बीजेपी के निशाने पर कर्नाटक सरकार, क्या अमित शाह के इशारे का है इंतज़ार?

  • 27 मई 2019
अमित शाह, बीजेपी इमेज कॉपीरइट Getty Images

कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर और कांग्रेस गठबंधन की सरकार बीजेपी के निशाने पर है. लेकिन, सरकार गिराने या मध्यावधि चुनाव कराने के लिए राज्य के नेताओं को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के इशारे का इंतज़ार है.

कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनावों में बीजेपी के शानदार प्रदर्शन के बाद पार्टी नेता राज्य में अपनी सरकार बनाने के लिए कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं. कर्नाटक में बीजेपी ने 28 सीटों में से 25 सीटों पर जीत हासिल की है. इस जीत के आधार पर पार्टी राज्य में भी अपनी सरकार बनाने की कोशिश में है.

2018 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी बहुत कम सीटों के अंतर से सरकार बनाने से चूक गई थी. तब विधानसभा चुनावों में जेडीएस को 37और कांग्रेस को 80 सीटें मिली थीं और दोनों ने मिलकर गठबंधन सरकार बना ली थी.

प्रदेश में बीजेपी के बड़े नेता और पार्टी प्रमुख बीएस येदियुरप्पा ने लोकसभा के चुनाव नतीजे आने का बाद अपना बयान दोहराते हुए कहा था, ''हमें लगता है कि गठबंधन की सरकार अपने ही समझौते के कारण गिर जाएगी. कोई भी कदम उठाने से पहले हम केंद्र से निर्देशों का इंतज़ार करेंगे.''

इस मामले में येदियुरप्पा का केंद्र से मतलब है अमित शाह. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने पहचान जाहिर न करने की शर्त पर बताया, ''अमित शाह ही वो शख़्स हैं जो ये निर्णय लेंगे कि हम ऑपरेशन कमल लॉन्च करें या सरकार गिर जाने का इंतज़ार करें या फिर मध्यावधि चुनावों के विकल्प को चुनें. कांग्रेस के ऐसे आठ विधायक हैं जो हमारे संपर्क में हैं.''

केंद्र में सरकार बनने का इंतज़ार

224 सदस्यों की विधानसभा में बीजेपी के 105 विधायक हैं. इसके अलावा पार्टी का दावा है कि उसके पास कुछ स्वतंत्र विधायकों का समर्थन भी है. अगर बीजेपी को राज्य में सरकार बनानी है तो कांग्रेस या जेडीएस के कम से कम 14 से 16 विधायकों को अपने पद से इस्तीफ़ा देना होगा.

इससे गठबंधन की सीटों की संख्या 106 से नीचे आ जाएगी और बीजेपी सरकार बनाने का दावा कर सकेगी.

बीजेपी को उम्मीद है कि केंद्रीय नेतृत्व से हरी झंडी मिलने के बाद गठबंधन के नाराज़ विधायकों की संख्या बढ़ेगी. कहा जा रहा है कि अब भी कम से कम तीन कांग्रेस विधायक बीजेपी में शामिल हो चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री एसएम कृष्णा के संपर्क में हैं.

यह साफ नहीं है कि क्या वो सिर्फ़ संयोग था या वाकई वो विधायक उस वक़्त मौजूद थे जब येदियुरप्पा और पूर्व उप मुख्यमंत्री आर अशोक ने एसएम कृष्णा से मुलाकात की थी. उनमें से एक विधानसभा परिषद के सदस्य थे जिन्होंने कृष्णा को अपना 'राजनीतिक गुरू' बताया था.

लेकिन, उनका संदेश साफ था. जैसा कि आर अशोक ने कहा, ''लोकसभा चुनाव में जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन के निराशाजनक प्रदर्शन के बाद गठबंधन की ये सरकार जल्द ही गिर जाएगी.''

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, ''हम कुछ नहीं करने जा रहे हैं. हम ऑपरेशन कमल में भी शामिल नहीं होंगे. हमें इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व की अनुमति की ज़रूरत होगी. हम इसके लिए इंतज़ार करेंगे.''

पहचान छुपाने की शर्त पर बीजेपी के अन्य नेताओं ने बताया कि पार्टी नेतृत्व कर्नाटक पर तब तक कोई फैसला नहीं लेगा जब तक नरेंद्र मोदी केंद्र में अपनी सरकार नहीं बना लेते. कम से कम 2 जून तक हमें केंद्रीय नेतृत्व से कोई भी संकेत मिलने की उम्मीद नहीं है.

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विधायकों की संतुष्टि की कोशिश

अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और समन्वय समिति के अध्यक्ष सिद्धारमैया ने अचानक एक बैठक की थी. ये बैठक पिछले हफ़्ते लोकसभा चुनाव के नतीजे वाले दिन की गई थी.

पिछले साल गठबंधन सरकार बनने के बाद से दोनों नेताओं की ऐसी पहली बैठक है.

जेडीएस और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां लोकसभा चुनाव में केवल एक-एक सीट ही जीत पाई हैं. तीसरी सीट एक निर्दलीय उम्मीदवार सुमलता अंबरीश को मिली है जिन्होंने मुख्यमंत्री के बेटे निखिल कुमारस्वामी को हराया.

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जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन ने मंत्रालय का विस्तार करने का फैसला लिया है ताकि उन नेताओं को भी जगह दी जा सके जो पद न मिलने से नाराज़ चल रहे थे. सिद्धारमैया ने मैसूरु में संवाददाताओं से कहा, ''हमारे पास मंत्रिमंडल में तीन जगह खाली हैं. कांग्रेस का एक और जेडीएस के लिए दो खाली पद हैं जिन्हें भरा जाना है. मुख्यमंत्री इस बात का निर्णय करेंगे कि मंत्रालय का विस्तार कब करना है.''

एक कांग्रेस नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कुछ वरिष्ठ नेताओं के मंत्रालय से हटने की संभावना पर भी इनकार नहीं किया जा सकता ताकि नाराज़ विधायकों के लिए जगह बनाई जा सके.

लेकिन, कांग्रेस का सबसे बड़ा डर ये है कहीं बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व मध्यावधि चुनाव के विकल्प को न चुन ले.

कांग्रेस के एक नेता ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, ''लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद कोई भी एक और चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं है. ऐसा न होने पर हम अपने विधायकों को साथ तो रख पाएंगे लेकिन बीजेपी कभी भी इस हथियार का इस्तेमाल कर सकती है.''

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बीजेपी में नेतृत्व परिवर्तन

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक और जैन यूनिवर्सिटी के उप कुलपति डॉक्टर संदीप शास्त्री इस मामले में अलग राय रखते हैं.

संदीप शास्त्री कहते हैं, ''अगर ऑपरेशन कमल करेंगे तो येदियुरप्पा का अपर हैंड रहेगा. लेकिन मुझे लगता है कि केंद्र का बीजेपी नेतृत्व कर्नाटक में युवा नेतृत्व को पसंद कर सकता है. अगर पार्टी अभी ऑपरेशन कमल का रास्ता चुनती है तो वो राज्य में युवा नेतृत्व नहीं ला पाएगी.''

पर फिलहाल कोई नहीं कह सकता कि अमित शाह अपने खिलाड़ियों को जो बॉल डालने का इशारा करेंगे वो गुगली होगी या यॉर्कर.

(यह लेख बीबीसी कैपिटलकी कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी कैपिटलके दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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