क्या कांग्रेस का भविष्य अब नेहरू-गांधी परिवार में नहीं है? - नज़रिया

  • रशीद किदवई
  • वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी

इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से उम्मीद की जा रही थी कि वह 2014 से बेहतर प्रदर्शन करेगी मगर 52 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी.

आलम यह रहा कि कई राज्यों में कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई.

इन नतीजों की समीक्षा के लिए शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई जिसमें अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने भी शिरकत की.

चूंकि इस हार को लेकर राहुल गांधी के नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे थे, ऐसे में इस बैठक में राहुल ने इस्तीफ़े की पेशकश की मगर कार्यसमिति से इसे ख़ारिज कर दिया.

इससे यह स्पष्ट हो गया कि आगे भी कांग्रेस का नेतृत्व राहुल गांधी ही करेंगे. ऐसे में सवाल उठता है कि आगे कांग्रेस का भविष्य कैसा नज़र आता है? क्या पार्टी लगातार बड़ी हारों से उबर पाएगी? अगर उसे फिर से वापसी करनी है तो क्या रणनीति अपनानी होगी?

कांग्रेस के लिए अस्तित्व का सवाल

कांग्रेस के लिए बहुत बड़ी चुनौती पैदा हो गई है. सवाल उसके अस्तित्व का है.

2014 में तो समझ में आता था कि 10 साल तक यूपीए सरकार थी, कुछ भ्रष्टाचार के आरोप थे और नेतृत्व की भी समस्या थी. मगर इस बार कांग्रेस पांच साल विपक्ष में बैठी थी और थोड़ा-बहुत तो फ़ायदा होना चाहिए था.

चुनावों में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने प्रचार किया था, कांग्रेस ने अच्छे गठबंधन भी किए थे. उम्मीद थी कि हाल ही में जिन राज्यों में उसकी सरकार बनी थी- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़- वहां कम से कम लगभग तीस सीटें तो आएंगी ही. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

कांग्रेस के नौ पूर्व सीएम हार गए. यहां तक कि अमेठी जिसे कि गांधी परिवार का मज़बूत क़िला माना जाता था, वहां से भी हार मिली. ऐसे में कांग्रेस के सामने बहुत बड़ा संकट है. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि क्या करें.

क्या हैं चुनौतियां

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य- राहुल गांधी और प्रियंका गांधी- फ़्लॉप हो गए हैं. मगर कांग्रेस ऐसी स्थिति में भी नहीं है कि उनसे त्याग पत्र ले सके.

प्रियंका और राहुल गांधी कांग्रेस से या फिर सक्रिय राजनीति से अलग नहीं होना चाहते. उन्हें लगता है कि अगर मोदी सरकार के दौरान उन पर कोई इल्ज़ाम लगता है या घोटालों के आरोप लगते हैं तो उन्हें एक राजनीतिक दल का समर्थन चाहिए होगा जो उनके बचाव में आए.

तो कांग्रेस के अंदर इस तरह की कश्मकश चल रही है और मुझे लगता है कि आने वाला समय कांग्रेस के लिए बड़ा मुश्किल होगा.

दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि राहुल या कांग्रेस अध्यक्ष के दफ्तर या पदों पर कुछ ऐसे महत्वपूर्ण लोग हैं जिनका कोई जनाधार नहीं है. वे पार्टी में अपनी शक्ति को नहीं खोना चाहते. वे नहीं चाहेंगे कि राहुल हटें. मतलब मामला पेचीदा है और इसका कोई हल नहीं है.

अब चूंकि राहुल गांधी ही अध्यक्ष बने रहेंगे तो ऐसे में पार्टी के भीतर किस हद तक जवाबदेही तय करेंगे? जवाबदेही की बात आएगी तो सबसे पहला प्रश्न उन पर ख़ुद भी उठेगा.

परिवार के प्रभाव से बाहर निकलना होगा

कांग्रेस इस बात को समझ नहीं पा रही कि नेहरू गांधी परिवार को लेकर उसकी जो श्रद्धा है, वही उसकी क़ामयाबी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है.

राहुल गांधी ने इस चुनाव में बहुत सी अच्छी बातें कहीं, बहुत प्रयास किए मगर जनता उनकी बात सुनना ही नहीं चाहती थी.

समस्या यहां यह है कि जो नए मतदाता हैं या जिसे हम न्यू इंडिया कहते हैं, वह जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से ऊब चुके हैं. वे एक ही परिवार से हटना चाह रहे हैं.

उन्हें लगता है कि इतने बड़े देश में कांग्रेस को दूसरा नेता सामने लाना चाहिए. यह कांग्रेस के लिए चुनौती है और कांग्रेस उसके लिए तैयार नहीं है और यही उसके लिए बड़ी अड़चन है.

जिस दिन कांग्रेस को समझ आ जाएगा कि नेहरू-गांधी परिवार का इस्तेमाल भले करें मगर राजनीतिक नेतृत्व, महत्वपूर्ण पद किसी और दें; वह समाज में निचले स्तर पर जाकर करें, उसी दिन से कांग्रेस में बदलाव शुरू हो जाएगा.

गांधी परिवार को छोड़ने होंगे अहम पद

मेरा मानना है कि नेहरू-गांधी परिवार अपने विवेक का इस्तेमाल करेगा. उन्हें पता है कि राहुल गांधी से बात नहीं बन रही है. प्रियंका गांधी राजनीति में आ चुकी हैं और उन्हें लेकर कांग्रेसियों में उत्साह है.

प्रियंका की शैली राहुल गांधी से बेहतर है. वह संवाद अच्छा स्थापित करती हैं और कार्यकर्ताओं में जोश भरने की भी उनमें क्षमता है.

लोकसभा चुनाव के दौरान प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश भेजा गया जहां कांग्रेस वैसे ही कमज़ोर थी. ऐसे में वह कुछ बदलाव नहीं दिखा सकीं.

वैसे कांग्रेस के सामने रास्ते बहुत सारे हैं. अगर उनके परिवार के अलावा कोई और कांग्रेस का अध्यक्ष बने और भले ही उसे 10 जनपथ यानी सोनिया, राहुल और प्रियंका का समर्थन हासिल हो, तो कांग्रेस के ऊपर जो आरोप लगता है कि वह नेहरू-गांधी परिवार के इर्द-गिर्द सिमटे हुए हैं, वह हट जाएगा.

दूसरी बात, बहुत से ऐसे लोग हैं जो कांग्रेस से अलग होकर गए हैं. जैसे ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी, जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस या तेलंगाना राष्ट्र समिति.

अगर कोशिश की जाए कि कांग्रेस से जुड़े रहे नेताओं के दलों का फ्रंट बनाया जाए तो इन दलों को भी लाभ होगा और कांग्रेस को भी. यह संभव है अगर सोनिया और राहुल गांधी इनसे संवाद स्थापित करें.

मगर ऐसा करने के लिए कांग्रेस के तमाम बड़े पदों पर जो परिवार की पकड़ है, वह छोड़नी होगी. चाहे संसद में हो या बाहर संगठन में. ममता, जगनमोहन रेड्डी या चंद्रशेखर राव को बड़ी भूमिकाएं देनी होंगी.

उनसे संवाद स्थापित करना, वापस लाना टेढ़ी खीर है मगर इसमें सोनिया गांधी सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं क्योंकि उनके सभी लोगों से अच्छे रिश्ते हैं.

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