डॉ. पायल ताडावीः आदिवासियों की सेवा के सपने का दुखद अंत

  • 27 मई 2019
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उत्तरी महाराष्ट्र के जलगांव की रहने वाली पायल ताडावी हमेशा से डॉक्टर ही बनना चाहती थीं. अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वो आदिवासी इलाक़े में काम करना चाहती थीं. वो टोपीवाला मेडिकल कॉलेज में गाइनोकोलॉजी (स्त्री रोग विशेषज्ञ) की पढ़ाई कर रहीं थीं.

लेकिन अब उनके सभी सपने अधूरे रह गए हैं. पायल ने 22 मई को आत्महत्या कर ली. पायल के परिवार ने उनकी कुछ सीनियर सहपाठियों पर उत्पीड़न करने के आरोप लगाए हैं.

आईपीसी की धारा 306/34 के तहत तीन महिला डॉक्टरों के ख़िलाफ़ अग्रीपाड़ा थाने में मुक़दमा दर्ज कर लिया गया है. इस मुक़दमे में सूचना प्रौद्योगिकी क़ानून की कुछ धाराएं भी लगाई गई हैं.

सहायक पुलिस कमिश्नर दीपक कुदाल ने बीबीसी से कहा, "मामले की जांच जारी है."

क्या हुआ?

डॉ. पायल ने पश्चिमी महाराष्ट्र के मीराज-सांगली से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की थी. बीते साल उन्होंने पीजी की पढ़ाई के लिए टोपीवाला मेडिकल कॉलेज (बीवाईएल नायर अस्पताल से संबद्ध) में दाख़िला लिया था. वो पिछड़े वर्ग से थीं और आरक्षण कोटा के तहत उन्होंने दाख़िला लिया था.

आरोप है कि मेडिकल कॉलेज की तीन वरिष्ठ रेज़िडेंट डॉक्टरों ने उनके ख़िलाफ़ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और उनकी जाति को आधार बनाकर उनका उत्पीड़न किया. परिवार का कहना है कि उत्पीड़न से तंग आकर उन्होंने आत्महत्या कर ली.

कॉलेज के डीन डॉ. रमेश भरमाल के मुताबिक घटना के अगले दिन ही एंटी रैगिंग समिति ने नियमानुसार जांच शुरू कर दी है. भरमाल के मुताबिक समिति ने 25 लोगों के बयान दर्ज किए गए हैं. जांच रिपोर्ट मंगलवार तक निदेशक मेडिकल एजुकेशन को सौंप दी जाएगी.

उनका ये भी कहना है कि जिन डॉक्टरों पर आरोप लगे हैं उन्हें जल्द ही निलंबित कर दिया जाएगा. भरमाल के मुताबिक विभागाध्यक्ष को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है

पायल की मां आबेदा ताडावी ने बीवाईएल नायर अस्पताल के डीन को इस संबंध में लिखित शिकायत भी दी है. आबेदा का कहना है कि उन्होंने इसी अस्पताल में अपना कैंसर का इलाज करवाया था जहां उन्होंने कथित तौर पर पायल को उत्पीड़न को स्वयं भी देखा था.

हालांकि डीन का कहना है कि इस विषय में कॉलेज से जुड़े किसी भी व्यक्ति को न ही लिखित में और न ही मौखिक रूप से कोई शिकायत दी गई थी.

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अपनी शिकायत में उन्होंने कहा है, "मैं उस समय भी शिकायत दर्ज कराने जा रही थी. लेकिन पायल ने मुझे रोक दिया. पायल को डर था कि अगर शिकायत की तो उसका और अधिक उत्पीड़न किया जाएगा. उसके कहने पर मैंने अपने आप को रोक लिया."

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ग़रीब और पिछड़े परिवार से आने के बावजूद पायल मेडिकल शिक्षा हासिल करने में कामयाब रही थीं. आबेदा कहती हैं कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है.

आबेदा का आरोप है कि वरिष्ठ महिला डॉक्टर मरीज़ों के सामने भी पायल की बेइज़्ज़ती करती थीं. पायल भारी मानसिक दबाव में थी. आबेदा का कहना है कि वो उसके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थीं. पायल ने अपना विभाग बदलने की अर्ज़ी भी दी थी.

अंततः पायल ने 22 मई को आत्महत्या कर ली.

महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ़ रेज़िडेंट डॉक्टर्स (एमएआरडी) ने कथित तौर पर प्रताड़ित करने वाली तीनों महिला डॉक्टरों को निलंबित कर दिया है. परिवार ने विभागाध्यक्ष के निलंबन की मांग भी की है.

पायल के साथ काम करने वाली अन्य डॉक्टरों ने सोशल मीडिया पर अपने ग़ुस्से का इज़हार किया है और अभियुक्त बनाई गईं डॉक्टरों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की मांग की है.

काउंसलिंग की ज़रूरत

इस घटना के बाद से मेडिकल शिक्षा जगत से जुड़े लोग सदमे में हैं. पायल की मौत के बाद एक बार फिर भेदभाव और मानसिक तनाव का मुद्दा उठा है.

जेजे अस्पताल में कार्यरत और डॉ. अंबेडकर मेडिकोज़ एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रेवत कानिंदे कहते हैं, "स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही एक छात्रा ऐसा क़दम उठाने को मजबूर हो जाती है. आप उसके मानसिक तनाव का अंदाज़ा लगा सकते हैं."

"यूजीसी ने यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में समान अवसर सेल स्थापित करने के दिशानिर्देश दिए हैं. लेकिन महाराष्ट्र के किसी कॉलेज में ये नहीं हैं. छात्र अपना घर छोड़कर पढ़ाई करने आते हैं. उन्हें काउंसलिंग की ज़रूरत होती है. प्रशासन को एससी-एसटी अधिकारी तैनात करने चाहिए ताकि ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई की जा सके."

कानिंदे कहते हैं, "सामान्य वर्ग और पिछड़े वर्ग के छात्रों का साझा काउंसलिंग सत्र होना चाहिए ताकि वो एक दूसरे को समझ सकें."

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