डॉक्टर पायल तडवी आत्महत्या मामले में तीन डॉक्टर गिरफ़्तार

  • 29 मई 2019
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मुंबई के एक सरकारी अस्पताल में पीजी छात्रा डॉक्टर पायल तडवी के आत्महत्या मामले में तीन डॉक्टरों को गिरफ़्तार कर लिया गया है.

उनपर डॉक्टर तडवी का उत्पीड़न करने का आरोप है.

पायल ने 22 मई को आत्महत्या कर ली थी. उनकी मां आबेदा तडवी ने आरोप लगाया है कि तीनों अभियुक्त डॉक्टर उनकी बेटी को कई महीनों से प्रताड़ित कर रहे थे.

मुंबई पुलिस ने इस बारे में अत्याचार-विरोधी, रैगिंग-विरोध और आईटी ऐक्ट के तहत मामला दर्ज किया है.

अभियुक्त डॉक्टरों ने आरोपों से इनकार किया है. उन्होंने एक पत्र के माध्यम से रेज़िडेंट डॉक्टरों के संगठन से अनुरोध किया है कि उनके साथ "निष्पक्ष जाँच" और "न्याय" हो.

उत्तरी महाराष्ट्र के जलगांव की रहने वाली पायल तडवी मुंबई के टोपीवाला मेडिकल कॉलेज में गाइनोकोलॉजी (स्त्री रोग विशेषज्ञ) की पीजी की पढ़ाई कर रहीं थीं.

डॉ. पायल ने पश्चिमी महाराष्ट्र के मीराज-सांगली से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की थी.

बीते साल उन्होंने पीजी की पढ़ाई के लिए टोपीवाला मेडिकल कॉलेज (बीवाईएल नायर अस्पताल से संबद्ध) में दाख़िला लिया था.

वो पिछड़े वर्ग से थीं और उन्होंने आरक्षण कोटा के तहत दाख़िला लिया था.

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मैं गर्व से कहती थी कि मैं डॉ पायल की मां हूं, पर अब मैं क्या कहूं?

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Image caption अपनी मां के साथ पायल तडवी

क्या हुआ?

आरोप है कि मेडिकल कॉलेज की तीन वरिष्ठ रेज़िडेंट डॉक्टरों ने उनके ख़िलाफ़ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया और उनकी जाति को आधार बनाकर उनका उत्पीड़न किया. परिवार का कहना है कि उत्पीड़न से तंग आकर उन्होंने आत्महत्या कर ली.

कॉलेज के डीन डॉ. रमेश भरमाल ने बताया कि घटना के अगले दिन ही एंटी रैगिंग समिति ने नियमानुसार जांच शुरू कर दी गई. उनके मुताबिक समिति ने 25 लोगों के बयान दर्ज किए.

पायल की मां आबेदा तडवी ने बीवाईएल नायर अस्पताल के डीन को इस संबंध में लिखित शिकायत की थी. उनका कहना था कि उन्होंने इसी अस्पताल में अपना कैंसर का इलाज करवाया था जहां उन्होंने स्वयं कथित तौर पर पायल को उत्पीड़न का सामना करते देखा था.

अपनी शिकायत में उन्होंने कहा है, "मैं उस समय भी शिकायत दर्ज कराने जा रही थी. लेकिन पायल ने मुझे रोक दिया. पायल को डर था कि अगर शिकायत की तो उसका और अधिक उत्पीड़न किया जाएगा. उसके कहने पर मैंने अपने आप को रोक लिया."

हालांकि डीन का कहना था कि इस विषय में कॉलेज से जुड़े किसी भी व्यक्ति को न ही लिखित में और न ही मौखिक रूप से कोई शिकायत दी गई थी.

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बेटी पर गर्व

ग़रीब और पिछड़े परिवार से आने के बावजूद पायल मेडिकल शिक्षा हासिल करने में कामयाब रही थीं. आबेदा कहती हैं कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है.

आबेदा का आरोप है कि वरिष्ठ महिला डॉक्टर मरीज़ों के सामने भी पायल की बेइज़्ज़ती करती थीं जिससे वो भारी मानसिक दबाव में थी.

आबेदा का कहना है कि वो उसके मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंतित थीं. पायल ने अपना विभाग बदलने की अर्ज़ी भी दी थी.

अंततः पायल ने 22 मई को आत्महत्या कर ली.

महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ़ रेज़िडेंट डॉक्टर्स (एमएआरडी) ने कथित तौर पर प्रताड़ित करने वाली तीनों महिला डॉक्टरों को निलंबित कर दिया है. परिवार ने विभागाध्यक्ष के निलंबन की मांग भी की है.

पायल के साथ काम करने वाली अन्य डॉक्टरों ने सोशल मीडिया पर अपने ग़ुस्से का इज़हार किया है और अभियुक्त बनाई गईं डॉक्टरों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की मांग की है.

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अभियुक्तों का क्या कहना है?

जिन तीन सीनियर्स पर रैंगिग और हैरासमेंट के आरोप लगे हैं उन्हें महाराष्ट्र के रेज़ीडेंट डॉक्टर संघ (MARD) ने निलंबित कर दिया है. तीनों सीनियर्स ने इस मामले में ख़त लिख कर अपना पक्ष MARD के सामने पेश किया है.

"आत्महत्या की सही वजह अभी तक पता नहीं चली है. हमें इस मामले में दोषी ठहराना और हम पर अट्रॉसिटी लगाना अन्याय है काम के प्रेशर को कोई रैंगिग कहे तो इस तरह की रैंगिग हमारी भी हुई है मेडिकल कॉलेज को निष्पक्ष जांच करनी चाहिए. लेकिन पुलिस और मीडिया प्रेशर के कारण कोई हमारा पक्ष सुन ही नहीं रहा है."

काउंसलिंग की ज़रूरत

इस घटना के बाद से मेडिकल शिक्षा जगत से जुड़े लोग सदमे में हैं. पायल की मौत के बाद एक बार फिर भेदभाव और मानसिक तनाव का मुद्दा उठा है.

जेजे अस्पताल में कार्यरत और डॉ. अंबेडकर मेडिकोज़ एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रेवत कानिंदे कहते हैं, "स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही एक छात्रा ऐसा क़दम उठाने को मजबूर हो जाती है. आप उसके मानसिक तनाव का अंदाज़ा लगा सकते हैं."

"यूजीसी ने यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में समान अवसर सेल स्थापित करने के दिशानिर्देश दिए हैं. लेकिन महाराष्ट्र के किसी कॉलेज में ये नहीं हैं. छात्र अपना घर छोड़कर पढ़ाई करने आते हैं. उन्हें काउंसलिंग की ज़रूरत होती है. प्रशासन को एससी-एसटी अधिकारी तैनात करने चाहिए ताकि ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई की जा सके."

कानिंदे कहते हैं, "सामान्य वर्ग और पिछड़े वर्ग के छात्रों का साझा काउंसलिंग सत्र होना चाहिए ताकि वो एक दूसरे को समझ सकें."

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