लोकसभा चुनाव 2019: मोदी लहर के बावजूद नायक बनकर उभरे ये नेता

  • 24 मई 2019
जगनमोहन रेड्डी, नवीन पटनायक, एमके स्टालिन इमेज कॉपीरइट Getty Images/ FACEBOOK/@MKSTALIN

लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी को मिले जबरदस्त बहुमत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को इन चुनावों का नायक बना दिया. मोदी लहर में कई बड़े नेता हार गए और उनके किलों में सेंध लग गई.

इस प्रचंड बहुमत में न सिर्फ़ बीजेपी के उम्मीदवार जीते बल्कि उन्होंने बड़े अंतर से ये जीत हासिल की. उत्तराखंड, हिमाचल, गुजरात जैसे राज्यों में तो बीजेपी ने सभी सीटें झपट ली.

लेकिन, इस बीच कुछ राज्य ऐसे भी रहे जहां मोदी का जादू नहीं चल सका और क्षेत्रीय पार्टियों ने जीत हासिल की. चुनावी जंग में मोदी और शाह के अलावा जो नायक बनकर उभरे उनमें ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगनमोहन रेड्डी और डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन का नाम है. इन्होंने अपने-अपने किलों में बीजेपी की सेंध नहीं लगने दी.

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नवीन पटनायक

नवीन पटनायक ने लगातार पांचवीं बार ओडिशा के मुख्यमंत्री बनकर इतिहास रचा है. यह देश में पहली बार हुआ है कि किसी नेता को जनता ने पांच बार सीएम पद के लिए बहुमत दिया हो.

ये जीत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश भर में मोदी लहर के बीच बीजू जनता दल (बीजेडी) ने ये कमाल कर दिखाया है.

बीजेपी की रणनीति थी कि अगर उत्तर भारत में उसे कुछ सीटों के नुकसान होता है तो वो इसकी भरपाई दक्षिण और दक्षिण-पूर्व भारत से कर ले.

इसी रणनीति के तहत करीब एक डेढ़ साल पहले से ही बीजेपी ने नज़रें ओडिशा पर गड़ा दी थीं. ओडिशा में प्रभावी माने जाने वाले आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी ने अपना असर बढ़ाने की कोशिश भी की.

लेकिन, फिर भी बीजेपी ओडिशा में कामयाब नहीं हो पाई. ओडिशा में कुल 21 सीटों में से बीजेडी ने 12 सीटों पर जीत हासिल की और बीजेपी के खाते में 8 सीटें आईं.

ओडिशा में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हुए और वो मोदी लहर से अछूते रहे. बीजेडी ने 95 और बीजेपी ने 19 सीटें हासिल की हैं और नवीन पटनायक पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं.

विश्लेषक इस ऐतिहासिक जीत की वजह नवीन पटनायक की लोकप्रियता और उनकी कल्याणकारी योजनाओं को बताते हैं. जैसे प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना की तरह ही ओडिशा में कालिया किसान योजना पहले से ही चल रही थी. इसी तरह ओडिशा खाद्य सुरक्षा योजना और बीजू स्वास्थ्य कल्याण योजना भी महत्वपूर्ण रही हैं.

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वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर कहती हैं, ''ओडिशा में नवीन पटनायक बहुत लोकप्रिय नेता हैं और वो लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाएं भी लाते रहते हैं. उनकी छवि सादगी भरी है और उन पर कोई भी भ्रष्टाचार के आरोप नहीं. उनका परिवार नहीं है जिसके लिए कुछ किए जाने के आरोप लगे हों.''

नवीन पटनायक साइलेंट किलर भी बोला जाता है जो चुपचाप अपना काम कर जाते हैं. कल्याणी शंकर का कहना है कि ये हैरानी वाली बात है कि किसी मुख्यमंत्री की पांचवीं बार भी लोकप्रियता कम न हुई हो. वो उड़िया नहीं जानते और लोगों की उन तक पहुंच भी आसान नहीं है फिर भी लोग उन्हें पसंद करते हैं.

उनकी एक और खासियत ये भी रही कि उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर कुछ नहीं बोला. पश्चिम बंगाल में जिस तरह ममता बनर्जी ने बीजेपी और नरेंद्र मोदी का विरोध किया वो आक्रामकता नवीन पटनायक ने नहीं दिखाई. वो राज्य में अपनी सरकार और उसकी योजनाओं की बात करते हैं और इस तरह लोगों का ध्यान अपनी पार्टी की तरफ़ बनाए रखते हैं.

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जगनमोहन रेड्डी

चुनावी जंग में एक बड़े विजेता बनकर उभरे हैं जगनमोहन रेड्डी, जिनकी युवाजन श्रमिक रायतु (वाईएसआर) कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश से तेलगुदेशम पार्टी का सूपड़ा साफ कर दिया.

आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ हुए हैं. दोनों में ही जहां टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू पटल से गायब हो गए वहीं बीजेपी खाता ही नहीं खोल पाई.

लोकसभा चुनाव में वाईएसआर कांग्रेस को 22 और टीडीपी को तीन सीटें हासिल हुई हैं. वहीं, विधानसभा चुनाव में वाईएसआर के हिस्से 150 और तेलुगू देशम के खाते में 22 सीटें आई हैं.

दोनों चुनावों के नतीजे देखें तो आंध्र प्रदेश के बाहर जहां मोदी लहर थी वहीं राज्य में जगनमोहन रेड्डी की लहर दिखी. लेकिन, जगनमोहन रेड्डी पिछले दो विधानसभा चुनावों से संघर्ष कर रहे हैं.

2009 से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले जगनमोहन का परिवार लंबे समय से राजनीति से जुड़ा रहा है. पहली बार वह कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में संसद पहुंचे. उनके पिता राजशेखर रेड्डी की एक हेलिकॉप्टर हादसे में मृत्यु के बाद उनकी कांग्रेस से तकरार शुरू हो गई थी.

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कांग्रेस में उन्हें अपने पिता जितना महत्व नहीं मिला तो उन्होंने अलग होने का फैसला कर लिया. 2011 में वाईएसआर कांग्रेस के गठन की घोषणा की और अलग पहचान बनाने में जुट गए. उन्होंने आंध्र प्रदेश के विभाजन के फैसले पर भूख हड़ताल की. विशेष राज्य का दर्जा न मिलने पर राज्य सरकार का खुलकर विरोध दिया. 2014 के विधानसभा चुनावों में उन्हें 175 में से 67 सीटें मिलीं और वो विपक्ष के नेता की भूमिका में आ गए.

जगनमोहन रेड्डी की सफ़लता पर राजनीतिक विश्लेषक टीआर रामचंद्रन कहते हैं, ''उन्होंने एक साल तक पदयात्रा करके लोगों से जुड़ने की कोशिश की और कांग्रेस से अलग अपनी पहचान बनाई. वो लगातार लोगों की नज़रों में बने रहे. साथ ही चंद्रबाबू नायडू भी अपने वायदे पूरे करने में असफल रहे. उनका सारा ध्यान अमरावती को राजधानी बनाने पर रहा. विशेष राज्य के दर्जे के मामले में भी वो बैकफुट पर चले गए.''

''दूसरी तरफ़ जगनमोहन रेड्डी ये बोलते रहे हैं कि जो भी आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देगा हम उसका समर्थन करेंगे. कुछ उनकी अपनी मेहनत तो कुछ चंद्रबाबू नायडू की नाकामी ने उनकी जीत की पटकथा लिख दी.''

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एमके स्टालिन

हर राज्य में अपनी पकड़ बढ़ाने वाली बीजेपी तमिलनाडु में घुसने में नाकामयाब रही है. दक्षिण भारत जीतने की अपनी रणनीति के तहत बीजेपी ने तमिलनाडु में भी पैठ बनाने का प्रयास किया, लेकिन विफल रही.

डीएमके को लोकसभा चुनावों में 38 में से 23 सीटें हासिल हुईं हैं और आठ सीटें कांग्रेस के खाते में गई हैं.

करुणानिधि के जाने के बाद उनके नेतृत्व में ये पहला चुनाव था. करुणानिधि ने जाने से पहले पार्टी की कमान उनके हाथ में सौंप दी थी. उन्हें अपने भाई अलागिरी से विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन पार्टी पर उनकी पकड़ मजबूत होती गई.

कल्याणी शंकर कहती हैं, ''स्टालिन अपने पिता की तरह चमत्कारिक व्यक्तित्व के तो नहीं हैं लेकिन वो मेहनती बहुत हैं. उन्होंने कांग्रेस और कुछ छोटे दलों के साथ गठबंधन किया जो एक अच्छी रणनीति साबित हुई.''

''हालांकि, जयललिता की मौत के बाद एआईएडीएमके का कमज़ोर होना भी एक बड़ा कारण रहा. एआईएडीएमके तीन हिस्सों में बंट गई है. मुख्यमंत्री पलानीसामी, उप मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम और शशिकला के भतीजे दिनाकरन पार्टी के तीन धड़े बन गए. फिर एआईएडीएमके ने बीजेपी के साथ गठबंधन किया जिसका तमिलनाडु में कोई आधार नहीं रहा है.''

''तमिलनाडु में ये चलन भी रहा है कि एक बार एआईडीएमके आती है तो दूसरी बार डीएमके. ऐसे में इस बार डीएमके को वोट मिलने की पहले से भी संभावना थी.''

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