कश्मीर लोकसभा चुनाव: दक्षिणी कश्मीर से क्यों चुनाव हारीं महबूबा मुफ़्ती?

  • 27 मई 2019
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पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने साल 2016 में बीजेपी के साथ गठबंधन करके जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का इतिहास रच दिया था.

इसके ठीक तीन साल बाद ही वो अनंतनाग सीट से चुनाव हारकर महबूबा अपने राजनीतिक सफ़र के मुश्किल दौर में पहुंच चुकी हैं.

उनके सामने बगावत का स्वर झेल रही अपनी पार्टी को एक साथ जोड़कर रखने की चुनौती है.

इसके साथ ही अपने गृहनगर अनंतनाग में अपनी पार्टी से ख़फा मतदाताओं को फिर से मनाने की ज़िम्मेदारी है.

ऐसे में सवाल उठता है कि दक्षिण कश्मीर की लोकप्रिय नेता मानी जाने वाली महबूबा मुफ़्ती इस जगह तक कैसे पहुंची?

बीबीसी ने इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए उनकी संसदीय सीट के आम मतदाताओं से लेकर विशेषज्ञों से बात की.

महबूबा से क्यों रूठा दक्षिणी कश्मीर?

साल 1996 में महबूबा ने दक्षिणी कश्मीर की बिजबहेरा विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर अपने राजनीतिक सफ़र का पहला चुनाव जीता था.

इसके बाद वो दक्षिणी कश्मीर से पांच बार चुनाव लड़ चुकी हैं लेकिन साल 2019 के चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस के उम्मीदवार हसनैन मसदूदी ने महबूबा मुफ़्ती को हरा दिया है. इतना ही नहीं, वोटों के लिहाज़ से वो तीसरे नंबर पर आई हैं.

मुफ़्ती के राजनीतिक सफ़र में ये उनकी दूसरी हार है.

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इससे पहले साल 1999 में महबूबा मुफ़्ती श्रीनगर की सोनावारी सीट से उमर अब्दुल्ला से भी चुनाव हार चुकी हैं.

2014 के चुनाव में अनंतनाग से संसदीय चुनाव जीतने के बाद 2016 में अपने पिता मुफ़्ती मोहम्मद सईद की मौत के बाद उन्हें ये सीट छोड़कर मुख्यमंत्री पद संभालना पड़ा लेकिन इसके बाद से ही दक्षिणी कश्मीर में उनकी और उनकी पार्टी की लोकप्रियता में गिरावट आना शुरू हो गई.

साल 2014 में चुनाव प्रचार के दौरान महबूबा मुफ़्ती ने बीजेपी के खिलाफ़ रुख अख्तियार करने वाली पीडीपी ने चुनाव के बाद बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बना ली. इसका दक्षिणी कश्मीर में भारी विरोध किया गया.

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फिर इसके बाद जून 2019 में बीजेपी ने पीडीपी के साथ गठबंधन अचानक ख़त्म करके महबूबा मुफ़्ती को चौंका दिया.

इसके बाद पीडीपी के नेताओं में भी पार्टी छोड़ने की होड़ सी मच गई. कई नेताओं ने मुफ़्ती पर परिवारवाद और तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया.

क्या बीजेपी के साथ से हुआ नुकसान?

साल 2014 में हुए चुनाव में अनंतनाग सीट पर मतदान प्रतिशत 24.84 था. वहीं, इस बार मात्र 8.31 फ़ीसदी मतदान हुआ है.

अगर वोटों की बात करें तो महबूबा को कुल 30,524 वोट मिले. वहीं, उनको हराने वाले पूर्व जज हसनैन मसूदी को 40,180 वोट मिले. इसके अलावा दूसरे नंबर पर रहने वाले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर ने 33,504 वोट हासिल किए.

ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर किस चीज़ ने दक्षिणी कश्मीर के लोगों में महबूबा मुफ़्ती के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया?

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विशेषज्ञों की मानें तो दक्षिणी कश्मीर में चरमपंथी कमांडर बुरहान वानी की हत्या के बाद मुफ़्ती की ओर से आए बयानों ने स्थानीय जनता में काफ़ी रोष पैदा किया.

वानी की हत्या के बाद कश्मीर में तकरीबन छह महीने तक भारत-विरोधी प्रदर्शन किए गए. इसमें लगभग 90 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई.

अनंतनाग के रामबीरपोरा इलाके में एक दुकान चलाने वाले इम्तियाज अहमद मानते हैं कि मुफ़्ती अपनी हार के लिए खुद ज़िम्मेदार हैं.

वो कहते हैं, "मुफ़्ती मोहम्मद सईद मानते थे कि अनंतनाग लोकसभा सीट का रास्ता रामबीरपोरा से होकर निकलता है लेकिन उनकी मौत के बाद महबूबा ने इस इलाके की ओर ध्यान नहीं दिया. सिर्फ़ इस गांव में अब तक नहर का पानी पिया जाता है. उन्होंने कभी इस बात की चिंता नहीं की. इस वजह से हमारे गांव ने उन्हें वोट नहीं दिया."

इम्तियाज़ कहते हैं,"इसके अलावा उन्होंने 2016 के कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों को लेकर बयानबाजी की जिससे लोग आहत हुए. उन्होंने कहा था कि सुरक्षाबलों ने जिन युवाओं को मारा है वो दूध और टॉफ़ी लेने के लिए नहीं निकले थे. लोग इन बयानों को भूल नहीं पाए हैं. यहां के युवाओं ने ये कभी नहीं सोचा था कि जिन्हें उन्होंने अपने नेता के रूप में चुना है, वो ऐसे बयान देंगी. ये महबूबा मुफ़्ती की हार की दूसरी वजह है. इसके बाद 2014 में महबूबा मुफ़्ती ने कहा था कि अगर आप बीजेपी को कश्मीर से दूर रखना चाहते हैं तो उन्हें वोट दिया जाए लेकिन इसके बाद हमने देखा कि पीडीपी ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया. इस गठबंधन के बाद लोगों ने पीडीपी से नफ़रत करना शुरू कर दिया."

रामबीरपोरा के एक अन्य निवासी रसपाल सिंह कहते हैं, "लोगों को महबूबा मुफ़्ती से बहुत उम्मीदें थीं. वो बहुत कुछ कर सकती थीं. लेकिन उन्होंने अपने उन सलाहकारों पर भरोसा किया जो उनके शुभचिंतक नहीं थे. उन्होंने आम लोगों से बातचीत करके उनकी समस्याएं जानने की कोशिश नहीं की. इसके साथ ही बीजेपी के साथ हाथ मिलाना लोगों को पसंद नहीं आया."

गांव ने भी नहीं दिया वोट

महबूबा मुफ़्ती का गांव अनंतनाग की बिजबहेरा विधानसभा के अंतर्गत आता है. इस चुनाव में इस विधानसभा में काफ़ी कम मतदान प्रतिशत रहा है. मतदान वाले दिन ज़्यादातर लोग अपने घरों में बैठे रहे.

बिजबहेरा गांव के तुलमुला गांव में रहने वाले मोहम्मद शफ़ी दार कहते हैं कि महबूबा मुफ़्ती ने सिर्फ वादे किए और उन्होंने इन वादों को पूरा नहीं किया.

वो कहते हैं, "पिछले चुनाव में हमने पीडीपी को वोट दिया था लेकिन इस बार नहीं क्योंकि पिछली बार जीतने के बाद से वो एक बार भी हमारे गांव नहीं आईं. इसी वजह से वो चुनाव हारी हैं. बेरोजगारी बढ़ गई है और झूठे वादे किए गए हैं. पिछले चुनाव में इस गांव के 95 फ़ीसदी लोगों ने वोट दिए थे लेकिन इस बार पूरे गांव ने मतदान का बहिष्कार किया."

गांव के ही फिरोज़ अहमद डार महबूबा के ग़लत बयानों और बीजेपी के साथ गठबंधन को उनकी हार के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

उन्होंने बताया, "पिछली बार मैंने उन्हें वोट दिया था लेकिन इस बार उन्हें वोट न देने के कई कारण हैं. इनमें से एक वजह उनका बीजेपी से गठबंधन है. इसके अलावा दूसरे कारणों को मैं साझा नहीं कर सकता."

विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य में सरकार बनाने के लिए गठबंधन किए जाने के बाद से ही गांववालों में उनके ख़िलाफ़ गुस्सा उबल रहा था.

दक्षिणी कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार खालिद गुल बताते हैं, "ये महबूबा मुफ़्ती का सातवां चुनाव है. जब उन्होंने बीजेपी के साथ सरकार बनाई तो लोगों में उनकी पार्टी के प्रति गुस्सा पनपने लगा. इसके बाद बुरहान वानी के लिए विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए. इसमें सैकड़ों लोगों की जान गई. दक्षिणी कश्मीर में ही 70 लोगों की मौत हुई. कई लोगों की आंखें चली गई. और लोगों ने इसका गुस्सा पीडीपी पर उतारा. दक्षिणी कश्मीर में महबूबा की हार का सबसे बड़ा कारण यही था. इसके साथ ही कई जगहों पर काफ़ी कम मतदान हुआ. ये एक संदेश था कि लोगों ने पीडीपी को ख़ारिज कर दिया है."

पार्टी में बगावत की वजह?

हालांकि, गुल इसे पार्टी में बगावत की वजह नहीं मानते हैं.

वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता है कि पीडीपी के बड़े नेताओं के पार्टी छोड़कर जाने के लिए बीजेपी के साथ गठबंधन ज़िम्मेदार है क्योंकि पार्टी छोड़ने वाले नेताओं में सिर्फ एक नेता डॉक्टर हसीब द्राबू दक्षिणी कश्मीर से ताल्लुक रखते हैं."

गुल इस बात को भी मानने से इनकार करते हैं कि चुनाव के बहिष्कार की वजह से मुफ़्ती ये चुनाव हार गईं.

वो कहते हैं, "मुझे ऐसा नहीं लगता है कि स्थानीय लोगों के चुनाव का बहिष्कार करने से महबूबा को हार का मुंह देखना पड़ा. तीनों नेताओं के बीच वोटों का अंतर इतना कम है कि आप उसका कोई मतलब नहीं निकाल सकते. दक्षिणी कश्मीर के दूरस्थ इलाके में लोगों ने ज़रूर वोट दिया होगा."

गुल मानते है कि दक्षिण कश्मीर से महबूबा की जीत काफ़ी अहम थी लेकिन इस हार ने उनकी पार्टी को हिलाकर रख दिया है.

उन्होंने कहा, ''अपनी पार्टी को एक साथ रखने के लिए उनके लिए ये चुनाव जीतना जरूरी था. इस पार्टी में अभी भी काफ़ी कलह चल रही हैं. ऐसे में इस हार के बाद महबूबा के लिए अपनी पार्टी को बचाए रखना काफ़ी चुनौतीपूर्ण होगा."

इस लोकसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने कश्मीर की सभी तीन लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की है. इसके साथ ही बीजेपी ने जम्मू और लद्दाख में तीन सीटों पर जीत दर्ज की है.

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