिंधिया के निधन के बाद साल 2002 में हुए उपचुनाव से ज्योतिरादित्य ने राजनीति में कदम रखा. गुना सीट से ये उनका पांचवा टर्म था लेकिन दो पुश्तों से गुना में जीतने वाले सिंधिया परिवार को इस बार जनता ने बड़ी हार दी है.

सिंधिया परिवार के दम का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गुना से चुनाव लड़ने वाले माधव राव सिंधिया को जब साल 1984 में कांग्रेस ने ग्वालियर से अपना उम्मीदवार बनाया तो उन्होंने बड़े वोटों के अंतर से बीजेपी ने दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी को हरा दिया.

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गुना सीट पर सिंधिया परिवार का ऐसा असर रहा कि सिंधिया परिवार किस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है ये कभी मुद्दा नहीं रहा. गुना में हुए कुल 20 चुनाव में से 14 चुनाव सिंधिया परिवार के शख़्स ने ही जीता.

ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी विजया राजे सिंधिया कांग्रेस, स्वतंत्र पार्टी और बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ चुकी हैं, वहीं पिता माधव राव सिंधिया पहले जनसंघ और फिर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते.

साल 2001 से राजनीति में कदम रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हमेशा कांग्रेस के टिकट पर चुनाव ही लड़ा है और ये उनकी पहली हार है.

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कभी लोहिया की सीट रही कन्नौज को नहीं बचा सकीं डिंपल

देश के बड़े सियासी कुनबे मुलायम सिंह यादव की बहू डिंपल यादव इस बार समाजवादी पार्टी की पारंपरिक सीट कन्नौज नहीं बचा सकीं. बीजेपी उम्मीदवार सुब्रत पाठक ने उन्हें 12 हज़ार से ज़्यादा वोटों से हरा दिया.

कन्नौज वो सीट है जहां से समाजवाद की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले राम मनोहर लोहिया ने 1967 में चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. मुलायम सिंह यादव साल 1999 में इस सीट से सांसद का चुनाव लड़े.

इसके बाद साल 2000 से लेकर 2012 तक तीन बार अखिलेश यादव इस सीट से चुनाव जीतकर सांसद बने, लेकिन साल 2012 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्हें ये सीट छोड़नी पड़ी. यहीं से कन्नौज में डिंपल ने जीत हासिल की. अखिलेश यादव के सीट छोड़ने के बाद इस सीट पर उपचुनाव हुआ और खास बात ये रही कि उनके सामने बसपा, कांग्रेस और बीजेपी ने उम्मीदवार ही नहीं उतारा.

इसके बाद साल 2014 में डिंपल यादव अपनी सीट बचाने में कामयाब रहीं लेकिन 2019 की मोदी लहर उन पर इतनी भारी पड़ी की वो कन्नौज जैसी अपनी सुरक्षित मानी जाने वाली सीट तक नहीं बचा पाईं.

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लालू यादव परिवार की साख़ नहीं बचा पाईं मीसा

लालू प्रसाद की बेटी मीसा भारती बिहार की पाटलिपुत्र सीट पर बीजेपी उम्मीदवार राम कृपाल यादव से 39 हज़ार वोटों से हार गईं.

पाटलिपुत्र सीट का इतिहास ज़्यादा पुराना नहीं है, साल 2008 से अस्तिव में आई इस सीट पर पहला चुनाव साल 2009 में हुआ. तब आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव इस सीट पर चुनाव लड़े लेकिन जेडीयू के रंजन प्रसाद यादव से उन्हें हार का सामना करना पड़ा.

इसके बाद साल 2014 में इस सीट पर मीसा भारती को टिकट दिया गया. इस सीट से टिकट ना मिलने पर आरजेडी के कद्दावर नेता राम कृपाल यादव ने बीजेपी का दामन थाम लिया और बीजेपी के टिकट पर पाटलिपुत्र से चुनाव लड़ा. और मीसा भारती अपनी ही पार्टी के पुराने साथी राम कृपाल से लगभग 40 हज़ार वोटों से हार गईं.

इस बार वो इस सीट पर अपनी जीत दर्ज कराने के इरादे से तो जीतीं लेकिन फिर राम कृपाल यादव ने अपनी पुरानी जीत दोहराते हुए उन्हें लगभग पुराने मार्जिन से ही हरा दिया है.

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चौधरी विरासत की साख़ नहीं बचा सके चौधरी अजित सिंह

राष्ट्रीय लोकदल के प्रमुख चौधरी अजित सिंह को बीजेपी उम्मीदवार संजय बालियान ने मुज़्जफ़्फरनगर सीट से महज 6500 वोटों के अंतर से हरा दिया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा चेहरा माने जाने वाले अजित सिंह इस चुनाव में अपनी सीट नहीं बचा सके.

देश के पांचवे प्रधानमंत्री रहे चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह की जाट समुदाय पर अच्छी पकड़ रखते हैं. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कृषि मंत्री और मनमोहन सरकार में उड्डयन मंत्री रहे अजीत सिंह और उनकी पार्टी के लिए ये एक बड़ा झटका है.

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मुज़्जफ़्फरनगर से हार अजित सिंह के लिए नयी नहीं है, साल 1971 में चौधरी चरण सिंह ने मुज़्जफ़्फरनगर से अपना पहला चुनाव लड़ा और उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा था.

ना सिर्फ़ अजित सिंह बल्कि उनके बेटे जयंत चौधरी भी बागपत सीट नहीं बचा सके. बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने उन्हें लगभग 23 हज़ार वोटों से हरा दिया. साल 2009 में जयंत चौधरी ने मथुरा से चुनाव लड़ा और सांसद बने.

हालांकि चौधरी परिवार की पारंपरिक सीट बागपत के लिए उनका चेहरा नया नहीं है. इस सीट से चौधरी चरण सिंह 1971 के बाद तीन बार सांसद रहे वहीं उनके बेटे अजित सिंह छह बार इस सीट से जीत हासिल रह चुके हैं. लेकिन साल 2014 में बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने ये सीट बीजेपी के खाते में डाल दी और इस बार भी चौधरी परिवार अपने गढ़ को नहीं बचा सका.

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हरियाणा में सियासी ज़मीन खोता चौटाला परिवार

देश के सबसे युवा सांसद का रिकॉर्ड दर्ज करने वाले दुष्यंत चौटाला को इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है. हरियाणा की हिसार सीट से दुष्यंत चौटाला को बीजेपी उम्मीदवार बृजेंद्र सिंह ने तीन लाख से ज़्यादा वोटों से हराया है.

राज्य की सभी 10 सीटों पर बीजेपी को जीत हासिल हुई है और अब राज्य की राजनीति में कभी कांग्रेस और बीजेपी को कड़ी चुनौती देने वाला चौटाला परिवार पूरे सीन से ग़ायब सा नज़र आने लगा है. इंडियन नेशनल लोकदल यानी इनेलो का चुनावों में बड़े नुकसान का सिलसिला इस बार भी जारी रहा. इसकी बड़ी वजह चौटाला परिवार में कलह को माना जाता है.

कभी हरियाणा में नारा हुआ करता था-हरियाणा तेरे तीन लाल, बंसीलाल, देवीलाल, भजनलाल.

देवीलाल चौटाला को भारत की राजनीति में किंगमेकर माना जाता था. देवीलाल चौटाला राज्य में दो बार मुख्यमंत्री रहे. चंद्रशेखर सरकार में उप प्रधानमंत्री रहे. उनके बेटे ओम प्रकाश चौटाला भी राज्य के मुख्यमंत्री रहे.

परिवार की लड़ाई में साल 2018 में इनेलो टूटी और जननायक जनता पार्टी यानी जेजेपी का गठन हुआ. दरअसल ओम प्रकाश चौटाला ने अपने बेटे अजय चौटाला को पार्टी से निकाल दिया और फिर जेजेपी बनी.

साल 2014 में इनेलो के टिकट पर जीत हासिल करने वाले दुष्यंत इस बार अपनी पार्टी के दम पर चुनाव नहीं जीत सके. राज्य में जेजेपी और आम आदमी पार्टी ने गठबंधन किया लेकिन चौटाला परिवार को इससे भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

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