"संघ कल से चुनाव की तैयारी करेगा, विपक्ष को किसने रोका?" - नज़रिया

  • 27 मई 2019
NARENDRA MODI, नरेंद्र मोदी, बीजेपी, संघ, हिंदुत्व इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में हिंदुत्व प्रभावशाली रहा है लेकिन अब हमें यह मानना होगा कि हम इस देश को समझने में सक्षम नहीं हैं.

हम कहते हैं कि हिंदुत्व का असर है, कांग्रेस गठबंधन करने में कामयाब नहीं रही.

ये थोड़े फीके, अधपके जवाब हैं. यह देश बहुत विशाल है, जहां छोटे-छोटे कस्बे और गांव हैं, यहां तक कि शहरों को भी हम समझ नहीं पा रहे हैं.

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क्यों नहीं समझ पा रहे हैं?

एक तरफ़ तो आप कह लें कि यह मोदी की जीत है तो दूसरी तरफ़ विपक्ष की करारी हार भी है. हमें यह आकलन करना होगा कि देश क्या चाहता है?

हर चीज़ का एक सीधा तर्क है. जो तर्क हमारे दिमाग में है वो फ़िट नहीं हो रहा, हम जबरदस्ती उसे फ़िट करना चाहते हैं.

तर्क यह है कि हम सब भारतीय एक शिष्टाचार में विश्वास रखते हैं. हम लालची नहीं हैं. सहनशील हैं. अहिंसावादी हैं लेकिन सचमुच ऐसा है क्या?

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संघ को कितनी मज़बूती मिलेगी?

हमारा विपक्ष उस विद्यार्थी की तरह है जो सिर्फ़ इम्तहान से पहले पढ़ना शुरू करता है लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस कल से ही अगली परीक्षा के लिए पढ़ाई शुरू कर देगा.

संघ ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी या बहुजन समाज पार्टी को यह तो नहीं कहा कि आप तैयारी मत करिए. उनके हाथ तो बंधे नहीं हैं लेकिन मुश्किल यह है कि इन पार्टियों में एक ऐसा तूफ़ान आना ज़रूरी है कि ये इस तरह सोचें कि हमेशा सिर्फ आरएसएस पर दोष मढ़ने से काम नहीं चलेगा.

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हिंदुत्व: शक्तिशाली मिथक

संघ कल से ही तैयारियां शुरू कर देगा और 2024 के लिए सीटों की पहचान की जाएगी लेकिन विपक्ष के लोग ढूंढेंगे कि किस पर आरोप मढ़ें या किस वजह से ऐसा हुआ.

अब राजनीति का परिप्रेक्ष्य बदलना पड़ेगा नहीं तो हम केवल कारण ढूंढ़ते रहेंगे. केवल यह ढूंढ़ते रहेंगे कि किसकी वजह से हुआ.

कौन कहता है कि आप हिंदुत्व जैसा एक काउंटर मिथक नहीं खड़ा करें? हिंदुत्व एक बहुत शक्तिशाली मिथक है लेकिन उसका कारगर जवाब ढूंढना भी तो विपक्ष का काम है.

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काउंटर नैरेटिव क्या होगा?

काउंटर नैरेटिव क्या होगा, उसके लिए सोचने वाले लोग चाहिए. ऐसे लोग चाहिए जो इस देश के यथार्थ को जानते हों.

इसके लिए सभी राजनीतिक पार्टियों और विपक्ष की ज़िम्मेदारी होगी लोगों को समझना, जनमानस को देखना होगा.

(बीबीसी में भारतीय भाषाओं की संपादक रूपा झा और बीबीसी रेडियो एडिटर राजेश जोशी के साथ बीबीसी रेडियो के कार्यक्रम में बातचीत पर आधारित)

(राजनीतिक दार्शनिक प्रोफ़ेसर ज्योतिर्मय शर्मा हैदराबाद विश्वविद्यालय, तेलंगाना में राजनीति विज्ञान विभाग में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर हैं)

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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