इंदिरा से राहुल के अध्यक्ष बनने के बीच, कैसी थी बिन गांधी की कांग्रेस

  • 28 मई 2019
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देश की 134 साल पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस में एक बार फिर ग़ैर-गांधी परिवार अध्यक्ष बनने के आसार नज़र आ रहे हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार हुई है और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ग़ैर-गांधी कांग्रेस अध्यक्ष का राग छेड़ दिया है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस्तीफ़ा देने के अपने फ़ैसले पर अड़े हुए हैं और वरिष्ठ नेता उन्हें मनाने का काम कर रहे हैं. इन सब के बीच यह सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है कि क्या कोई ग़ैर-गांधी अध्यक्ष पार्टी को मज़बूती से चला सकेगा.

कई बार विभाजित हुई कांग्रेस

हालांकि जब कोई ग़ैर-गांधी परिवार अध्यक्ष रहा तब कांग्रेस में विभाजन भी हुआ. वैसे तो आज़ादी के बाद कांग्रेस कई बार विभाजित हुई है. अब तक 60 से भी अधिक पार्टियां इससे निकल कर बनी हैं. हालांकि कई निष्क्रिय हो गईं तो कइयों का वापस कांग्रेस या जनता पार्टी (आज की बीजेपी) में विलय हो गया.

इस दौरान कांग्रेस से अलग होकर इसके कई नेताओं ने पार्टियां बनाई. कांग्रेस के बड़े नेता जिन्होंने पार्टी छोड़ दी और अलग पार्टियां बनाई उनमें प्रमुख थे जेबी कृपलानी, सी राजगोपालाचारी, चौधरी चरण सिंह, के कामराज, मोरारजी देसाई, बीजू पटनायक, जगजीवन राम, शरद पवार, शिवाजी गणेशन, बंसी लाल, नाराणय दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, नटवर सिंह, एस बंगारप्पा, गेगांग अपांग, ममता बनर्जी, सुखराम, मुकुट मिठी, मुफ़्ती मोहम्मद सईद, के करुणाकरन, कुलदीप बिश्नोई, वाई एस जनगमोहन रेड्डी और अजित जोगी.

इंदिरा गांधी जब 1978 में जब दूसरी बार अध्यक्ष बनीं थीं तब से लेकर 2019 यानी बीते 41 वर्षों में कांग्रेसी अध्यक्ष बिन गांधी परिवार केवल दो बार रहे. 1992-96 तक पीवी नरसिम्हा राव और 1996-98 तक सीताराम केसरी.

चुनाव प्रचार से काफी पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कांग्रेस को एक ग़ैर-गांधी पार्टी अध्यक्ष नियुक्त करने की चुनौती दी थी. तब उन्होंने कहा था कि पांच साल के लिए किसी गांधी परिवार के बाहर वाले को कांग्रेस अध्यक्ष बना कर देखें. मोदी ने तब सीताराम केसरी का ज़िक्र करते हुए कहा था कि देश के दलित, पीड़ित, शोषित परिवार से आये हुए केसरी को पार्टी के अध्यक्ष पद से कैसे हटाया गया था.

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Image caption सोनिया गांधी के साथ सीताराम केसरी

कौन हैं सीताराम केसरी?

नरसिम्हा राव के बाद सितंबर 1996 में सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष बने. सीताराम केसरी के अध्यक्ष बनने के कुछ महीनों बाद ही पश्चिम बंगाल की क़द्दावर महिला नेता ममता बनर्जी ने पार्टी छोड़ दी थी. हालांकि इसके पीछे उनका केसरी से कोई मतभेद नहीं बल्कि नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली सरकार के साथ मतभेद होना था. ममता ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और आज पश्चिम बंगाल में उनकी पार्टी की सरकार है.

कांग्रेस के इतिहास में केसरी को सबसे कमज़ोर अध्यक्ष माना जाता है. उनके कार्यकाल में पार्टी को अधिक नुक़सान हुआ. उनके सबसे विवादित फ़ैसलों में तात्कालिक प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की यूनाइटेड फ्रंट की सरकार से समर्थन वापस लेना था. हालांकि बाद में इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व में एक बार फिर उसने सरकार गठित की.

उनके कार्यकाल के दौरान राजीव गांधी की हत्या की साज़िश को लेकर गठित जैन आयोग की रिपोर्ट का कुछ हिस्सा मीडिया में लीक हो गया था जिसमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) का एलटीटीई के साथ लिंक की ओर इशारा किया गया था.

मज़ेदार तो यह था कि डीएमके तब केंद्र सरकार की सहयोगी पार्टी थी और इसके तीन केंद्रीय मंत्री भी थे. कांग्रेस ने इन तीन मंत्रियों को सरकार से हटाने की मांग कर दी. केसरी और गुजराल ने एक दूसरे को कई चिट्ठियां लिखीं. लेकिन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के इंकार करने पर एक बार फिर केसरी ने सरकार से कांग्रेस का समर्थन खींच लिया. केसरी के इस फ़ैसले ने देश को मध्यावधि चुनाव में धकेल दिया.

रंगराजन कुमारमंगलम और असलम शेर ख़ान जैसे कई नेताओं ने केसरी में अविश्वास जताते हुए पार्टी छोड़ दी थी.

तब केसरी की जगह सोनिया गांधी पार्टी की प्रमुख चुनाव प्रचारक बनीं. उनकी सभाओं में बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए लेकिन वो पार्टी को बहुमत नहीं दिला सकीं.

हालांकि, सोनिया कांग्रेस को सम्मानजनक 140 सीटें दिलाने में कामयाब रहीं. और बाद में 2004 और 2009 में भी सफलतापूर्वक केंद्र में सरकार स्थापित करने में कामयाब हुईं.

1998 में चुनाव में हार के बाद केसरी को अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया. और यहां से कांग्रेस एक और विभाजन की ओर बढ़ी. तब सीताराम केसरी के साथ शरद पवार, पी संगमा और तारिक़ अनवर जैसे नेता जुड़े और मई 1999 में कांग्रेस से अलग होते हुए इन्होंने अन्य कई नेताओं के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की स्थापना की.

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Image caption प्रणब मुखर्जी और पीवी नरसिम्हा राव

नरसिम्हा राव

राजीव गांधी और सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बीच जो दूसरे कांग्रेसी अध्यक्ष रहे वो थे नरसिम्हा राव.

उनके कार्यकाल में सबसे पहला विभाजन 1994 में हुआ जब नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, नटवर सिंह और रंगराजन कुमारमंगलम ने कांग्रेस से अलग हो कर ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) बनाई, हालांकि सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद वो वापस पार्टी में आ गये.

यह नरसिम्हा राव का दौर ही था जब 1994 से 1996 के बीच कांग्रेस से अलग हो कर कर्नाटक कांग्रेस पार्टी, तमिझागा राजीव कांग्रेस, कर्नाटक विकास पार्टी (एस बंगारप्पा), अरुणाचल कांग्रेस (गेगांग अपांग) और तमिल मनीला कांग्रेस (जी के मूपनार) का गठन हुआ.

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ग़ैर-गांधी कांग्रेस अध्यक्ष की वजहें

आज़ादी से पहले स्वतंत्रता संग्राम की धुरी रही कांग्रेस बीते पांच वर्षों के दौरान हाशिये पर सिमट कर रह गयी है. 2014 में न केवल इसने केंद्र में सत्ता गंवाई बल्कि समूचे देश में उसे इतनी कम सीटें मिलीं कि वो प्रमुख विपक्षी पार्टी का आधिकारिक दर्जा तक न पा सकी.

2019 के चुनाव में कांग्रेस की कुछ सीटें बढ़ीं ज़रूर लेकिन एक बार फिर संसद में वो विपक्षी पार्टी का आधिकारिक दर्जा पाने में असफल रही. ये कांग्रेस की राजनीतिक इतिहास के दो सबसे ख़राब प्रदर्शनों में से हैं.

लोकसभा के लिए हुए इन दोनों चुनावों के बीच कई विधानसभाओं के चुनाव हुए और कांग्रेस एक-एक कर अपने कई राज्यों को गंवाती रही. आज आलम यह है कि वर्तमान में केवल पांच राज्यों (पंजाब, कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़) में ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारें हैं. 2019 के चुनाव में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन की उम्मीदें थी लेकिन यह एक बार फिर नाकाम साबित हुई.

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आज़ादी के बाद कांग्रेस का सफ़र

भारत की आज़ादी में जिस एक राजनीतिक दल का सबसे बड़ा हाथ रहा है वो है कांग्रेस पार्टी. भारत की आज़ादी के बाद यह देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टी बन गई. 1885 में अस्तित्व में आई कांग्रेस की स्थापना को 134 साल हो चुके हैं.

आज़ादी के बाद 1952 में हुए चुनाव के साथ केंद्र की सत्ता में आई कांग्रेस का 1977 तक देश पर एकछत्र शासन था. शुरुआती 25 सालों में कांग्रेस सामने टक्टर में कोई बड़ी विपक्षी पार्टी भी नहीं थी.

लेकिन जब छठी लोकसभा के लिए 1977 में चुनाव हुए तो जनता पार्टी ने कांग्रेस की कुर्सी छीन ली. हालांकि तीन साल के अंदर ही 1980 में कांग्रेस की वापसी हो गई लेकिन 1989 में कांग्रेस को फिर हार का सामना करना पड़ा.

हालांकि 11 महीनों तक भारतीय जनता पार्टी और वामदलों के समर्थन से वीपी सिंह प्रधानमंत्री रहे लेकिन बाद में कांग्रेस के समर्थन से छह महीनों से कुछ अधिक अवधि के लिए चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने.

लेकिन 1980 में एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में लौटी कांग्रेस छह महीने को छोड़ 1996 तक केंद्र में बनी रही. इसके बाद 2004 से 2014 तक लगातार दो बार कांग्रेस एक बार फिर केंद्र की सत्ता में रही.

हालांकि 1991, 2004 और 2009 में कांग्रेस ने सफलता पूर्वक केंद्र में गठबंधन की सरकार का नेतृत्व किया.

1952 से 2019 तक देश में 17 बार आम चुनाव हुए हैं इस ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने अब तक सात बार पूर्ण बहुमत तो चार बार गठबंधन के साथ केंद्र सरकार का हिस्सा रही है. कांग्रेस ने भारत को सात प्रधानमंत्री (जवाहरलाल नेहरू, गुलज़ारीलाल नंदा, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिंहा राव और मनमोहन सिंह) दिये हैं और 50 वर्षों से अधिक केंद्र की सत्ता का नेतृत्व किया है.

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Image caption नेहरू-गांधी परिवार

1947 से 37 वर्ष गांधी परिवार के अध्यक्ष

आज़ादी से पहले कांग्रेस के अध्यक्ष का कार्यकाल एक साल के लिए हुआ करता था. 1885 में डब्ल्यू सी बनर्जी से लेकर आज़ादी के वक़्त जेपी कृपलानी और 1950 में पुरुषोत्तम दास टंडन तक कांग्रेस ने 60 बार अपने अध्यक्ष चुने.

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के पिता मोती लाल नेहरू 1928 में इसके अध्यक्ष चुने गये तो आज़ादी से पहले जवाहर लाल नेहरू चार बार (1929, 1930, 1936, 1937) कांग्रेस के अध्यक्ष रहे.

आज़ादी के बाद के अधिकांश वर्षों में कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर नेहरू-गांधी परिवार का ही राज रहा है. 1951-52 से लेकर 1954 तक नेहरू फिर 1959 में इंदिरा गांधी. इंदिरा गांधी फिर 1978 से 1984 तक अध्यक्ष रहीं. उनकी मौत के बाद 1985 से 1991 तक राजीव गांधी. हालांकि सबसे लंबे समय तक देश की इस सबसे पुरानी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी रही हैं. वो 1998 से 2017 तक क़रीब 20 वर्षों तक पार्टी की अध्यक्ष रहीं और उनके बाद से अब तक राहुल गांधी पार्टी संभाल रहे हैं.

1928 में मोती लाल नेहरू के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के साथ ही नेहरू-गांधी परिवार का इस पार्टी के अध्यक्ष पद से नाता जुड़ा जो आज तक बदस्तूर जारी है.

आज़ादी के बाद से अब तक कांग्रेस के 29 अध्यक्ष रहे हैं. इन 72 वर्षों में 37 वर्ष नेहरू-गांधी परिवार के तो 35 वर्ष ग़ैर कांग्रेसी अध्यक्ष रहे हैं.

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