'यादव लैंड' में भी दरक गई सपा की ज़मीन, आख़िर क्यों?

  • 31 मई 2019
अखिलेश यादव, मुलायम सिंह यादव इमेज कॉपीरइट Getty Images

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद के गठबंधन से उम्मीद ये की जा रही थी कि यह न सिर्फ़ बीजेपी को कड़ी चुनौती देगा बल्कि केंद्र में बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोकने का रास्ता भी तय कर देगा.

लेकिन परिणाम आने पर बीजेपी का न सिर्फ़ वोट प्रतिशत बढ़ गया बल्कि सीटों में भी सिर्फ़ नौ का नुक़सान हुआ और गठबंधन चारों ख़ाने चित हो गया.

हालांकि गठबंधन में बहुजन समाज पार्टी ज़रूर फ़ायदे में रही क्योंकि उसके वोट प्रतिशत में तो कोई ख़ास परिवर्तन नहीं हुआ लेकिन सीटों के लिहाज़ से वो ज़बरदस्त लाभ में रही. 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली थी जबकि इस बार उसने अपने दस सांसद लोकसभा में भेज दिए हैं.

रालोद को तो गठबंधन से कोई फ़ायदा नहीं हुआ क्योंकि पार्टी अध्यक्ष अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी भी इस बार लोकसभा का मुंह नहीं देख पाए, वहीं समाजवादी पार्टी ने अपनी पिछली बार के बराबर सीटें ज़रूर पा ली हैं, लेकिन पूरे राज्य के अलावा पार्टी के मज़बूत प्रभाव वाले इलाक़े में भी उसकी नींव इस बार बुरी तरह हिल गई है.

इटावा और उसके आस-पास के यादव बहुल इलाक़ों को समाजवादी पार्टी का 'गढ़' कहा जाता है. फ़िरोज़ाबाद, बदायूं, मैनपुरी, संभल, एटा, कन्नौज जैसी सीटें ऐसी हैं, जहां समाजवादी पार्टी अपनी स्थापना के साथ ही चुनाव में अच्छी जीत हासिल करती रही है.

ख़ासकर तब, जबकि मुलायम सिंह यादव के परिवार के लोग चुनाव लड़ रहे हों. यहां तक कि साल 2014 में भी समाजवादी पार्टी को जो पांच सीटें मिली थीं, उनमें से चार सीटें इसी इलाक़े की थीं और एक सीट पूर्वी उत्तर प्रदेश में आज़मगढ़ में थी. इनमें से कई सीटें ऐसी हैं जहां यादव मतदाता भी क़रीब 18-20 प्रतिशत है.

लेकिन 2019 में बीजेपी ने उन सीटों पर भी समाजवादी पार्टी को शिकस्त दे दी जहां से यादव परिवार के लोग चुनावी मैदान में थे. ऐसा तब हुआ जबकि ढाई दशक की राजनीतिक और व्यक्तिगत दुश्मनी को ताख़ पर रखकर बहुजन समाज पार्टी भी उसके साथ खड़ी थी. ऐसे में ये सवाल लाज़िमी हो जाता है कि आख़िर ऐसा क्यों हुआ?

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यादवों ने ही दिया दगा?

इटावा में वरिष्ठ पत्रकार दिनेश शाक्य कहते हैं, "सपा और बसपा जातीय समीकरणों को ध्यान में रखकर साथ आई थीं और उसी के हिसाब से उन्हें चुनावी जीत का भरोसा भी था. इन्हें उम्मीद थी कि दलित, यादव और मुसलमान एकजुट होकर जिताएगा. दलित और मुसलमान ने जिताया भी लेकिन यादव समुदाय के लोग ही 'खेल' कर गए."

दिनेश शाक्य कहते हैं कि यादवों में भी गोत्रीय विभाजन देखने को मिला और 'घोसी' यादव इस बार साफ़तौर पर बीजेपी की ओर गया मालूम पड़ रहा है.

उनके मुताबिक़, यदि ऐसा न होता तो कन्नौज से डिंपल यादव चुनाव न हारतीं.

दिनेश शाक्य के मुताबिक़, "समाजवादी पार्टी अब तक इस इलाक़े में ग़ैर यादव पिछड़ी जातियों का भी समर्थन हासिल करती रही है लेकिन इस बार शाक्य, पाल, लोध जैसी जातियों ने खुलकर बीजेपी का साथ दिया और समाजवादी पार्टी के नीति-निर्धारक इन जातियों को अपने से दूर खिसकता देखते रहे, रोकने की कोई कोशिश नहीं की. सीधे कहा जाए तो ग़ैर यादव पिछड़ा वर्ग तो गठबंधन से भाग ही गया, यादवों में भी इस बार सेंध लग गई."

बदायूं में समाजवादी पार्टी से धर्मेंद्र यादव लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे थे. उनके ख़िलाफ़ बीजेपी ने संघमित्रा मौर्य को मैदान में उतारा था जो कि बाहरी उम्मीदवार थीं. वहीं कांग्रेस पार्टी ने सलीम शेरवानी को टिकट दिया था.

यहां मुस्लिम-दलित-यादव गठजोड़ और स्थानीय स्तर पर कमज़ोर समझी जाने के बावजूद बीजेपी उम्मीदवार की जीत हो गई. ख़ुद मैनपुरी में मुलायम सिंह की जीत का अंतर भी एक लाख के नीचे आ गया.

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काग़ज़ पर मज़बूत, पर ज़मीन पर कमज़ोर क्यों

इसके पीछे मुख्य कारण यही रहा कि जिस गठबंधन को काग़ज़ी तौर पर इतना मज़बूत माना जा रहा था, वह ज़मीन पर उतना मज़बूत नहीं दिखा. इसके अलावा यादवों में भी एक बड़ा वर्ग ऐसा था जो कि इस गठबंधन को पसंद नहीं कर रहा था और उसने प्रतिक्रिया स्वरूप अपना वोट बीजेपी को दे दिया.

लखनऊ में समाजवादी पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी नाम न छापने की शर्त पर इसे काफ़ी हद तक सही मानते हैं.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि पूरे राज्य में सपा और बसपा एक-दूसरे को अपना वोट ट्रांसफ़र नहीं करा पाए.

इस मायने में सुभाष मिश्र बसपा के वोट बैंक पर ज़्यादा सवाल उठाते हैं, "ऐसा लगता है कि मायवाती इस बार अपना जाटव वोट भी गठबंधन को पूरी तरह से नहीं दिला पाई हैं क्योंकि कई ऐसी सीटें हैं जहां सपा उम्मीदवारों की हार कम अंतर से हुई है और इसके पीछे यही फ़ैक्टर काम कर रहा है."

हालांकि सुभाष मिश्र के मुताबिक़, ऐसा सपा के वोट बैंक यानी यादवों के संदर्भ में भी हुआ है. इसके लिए वो भदोही, संतकबीरनगर जैसी सीटों का उदाहरण भी देते हैं. लेकिन रामपुर में आज़म ख़ान की जीत, मुरादाबाद, अमरोहा और सहारनपुर जैसी सीटों पर गठबंधन के जीतने के पीछे ये माना जा रहा है कि यहां दलितों और मुसलमानों का वोट गठबंधन को ही मिला है.

जहां तक इटावा और उसके आस-पास के इलाक़ों में गठबंधन की हार का सवाल है तो इसके पीछे एक ये कारण भी अहम है कि समाजवादी पार्टी में पिछड़ी जातियों में भी सिर्फ़ एक ही जाति को नेतृत्व में महत्व मिला है जबकि वोट और समर्थन उसे अब तक अन्य जातियों का भी मिलता रहा है.

दिनेश शाक्य बताते हैं, "सेंट्रल यूपी में लोधी, शाक्य, पाल, कुरमी जैसी जातियों का अच्छा-ख़ासा प्रभाव है और इनका काफ़ी समर्थन समाजवादी पार्टी को मिलता रहा है लेकिन इन जातियों से कोई भी ऐसा बड़ा नेता समाजवादी पार्टी में नहीं है जो कि मतदाताओं में प्रभाव छोड़ सके. बीजेपी ने इन्हीं जातियों पर फ़ोकस किया और फ़ायदा उठा ले गई."

हालांकि इस परिणाम के पीछे एक वजह ये भी बताई जा रही है कि लोकसभा चुनाव पूरी तरह से मोदी के नाम पर लड़ा गया और केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं का लाभ लोगों को सीधे मिला.

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शिवपाल ने पहुंचाया नुक़सान?

मैनपुरी के रहने वाले समाज सेवक जनार्दन सिंह कहते हैं, "ऐन चुनाव से पहले किसानों के खाते में सीधे पैसा पहुंचना, उज्ज्वला योजना, बिजली, शौचालय, आयुष्मान भारत... ये ऐसी योजनाएं थीं जिन्होंने सीधे बीजेपी को मोदी के नाम पर वोट दिलाए. बची खुची क़सर बालाकोट ने पूरी कर दी."

जनार्दन सिंह मानते हैं कि ज़रूरी नहीं कि ये ट्रेंड विधानसभा चुनाव में भी बना रहे क्योंकि तब परिस्थितियां भी अलग होंगी और समीकरण भी अलग होंगे.

समाजवादी पार्टी के लिए इस बार शिवपाल यादव नुक़सानदेह बन गए, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. हालांकि ख़ुद शिवपाल यादव सिर्फ़ फ़िरोज़ाबाद सीट पर ही गठबंधन के क़रीब एक लाख वोट काट पाए, लेकिन इस इलाक़े की अन्य सीटों पर भी उन्होंने गठबंधन को ठीकठाक नुक़सान पहुंचाया.

समाजवादी पार्टी के एक नेता के मुताबिक़, शिवपाल यादव ने सभाओं में कांग्रेस को वोट देने की भले ही अपील की हो लेकिन अंदरूनी तौर पर उन्होंने अपने लोगों से बीजेपी को मदद करने को कहा और इसका प्रभाव भी देखने को मिला.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं, "गेस्ट हाउस कांड के बाद की घटनाओं, सपा नेताओं के साथ मायावती की कथित बदसलूकी के बावजूद मंचों पर जिस तरह से यादव परिवार के लोग मायावती के चरणों में गिरने लगे, शिवपाल यादव ने उसे जातीय अस्मिता के साथ जोड़ा और तमाम कट्टर सपा समर्थकों को भी गठबंधन से बग़ावत करने के लिए प्रेरित किया. निश्चित तौर पर उसका असर भी दिखा."

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