प्रताप षडंगी: ऑटो रिक्शा-साइकिल से प्रचार करने वाले मोदी सरकार के मंत्री

  • 31 मई 2019
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23 मई से पहले प्रताप षडंगी को ओडिशा के बाहर शायद ही कोई जानता था. लेकिन पिछले एक हफ्ते में वे देश के सबसे अधिक चर्चित चेहरों में रहे .

वेशभूषा से राजनेता कम और साधु ज्यादा लगने वाले बालासोर से इस नवनिर्वाचित सांसद ने गुरुवार की शाम जब राष्ट्रपति भवन के अहाते में राज्य मंत्री के रूप में शपथ ली, तब तालियों की गड़गड़ाहट से ही पता चल रहा था कि वे खासे लोकप्रिय हैं.

64 वर्षीय षडंगी की ज़िंदगी की झलक दिखाने वाली उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं. गमछा पहने अपने घर के बाहर नल के पास नहाते हुए या फिर साइकिल पर या ऑटो रिक्शा पर चुनाव प्रचार करते हुए, मंदिर के बाहर पूजा करते हुए उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं.0

षडंगी ने ओडिशा में बजरंग दल के अध्यक्ष के तौर पर भी काम किया है और उससे पहले वह राज्य में विश्व हिन्दू परिषद के एक वरिष्ठ सदस्य भी रहे हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लंबे समय से जुड़े रहे षडंगी ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ता रहे हैं.

षडंगी के ख़िलाफ़ दंगा, धार्मिक उन्माद भड़काने जैसे कई मामले दर्ज हैं, हालाँकि उन्हें किसी भी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया है.

रात के ठीक आठ बजकर 55 मिनट पर दिल्ली में षडंगी शपथ ले रहे थे और बालासोर के भाजपा कार्यालय में जश्न मनाया जा रहा था. ढोल, नगाड़े बज रहे थे और मिठाइयां बांटी जा रही थीं.

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बालासोर से ही चुने गए बीजेपी विधायक मदन मोहन दत्त कहते हैं, "हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार प्रकट करते हैं कि उन्होंने प्रताप नना (ज्यादातर लोग उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं) जैसे कार्यकर्ता को अपने मंत्रिमंडल में स्थान दिया. वह केवल भाजपा के कार्यकर्ता ही नहीं थे, पूरा बालासोर आज जश्न मना रहा है."

केवल बालासोर ही नहीं, बल्कि पूरा ओडिशा गुरुवार को जश्न मना रहा था. सोशल मीडिया में भी उनकी शपथ ग्रहण की तस्वीर छाई रही.

नीलगिरी क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके षडंगी आज भी अपने गाँव गोपीनाथपुर में एक कच्चे मकान में रहते हैं. गावं में ही नहीं भुवनेश्वर में भी उनकी माँ उनके साथ रहती थीं. लेकिन पिछले साल उनके देहांत के बाद अब वे बिलकुल अकेले पड़ गए हैं.

हमेशा सफ़ेद कुर्ता-पायजामा, हवाई चप्पल और कन्धों पर कपड़े के झोले में नज़र आने वाले इस अनोखे राजनेता को भुवनेश्वर के लोग आए दिन सड़क पर पैदल जाते हुए, रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करते हुए या सड़क किनारे किसी झोपड़ी होटल में खाना खाते हुए देखते हैं.

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2004 से 2014 तक जब वे विधायक थे, तब भी उनकी जीवन शैली यही थी और आज भी वही है. भुवनेश्वर के एमएलए कॉलोनी में रहने वाले लोग जो उनके घर आते-जाते थे, वे यह देखकर हैरान होते थे कि वहां एक चटाई, कुछ किताबें और एक पुराने टीवी के अलावा कुछ नहीं था.

इस बार षडंगी के लिए चुनाव जीतना कतई आसान नहीं था. चुनाव मैदान में उनकी टक्कर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निरंजन पटनायक के बेटे नवज्योति पटनायक से थी, तो दूसरी तरफ थे पिछली बार उन्हें एक लाख 42 हज़ार वोटों से हराने वाले बीजेडी के रवींद्र जेना. ये दोनों उम्मीदवार खासे अमीर थे.

दोनों के प्रचार के लिए दर्ज़नों एसयूवी लगी हुई थी. इन दोनों उम्मीदवारों के सामने एक खटारा ऑटो रिक्शा की छत हटा कर उस पर खड़े होकर प्रचार करनेवाले 'प्रताप नना' भारी पड़े हालांकि षड़ंगी सिर्फ़ 12 हज़ार वोटों के मामूली अंतर से जीत पाए.

उनकी जीत की खबर सुनकर भुवनेश्वर निवासी विवेक पाटजोशी ने कहा, "प्रताप नना की जीत से भारतीय गणतंत्र पर लोगों का डगमगाता हुआ भरोसा वापस आएगा. उन्हें विश्वास होगा कि भले लोगों के लिए राजनीति में अब भी कुछ जगह बची हुई है."

संघ और हिंदुत्व

प्रताप षडंगी की राजनीति और उनके विचारों से असहमत लोगों की भी कमी नहीं है.

षडंगी के आठ अप्रैल 2019 के शपथपत्र के अनुसार उनके ख़िलाफ़ सात आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें ग़ैरक़ानूनी तरीके से इकट्ठा होना और दंगा, धार्मिक भावनाएं भड़काने आदि के मामले शामिल हैं. हालाँकि शपथपत्र के मुताबिक उन्हें किसी भी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया है.

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जनवरी, 1999 में क्योंझर ज़िले के मनोहरपुर गांव में ऑस्ट्रेलियाई डॉक्टर और समाजसेवी ग्राहम स्टेंस और उनके दो छोटे बच्चों की निर्मम हत्या के बाद मैं जब उसी गांव में उनसे पहली बार मिला, तब वे बजरंग दल के राज्य प्रमुख थे.

ग्राहम स्टेंस और उनके छोटे बच्चों की ज़िंदा जलाकर मार डालने के मामले में बजरंग दल के ही दारा सिंह को दोषी पाया गया था. षड़ंगी हिंदुओं के कथित जबरन धर्मांतरण के ख़िलाफ़ खुलकर अभियान चलाते रहे हैं. इस मुलाकात के समय दारा सिंह की गिरफ़्तारी नहीं हुई थी, षडंगी हत्या की निंदा तो कर रहे थे लेकिन उनका ज़ोर धर्मांतरण रोकने पर अधिक था.

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आरएसएस और बजरंग दल से जुड़े होने के कारण ज़ाहिर है कि उनके राजनीतिक विचार किसी से छिपे नहीं हैं, वे संघ की प्रचारक परंपरा से आते हैं और इसीलिए अविवाहित हैं.

कुछ लोगों ने उन्हें 'ओडिशा का मोदी' का खिताब भी दे डाला है क्योंकि मोदी की तरह वे भी घर-बार छोड़कर निकल पड़े थे और संघ से जुड़े रहे हैं, हालांकि मंत्री बनने के बाद उनकी जीवनशैली मौजूदा दौर के मोदी जैसी होगी या नहीं, यह देखना बाकी है.

आरके मिशन कोलकाता में कुछ समय बिताने के बाद वे वापस ओडिशा लौट आए, उहोंने कुछ दिन के लिए नीलगिरी कालेज में क्लर्क की नौकरी की. लेकिन नौकरी उन्हें रास नहीं आई.

तब तक आरएसएस की विचारधारा उनके दिलो दिमाग़ में बस गई थी. शीघ्र ही वे संघ की सहयोगी संगठनों के जरिए सामाजिक कार्यों में जुट गए.

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