ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ में सेंध लगाने वाला 'उनका फ़ॉलोवर' केपी यादव कौन?

  • 24 मई 2019
केपी यादव इमेज कॉपीरइट Facebook/KP Yadav

मध्य प्रदेश के बीजेपी नेता और अब गुना संसदीय क्षेत्र से नव-निर्वाचित सांसद कृष्ण पाल सिंह यादव की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है.

सोशल मीडिया पर इस दावे के साथ शेयर किया जा रहा कि वो कभी कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ सेल्फ़ी लेने के लिए उनकी गाड़ी के आगे-पीछे भागा करते थे और अब उन्होंने सिंधिया को हराकर लोकसभा चुनाव जीत लिया है.

वायरल हो रही तस्वीर में केपी यादव के चेहरे पर गोला किया गया है और उनके पीछे खड़ी एक एसयूवी कार में ज्योतिरादित्य सिंधिया बैठे हुए दिखाई देते हैं.

मध्य प्रदेश के चंबल रीजन में पड़ने वाली गुना संसदीय सीट पर वोटिंग के छठे चरण (12 मई 2019) में वोट डाले गये थे और गुरुवार को आये चुनावी नतीजों के अनुसार केपी यादव ने एक लाख 25 हज़ार 549 वोटों से ज्योतिरादित्य सिंधिया को हराकर यह सीट अपने नाम कर ली है.

चुनाव आयोग के अनुसार केपी यादव को गुना संसदीय क्षेत्र के कुल 11,78,423 वोटों में से 52.11 प्रतिशत यानी 6 लाख 14 हज़ार से ज़्यादा वोट मिले हैं.

सैकड़ों बार फ़ेसबुक और ट्विटर पर पोस्ट की जा चुकी इस वायरल सेल्फ़ी के साथ लोगों ने लिखा है कि 'केपी यादव की जीत, लोकतंत्र की जीत है'.

क़रीब दो सौ लोगों ने व्हाट्सऐप के ज़रिये यह तस्वीर बीबीसी को भेजी है और केपी यादव से जुड़े 'ज्योतिरादित्य सिंधिया वाले दावे' की सच्चाई जाननी चाही है.

वायरल फ़ोटो की कहानी

रिवर्स इमेज सर्च से पता चलता है कि कृष्ण पाल सिंह यादव ने 13 जुलाई 2017 को यह 'वायरल' सेल्फ़ी अपने पर्सनल फ़ेसबुक अकाउंट से पोस्ट की थी.

मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़-चंबल के बाद ग्वालियर से विंध्य क्षेत्र के ज्योतिरादित्य सिंधिया के दौरे के समय सिहोर ज़िले में केपी यादव ने यह तस्वीर क्लिक की थी.

ज्योतिरादित्य सिंधिया सिहोर ज़िले में स्थित पालखेड़ी गाँव में कर्ज़ के कारण आत्महत्या करने वाले किसान बाबूलाल मालवीय के परिवार से मिलने पहुँचे थे.

कृष्ण पाल सिंह यादव की टीम के लोग बताते हैं कि केपी यादव गुना संसदीय क्षेत्र में पड़ने वाले ज़िला अशोकनगर के सांसद प्रतिनिधि रहे हैं.

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'सिंधिया फैंस क्लब' चलाते थे...

अपने लोकसभा क्षेत्र में लोगों की समस्याओं से संबंधित जो पत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को लिखे, उनमें से कुछ पत्रों की कॉपियाँ केपी यादव के पर्सनल फ़ेसबुक अकाउंट में हमें मिलीं.

उनके फ़ेसबुक अकाउंट से हमें एक पत्र ऐसा भी मिला जिसके अनुसार जुलाई 2015 में केपी यादव को 'श्रीमंत सिंधिया फ़ैंस क्लब, मध्य प्रदेश' का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया था.

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सिंधिया परिवार के वो बेहद क़रीब रहे हैं, इसकी तस्दीक करने के लिए फ़ेसबुक पर ज्योतिरादित्य के साथ उनकी कई अन्य तस्वीरें देखी जा सकती हैं.

20 अप्रैल 2019 को चुनाव आयोग को दिये अपने नामांकन पत्र में केपी यादव ने लिखा था कि वो अशोकनगर ज़िले में विदिशा बाइपास रोड पर स्थित स्टैंडर्ड हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के मालिक हैं. 2015 में उनके इस हॉस्पिटल का उद्धाटन करने ज्योतिरादित्य सिंधिया ही बतौर मुख्य अतिथि पहुँचे थे.

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Image caption हॉस्पिटल का उद्धाटन करने ज्योतिरादित्य सिंधिया बतौर मुख्य अतिथि पहुँचे थे. भूरे रंग की कमीज में केपी यादव

बीजेपी में कैसे पहुँचे?

केपी यादव के अनुसार वो अपने नाम के आगे 'सम्मानसूचक उपाधि' के तौर पर डॉक्टर लिखते हैं.

अशोकनगर ज़िले के स्थानीय लोग बताते हैं कि ज़िले में अपना बड़ा प्राइवेट अस्पताल खुलने के बाद केपी यादव का काम (व्यापार) और उनका क़द तेज़ी से बढ़ा. साथ ही उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाएं भी बढ़ीं.

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार फ़रवरी 2018 में मध्य प्रदेश की मुंगावली विधानसभा सीट पर हुए उप-चुनाव में केपी यादव ने ज्योतिरादित्य सिंधिया से अपने लिए टिकट मांगा था. लेकिन केपी यादव की जगह ब्रिजेंद्र सिंह यादव को मुंगावली विधानसभा सीट से टिकट दिया गया और वो जीत भी गए.

लेकिन ख़बरों के अनुसार केपी यादव का अपने नेता से मन खट्टा हो गया और उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया.

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Image caption दाएं हाथ पर पार्टी कैंपेनिंग के दौरान केपी यादव

सिंधिया को दी टक्कर

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने केपी यादव को सीधे ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनौती देने का अवसर दिया. वही सिंधिया जिनके एक क़रीबी फ़ॉलोवर के तौर पर यादव ने लंबे समय तक काम किया था.

केपी यादव ने प्रचार के लिए या कहें कि मध्य प्रदेश में सिंधिया का विजय रथ रोकने के लिए यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी समेत बीजेपी के कई अन्य बड़े नेताओं ने गुना संसदीय क्षेत्र में जमकर प्रचार किया.

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साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी की लहर को 2019 की तुलना कहीं ज़्यादा प्रचंड बताया गया था तब ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी लोकसभा सीट को बचा पाने में सफल रहे थे.

लेकिन इस बार सिंधिया घराने का गढ़ मानी जाने वाली गुना लोकसभा सीट पर पहली बार सिंधिया परिवार से जुड़े किसी प्रत्याशी को हार का मुँह देखना पड़ा है.

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