गुड़गांव ग्राउंड रिपोर्टः मुसलमान युवा से जबरन जय श्री राम बुलवाने का सच

  • 30 मई 2019
बरकत आलम
Image caption 25 साल के बरकत आलम इस विवाद के केंद्र में हैं

हरियाणा के गुड़गांव में 25 मई की शाम नमाज़ पढ़कर लौटते 25 साल के बरकत आलम के साथ मारपीट की घटना के बाद तरह-तरह के दावे और विवाद जारी हैं.

उनके सिर पर सफेद जालीदार टोपी थी. बदन पर सफेद कुर्ता था और रोज़े की वजह से पेट खाली.

बरकत बताते हैं कि जब वह नमाज़ पढ़कर घर लौट रहे थे तो कुछ युवकों ने उनके साथ "मारपीट की और जय श्री राम का नारा लगाने के लिए कहा".

गुड़गांव पुलिस इसे एक आपराधिक मामले की तरह देख रही है, एफ़आईआर में 'जय श्री राम' के नारे लगाने के लिए मजबूर किए जाने का ज़िक्र नहीं है.

लेकिन बरकत आलम दावा करते हैं कि हमले की रात उन्होंने बोलकर अपनी शिकायत दर्ज कराई और इन नारों का ज़िक्र भी किया था लेकिन पुलिस ने उसे दर्ज नहीं किया. बरकत लिख-पढ़ नहीं सकते.

बीबीसी हिंदी ने अपनी इस रिपोर्ट में इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है कि ये एक आपराधिक घटना है या सांप्रदायिक घटना है.

आख़िर क्या है मामला?

रोज़गार की तलाश में कुछ हफ़्ते पहले दिल्ली आए बरकत आलम अपने ऊपर हुए इस हमले के बाद बेहद डरे सहमे नज़र आते हैं. वो कहते हैं कि आप लोग अब कोई ख़बर न लिखें. वजह पूछने पर वे कहते हैं कि कुछ लोगों ने मीडिया से बात नहीं करने के लिए कहा है लेकिन बरकत उन लोगों के नाम, धर्म या ओहदों का ज़िक्र नहीं करते.

Image caption बरकत आलम पढ़ लिख नहीं सकते

मूल रूप से बिहार के बेगूसराय के निवासी बरकत अपनी आपबीती सुनाते हुए कहते हैं, "मैं मध्य प्रदेश में पत्थर तोड़ने का काम करता था. मेरे बड़े भाई यहां टेलरिंग का काम करते हैं. मैंने सोचा था कि दिल्ली जाऊंगा और उनकी तरह कुछ साफ़-सुथरा काम करना सीख जाऊंगा लेकिन यहां आने के 15 रोज़ के अंदर ही मेरे साथ ये हो गया."

शनिवार शाम की घटना बयान करते हुए बरकत कहते हैं, "उस दिन पूरे दिन का रोज़ा रखने के बाद मैंने भर पेट ठंडा पानी पिया क्योंकि प्यास बहुत लगती है न रोज़े में. मैंने सोचा कि नमाज़ पढ़ने के बाद कुछ खाऊंगा लेकिन इफ़्तारी करने की जगह मैं अस्पताल पहुंच गया और खाने की जगह दवा खानी पड़ी."

"मैं नमाज़ पढ़कर घर लौट रहा था कि तभी पीछे से आवाज़ आई 'ओ मुल्ले, ओ मुल्ले,' मैं अनसुना करके चलता रहा तो उन्होंने फिर आवाज़ लगाई और मुझसे कहा - 'तुम्हें पता नहीं है कि यहां टोपी पहनना मना है, उतारो टोपी,' मैंने टोपी उतारने से इनकार किया तो उन्होंने कहा कि अभी तुमसे जय श्री राम और भारत माता की जय के नारे लगवाएंगे. ज़मीन पर डंडे जैसा कुछ पड़ा था. उन्होंने वो उठाकर कहा कि बोलोगे नहीं तो मुंह में ये डंडा डाल देंगे. इसके बाद उन्होंने मेरे पेट में घूंसे मारे और सर पर थप्पड़ मारा. मैं ज़मीन पर गिर गया. फिर वो लोग भाग गए."

विवादित एफ़आईआर की कहानी

बीबीसी से बात करते हुए बरकत आलम ने उस एफ़आईआर का ज़िक्र भी किया जो इस समय विवादों के घेरे में है. बरकत का दावा है कि उन्होंने अपनी शिकायत में नारे लगाने के लिए विवश करने वाली बात कही है.

बरकत बताते हैं, "मैंने अपनी शिकायत में पुलिस से स्पष्ट तौर पर कहा कि मुझे पीटने वालों ने मुझसे 'जय श्री राम' और 'भारत माता की जय' के नारे लगाने को कहा."

Image caption एफ़आईआर की कॉपी

लेकिन अगर आप सिटी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफ़आईआर पर नज़र डालें तो उसमें धार्मिक नारे लगाने के लिए विवश करने जैसी बात नज़र नहीं आती.

बरकत का कहना है कि उसे पढ़ना लिखना नहीं आता, ऐसे में उसने बोलकर अपना बयान दर्ज़ कराया था. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर बरकत आलम ने खुद अपने हाथों से पन्ने पर शिकायत नहीं लिखी तो उसकी शिकायत किसने लिखी.

इस मामले के जांच अधिकारी राम अवतार ने इस मामले पर किसी भी तरह के सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया.

मामले की जांच कर रहे एसीपी राजीव ने भी कई प्रयासों के बावजूद एफ़आईआर की सामग्री में फेरबदल किए जाने के आरोप को लेकर अपनी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी.

गुड़गांव के पुलिस कमिश्नर मुहम्मद अकील ने बीते मंगलवार एक प्रेस वार्ता में इस मामले के आपराधिक प्रकृति के होने की बात कही थी.

वह कहते हैं, "इस मामले की जांच में सामने आया है कि ये हमला एक व्यक्ति ने किया है. ये एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना है क्योंकि सभ्य समाज में इस तरह की घटना की कोई जगह नहीं है."

"इस मामले में हमनें 153 ए (धार्मिक भावनाएं भड़काने का मामला), 323 और 506 भी लगाई है. शिकायत के मुताबिक़, उस समय मोटर साइकिल पर चार लोग और भी थे, इसलिए हमनें 147 और 149 भी लगा दी. जिस लड़के ने उससे कहा - 'इस इलाके में टोपी पहनकर नहीं जा सकते' उसके साथ गाली-गलौज़ का भी ज़िक्र है. पुलिस ने इस मामले में एसआईटी गठित करके जांच शुरू कर दी है."

एफ़आईआर में 'जय श्री राम' का ज़िक्र नहीं होने पर एसपी अकील कहते हैं, "ये एक आपराधिक मामला है और अपराध का कोई धर्म नहीं होता है. पीड़ित ने एफ़आईआर में इस तरह के नारों की कोई बात नहीं लिखाई है. हालांकि, गालियों का ज़िक्र किया गया है. इस मामले में अब तक किसी चरमपंथी संगठन ने ज़िम्मेदारी नहीं ली है जिससे ये प्रतीत होता है कि ये एक व्यक्तिगत स्तर पर किया गया अपराध है. ये संभव है कि इस लड़के को किसी ने समझा-बुझाकर ये बयान देने के लिए कहा हो क्योंकि लोग ऐसे मौकों पर अपने हित साधने की कोशिश करते हैं."

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Image caption गुड़गांव पुलिस के कमिश्नर मुहम्मद अकील

एफआईआर में 153 ए धारा लगाई गई है और टोपी नहीं पहनने की बात कहे जाने का ज़िक्र है जिससे साफ़ है कि यह सांप्रदायिक नफ़रत का मामला है.

इसके बाद जब मुहम्मद अकील से ये सवाल किया गया कि क्या मौके पर मौजूद गवाहों ने जय श्री राम के नारों की बात का ज़िक्र किया है.

इसके जवाब में उन्होंने कहा, "मैं गवाहों के बयान देखकर आपको बता पाऊंगा लेकिन ये तय है कि कुछ तो हुआ है."

बीबीसी ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद उनसे आगे की जानकारी हासिल करने के लिए पुलिस आयुक्त के दफ़्तर में लगभग दो घंटे तक उनका इंतज़ार किया.

लेकिन तमाम संदेश भेजने के बाद भी उनकी ओर से किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं मिली.

पीड़ित पक्ष की ओर से थाने जाने वाले हाजी शहजाद ख़ान ने बीबीसी के साथ बातचीत में बताया कि उन्होंने भी जांच अधिकारी राम अवतार सिंह और एसीपी राजीव से एफ़आईआर में धार्मिक नारे लगाने के लिए मजबूर किए जाने का ज़िक्र नहीं होने पर एतराज़ किया था.

वह बताते हैं, "थाने में मैंने जांच अधिकारी और एसीपी राजीव कुमार दोनों से ये सवाल किया कि एफ़आईआर में नारे की बात शामिल क्यों नहीं की गई है. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि धारा तो लगा ही दी है, फिर इसको शामिल करने, या न करने की बात कहां से आती है."

"मैं मुसलमान हूं, जय श्री राम बोलता हूं"

गुड़गांव का जैकबपुरा इलाका एक हिंदू बहुल क्षेत्र है जहां की गलियों से गुज़रते हुए आपको दुकानों, पेड़ों, खंबों और घरों की छतों पर सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के झंडे और बैनर नज़र आते हैं.

स्थानीय लोग भी इस घटना से आहत नज़र आते हैं लेकिन किसी डर के चलते कैमरे के सामने कुछ भी कहने से इनकार करते हैं.

घटनास्थल के लगभग पचास कदम की दूरी पर दो टेलर बैठते हैं जो कि हनुमान जी और माता जी के कपड़े बनाने का काम लेते हैं.

बीबीसी ने जब इनसे बात करने की कोशिश की तो इनमें से एक ने कहा, "हमें कुछ नहीं पता. हम तो यहां काम की तलाश में आए हैं. यहां के स्थानीय मामले में हम कैसे बोलें?"

वहीं, नाम न बताने की शर्त पर एक अन्य टेलर कहते हैं, "ये कोई पहली बार थोड़े ही नहीं हुआ है. यहां तो अक्सर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं. हम छोटे लोग हैं. अपना घर-बार छोड़कर काम के लिए आए हैं. हिंदू लोगों के कपड़े भी सिलते हैं और मुस्लिमों के कपड़े भी सिलते हैं. ये सब बड़े घरों के लड़के हैं और मुस्लिमों को पीट दिया जाना, उनके साथ गाली-गलौज़ होना यहां के लिए कोई बड़ी बात नहीं है."

Image caption उम्मीद हसन स्थानीय निवासी हैं

इसके बाद जब हम उस मस्जिद में पहुंचे जहां बरकत नमाज़ अदा करने पहुंचे थे तो वहां हमारी मुलाकात उम्मीद हसन नाम के एक युवा से हुई.

कपड़े की दुकान चलाने वाले उम्मीद हसन बताते हैं, "मैं अभी मस्जिद में खड़ा हूं. मैं आपके सामने जय श्री राम बोल सकता हूं. जय श्री राम... क्या ये कहने से हमारा धर्म खराब हो गया? ये तो विश्वास की बात है. हम राम में भी भरोसा करते हैं और खुदा में भी. ये भरोसे की बात है. लेकिन किसी से जबरन कुछ भी कहलवाया जाना ग़लत है. और हम इसका विरोध करते हैं. मोदी जी ने इस बार अपना भाषण ख़त्म करते हुए सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वास का नारा दिया है. मैं चाहता हूं कि वो और उनकी सरकार इस मामले में न्याय करके मुस्लिम समाज का विश्वास हासिल करे."

रोज़गार की तलाश में कुछ 15 रोज़ पहले दिल्ली आए बरकत अब ये शहर छोड़कर वापस अपने गांव जाना चाहते हैं.

बरकत कहते हैं, "ये सब पुलिस कचहरी हो रहा है. कहीं उन लोगों ने फिर से हमला कर दिया तो क्या होगा. मुझे नहीं रहना यहां." ये कहते हुए बरकत की आंखों में आंसू आ जाते हैं.

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