प्रियंका गांधी का जादू उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं चला? - नज़रिया

  • 25 मई 2019
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साल- 2014, महीना- मई, स्थान - 24 अकबर रोड, कांग्रेस मुख्यालय.

लोकसभा चुनाव के ताज़ातरीन परिणाम आए थे. कांग्रेस औंधे मुंह गिरी थी. मात्र 44 सीटों पर सिमट गई थी. कांग्रेस समर्थक अपनी अध्यक्ष सोनिया गांधी से ज़्यादा उपाध्यक्ष राहुल गांधी को लेकर नाराज़ थे.

बाकायदा नारे लगे थे कि "प्रियंका लाओ कांग्रेस बचा." उस समय कांग्रेस को प्रियंका गांधी एकमात्र तारणहार लग रही थीं.

लेकिन ना कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस पर कुछ बोले ना ही अध्यक्ष. उस समय कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का जवाब होता था कि देखिए राहुल गांधी तेज़ी से बदल रहे हैं और आप देखिएगा कि वो बहुत बढ़िया करेंगे.

प्रियंका को ज़िम्मेदारी

ख़ैर राहुल गांधी वाकई बढ़िया काम करने लगे. गुजरात में विजय के नज़दीक रहे और राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस ने बाकायदा राज्य में सरकार बनाई.

राहुल गांधी के आक्रामक तरीक़े को देखते हुए कांग्रेस कार्यकर्ता भी शांत होने लगे. उसके बाद लोकसभा चुनाव से क़रीब चार महीने पहले उन्होंने अचानक ही प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में उतारा.

प्रियंका गांधी को महासचिव का पद देते हुए पूर्वांचल का प्रभारी बनाया. प्रियंका पार्टी की पारंपरिक रायबरेली और अमेठी सीट पर ही सक्रिय रही हैं और चुनाव से ठीक पहले उन्हें यह ज़िम्मेदारी मिलने पर कुछ लोग इसे कांग्रेस की ख़ास रणनीति का हिस्सा बताने लगे थे.

उन्‍हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की ज़िम्‍मेदारी दी गई जिसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गढ़ माना जाता रहा है.

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जहां प्रचार किया वहां मिली हार

जब प्रियंका गांधी को महासचिव बनाया गया, तो कुछ नेताओं ने इसे कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक बताया था. लेकिन कई नेताओं ने इसे कांग्रेस द्वारा जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला बताया.

चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गांधी ने कुल 38 रैलियां कीं, जिनमें से 26 उत्तर प्रदेश में थीं. मध्य प्रदेश, दिल्ली, झारखंड और हरियाणा में भी कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए उन्होंने प्रचार किया.

लेकिन जिन निर्वाचन क्षेत्रों में प्रियंका ने कांग्रेस के लिए वोट मांगे, उसमें से 90 फ़ीसदी सीटों पर कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा.

वैसे भी भारत की राजनीति में उत्तर प्रदेश की ख़ास भूमिका रही है, क्योंकि लोकसभा में प्रतिनिधित्व के मामले में यह सबसे बड़ा राज्य है, जहां से 543 में से 80 लोकसभा सदस्य चुनकर आते हैं.

पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुल 41 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट वाराणसी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ गोरखपुर, अखिलेश यादव का निर्वाचन क्षेत्र आज़मगढ़, अफ़ज़ाल अंसारी का क्षेत्र ग़ाज़ीपुर और कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले अमेठी और रायबरेली जैसे संसदीय क्षेत्र शामिल हैं.

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कहां चूक गईं प्रियंका?

उत्तर प्रदेश में, कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत अधिक निराशाजनक रहा. कांग्रेस को केवल एक सीट पर जीत मिली है. उसमें भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी सीट तक बचा नहीं पाए.

कहां चूक हुई, क्या प्रियंका गांधी पर कांग्रेस ने चमत्कार की उम्मीद की थी?

प्रियंका गांधी का जलवा क्यों नहीं चला उसके कई कारण दिए जा रहे हैं.

देरी से सक्रिय राजनीति में आई प्रियंका

प्रियंका गांधी ने जब 16 साल की उम्र में भाषण दिया था तब लोगों को उनमें इंदिरा गांधी की छवि दिखी लेकिन इस बात को क़रीब 30 साल से ज़्यादा हो चुके हैं.

ऐसे में प्रियंका से उसी तेवर की उम्मीद करना कांग्रेस की भूल है. लेकिन सबसे बड़ा कारण जो बताया जा रहा है वो यह है कि प्रियंका गांधी ठीक चुनाव से पहले सक्रिय राजनीति में घुसीं.

वैसे भी रायबरेली में ज़्यादा और फिर अमेठी में चुनाव के समय घूमने वाली प्रियंका गांधी को लेकर कहा जाता था कि वो सिर्फ़ चुनाव के वक़्त ही आती हैं. लोगों का मानना था कि अगर वो राजनीति में घुसना चाहती हैं तो पहले से काम करना चाहिए था. ख़ासतौर से लोगों के सामने स्मृति इरानी का उदाहरण था जिन्होंने अमेठी में डेरा डाला था.

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वाराणसी में मुक़ाबले से बचती रहीं

प्रियंका का वाराणसी से चुनाव ना लड़ना ये बता रहा था कि वो हार से डर रही हैं. हालांकि इसमें प्रियंका की भूमिका कम और कांग्रेस पार्टी की ज़्यादा थी लेकिन अगर बार-बार चर्चा उठने के बाद प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री मोदी के सामने खड़ी हो जातीं तो मुक़ाबला अलग ही होता.

अगर वो हार जातीं तब भी उन्हें जुझारू माना जाता लेकिन प्रियंका का पलटना उनकी विश्वसनीयता पर सवाल ज़रूर डाल गया.

रॉबर्ट वाड्रा के मुद्दे पर दबती रही

प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा पर डीएलएफ़ डील को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं. ये प्रियंका की सबसे बड़ी कमज़ोरी थी. चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान ईडी कई घंटे तक रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ कर चुकी है.

प्रियंका अगर केन्द्र सरकार के रवैए पर आक्रामक होकर सवाल उठातीं तो ये मुद्दा नया रंग ले सकता था लेकिन प्रियंका गांधी इस मुद्दे पर काफ़ी भावुक दिखीं. लोगों को लगा कि वो इस मुद्दे पर बचने की कोशिश कर रही हैं.

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पूर्वी उत्तर प्रदेश में सिमटी रहीं

प्रियंका गांधी को सिर्फ़ पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में समेटने की कांग्रेस की कोशिश भी बैकफ़ायर कर गई. ये वो क्षेत्र है जिसे गांधी परिवार से जोड़कर देखा जाता है.

बीजेपी परिवारवाद को लेकर लगातार हमले किए जा रही थी. प्रियंका अगर अखिल भारतीय चुनाव प्रचार में कूदती तो बेहतर होता. एक वो देर से घुसी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही टिकी रहीं.

उनका ज़्यादा ध्यान अमेठी और रायबरेली में था जिसमें से कांग्रेस ने अमेठी गंवा दिया.

संगठन को लेकर बेरुख़ी

प्रियंका गांधी को जब कांग्रेस ने बाकायदा लॉन्च किया, उसके बाद उन्होंने काम करना शुरू किया. वो बूथ मैनेजमेंट की बात तो कर रही थीं लेकिन कुछ कर नहीं पाईं.

वैसे भी कांग्रेस ने संगठन पर ध्यान देने के बजाय व्यक्तिपरक राजनीति पर ज़्यादा ध्यान दिया. प्रियंका को इसी लॉजिक के तहत राजनीति में लाया गया था. लेकिन संगठन पर ना तो राहुल ने ध्यान दिया और ना ही प्रियंका ने.

ऐसे में कार्यकर्ताओं का मनोबल तो टूटा ही साथ ही उनके मुक़ाबले बीजेपी आरएसएस के मज़बूत संगठन थे. जहां पर एक-एक कार्यकर्ता मोहल्ले के स्तर तक काम कर रहा था.

युवाओं पर भी कांग्रेस ने कम भरोसा किया. जहां पर युवाओं पर ज़िम्मेदारी दी वो या तो बड़े परिवार से आए थे या अनुभवहीन थे. कांग्रेस युवा और अनुभव में बैलेंस नहीं कर पा रही थी.

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वोट कटवा उम्मीदवार वाला बयान

प्रियंका का वो बयान जिसमें उन्होंने कहा कि वो ऐसे उम्मीदवारों को खड़ा कर रही हैं जो वोट काटने का काम करेंगे. यानी एक तो वो अपने उम्मीदवारों से जीतने की उम्मीद नहीं कर रही थीं और दूसरा उनका लक्ष्य जनता के लिए काम करना कम और बीजेपी को हराना ज़्यादा था. हालांकि वो इस बयान से पलट गईं लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था.

हालांकि राजनैतिक पंडितों का मानना है कि प्रियंका पर ही ठीकरा फोड़ना ग़लत है. वो देर से आईं और उनके पास समय भी कम था. लेकिन ये सवालिया निशान तो कांग्रेस पार्टी पर भी लगता है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा में बुरी तरह हारने के बाद राहुल गांधी बाकायदा एक्टिव होना शुरू हुए. यानी 2019 की तैयारी के लिए तैयार होने में ही उन्होंने क़रीब साढ़े तीन साल ले लिए. अगर पार्टी ही तैयार नहीं थी तो प्रियंका गांधी कहां से होतीं.

वैसे भी कांग्रेस को लोगों तक अपना संदेश पहुंचाने में काफ़ी समय लगा. वो न्याय योजना लेकर तो आए लेकिन लोगों को इस योजना के बारे में समझा नहीं पाए.

जबकि बीजेपी ने मोदी सरकार की कई योजनाएं जैसे उज्‍जवला योजना, जन धन योजना, किसानों को छह हज़ार का मुआवज़ा, सबके लिए मकान, सभी के लिए शौचालय से ग़रीबों को सीधे लाभ दिखाया.

कांग्रेस को अगर बीजेपी से मुकाबला करना है तो प्रियंका गांधी से चमत्कार की उम्मीद के बजाय ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ताओं पर अपना विश्वास जताना होगा. अगर इस चुनाव में ऐसा होता तो शायद कांग्रेस की स्थिति बेहतर होती.

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