नाबालिग दलित की मौत की गुत्थी उलझी, पिता का दावा- रेप के बाद जलाया: मुज़फ़्फ़रनगर से ग्राउंड रिपोर्ट

  • 1 जून 2019

उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में एक 14 साल की दलित लड़की के साथ कथित बलात्कार और हत्या का मामला उलझता जा रहा है.

ईंट भट्टे में काम करने वाले एक मज़दूर की बेटी का बुरी तरह झुलसा शव 24 मई को उन्हीं की झुग्गी में मिला था. उनकी झुग्गी भट्टे के नज़दीक ही है.

बच्ची के पिता ने भट्टे के मालिक समेत सात लोगों पर बलात्कार और उसके बाद पीड़ित को जलाकर मारने का आरोप लगाया है.

हालांकि पुलिस का कहना है कि जांच में लग रहा है कि बच्ची की मौत हादसे की वजह से हुई और मेडिकल रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई है.

पुलिस के मुताबिक मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती से आग लगी और लड़की बुरी तरह झुलसकर मर गई. पड़ोस में रहने वाले कुछ मजदूरों ने भी कहा कि दरवाज़ा अंदर से बंद था.

लेकिन दलित संगठनों का आरोप है कि बच्ची के शरीर पर चोटों के निशान थे और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बदल दी गई है.

भीम आर्मी ने आरोप लगाया है कि भट्टे के अन्य मज़दूर मालिक के ख़िलाफ़ बोलने से डर रहे हैं और प्रशासन भी मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है.

दलित संगठन न्याय की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं और गिरफ्तारी न होने की सूरत में आंदोलन की बात कह रहे हैं.

वहीं मुख्य अभियुक्त और भट्टी के मालिक गुड्डू का कहना है कि उन्हें 'फंसाया जा रहा है.'

पुलिस के दावे और दलितों के रोष के बीच उलझता ये मामला राजनीतिक रंग भी लेता दिख रहा है.

दलित बच्ची को रेप के बाद जलाकर मारा, या हुआ हादसा :

पिता बोले- जलकर कोयला हो गई थी

हम ईंट भट्टे के नज़दीक उस दलित बस्ती में पहुंचे जहां बच्ची का शव मिला था. वहां पहुंचकर हमने बच्ची के पिता और पड़ोसियों से बात की.

बच्ची के पिता ने बताया कि वो इसी भट्टी में मज़दूरी करते हैं और अपनी 14 साल की बेटी और 12 साल के बेटे के साथ पास की इसी बस्ती में रहते थे.

बच्चों की गूंगी-बहरी मां गांव में रहती हैं. इस मामले में दर्ज़ एफ़आईआर में बच्ची के पिता राम सिंह ने आरोप लगाया है कि जब वो बेटे और बेटी को छोड़कर बीमार पत्नी का इलाज कराने अपने गांव गए हुए थे, तब 24 मई को भट्टा मालिक और भट्टे के मुंशी समेत सात लोगों ने उनकी नाबालिग बेटी का बलात्कार किया और बाद में उसे घर में जलाकर मार दिया. एफआईआर में ये भी आरोप लगाया कि वहीं मौजूद उनके बेटे को डरा धमकाकर सुला दिया गया.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "22 मई की शाम 7 बजे मैं गांव निकल गया था. पत्नी की तबियत खराब थी, इसलिए आने में दो दिन की देर हो गई. पास रहने वाले रिश्तेदार ने 24 तारीख को सुबह फोन करके बताया कि तुम्हारी लड़की जलकर मर गई है."

बच्ची के पिता ने एफआईआर में लिखवाया है कि बच्ची के कपड़े और चप्पल पास के खेत से बरामद हुए हैं.

उन्होंने कहा, "मुझे शक है कि कुछ ना कुछ तो हुआ है. उसके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था और जिस स्थिति में वो थी, मुझे पूरा शक है."

"लड़की जलकर कोयला हो गई थी. कोई लेबर नहीं बता रही कि क्या हुआ था."

हालांकि जब आस-पास रहने वाले अन्य मज़दूर परिवारों से हमने बात की तो उन्होंने कहानी कुछ और बताई.

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नाबालिग दलित की मौत की गुत्थी उलझी. मुज़फ़्फ़रनगर से ग्राउंड रिपोर्ट.

'दरवाज़ा अंदर से बंद था'

सामने वाली झुग्गी में रहने वाली मंजू ने बताया, "रोज़ की तरह दोनों भाई-बहन बाहर बैठकर खाना खा रहे थे. सभी परिवार बाहर ही सोते हैं रोज़. उस दिन बारिश आ गई. तो रात को एक बजे के करीब हम सब अंदर चले गए. फिर हमें नहीं पता क्या हुआ. वो बच्ची भी अंदर जाकर सो गई होगी, लेकिन उसका भाई दरवाज़े के बाहर चारपाई पर ही सोया था."

"सुबह जब उठे तो पड़ोस की एक औरत ने उनकी झुग्गी से तेज़ धुआं निकलता देखा और सबको बुलाया. मेरी सास ने कहा कि बच्ची को देखो कहां है? हमने देखा कि बच्ची की चप्पलें बाहर पड़ी हैं. हमने दरवाज़े को खोलने की कोशिश की. दरवाज़ा अंदर से बंद था और बहुत गर्म हो गया था. फिर सबसे मिलकर दरवाज़ा तोड़ने का फैसला किया. चार-पांच आदमियों ने मिलकर दरवाज़ा तोड़ दिया. वो कभी दरवाज़ा बंद करके नहीं सोती थी, लेकिन उस दिन उसने पता नहीं कैसे दरवाज़ा बंद कर लिया."

उन्होंने बताया, "दरवाज़ा तोड़ा तो देखा कि अंदर बच्ची जल रही है. नलका दूर था. सबने घर के सामने बने गड्ढों से बाल्टी में पानी भर-भरकर आग बुझाई. उस पानी में मिट्टी भी मिली हुई थी तो उसके पैरों पर मिट्टी लग गई. उसका पूरा शरीर जलकर कोयले की तरह हो गया था. बस पांव बचे थे. पता नहीं चल रहा था कि मुंह कहां है और आंख कहां हैं."

दलित बच्ची को रेप के बाद जलाकर मारा, या हुआ हादसा

बच्ची जलती रही, किसी को पता नहीं चला

बच्ची लगभग 90 फीसदी जल चुकी थी. भीम आर्मी के ज़िलाध्यक्ष उपकार बावरा सवाल करते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि एक बच्ची इतनी बुरी तरह जल जाए और चिल्लाए भी ना और किसी को पता तक ना चले?

उन्होंने कहा, "जब हम लोग भट्टे पर पहुंचे, तो हमने जो देखा, उससे लगता है कि ये सुनियोजित हत्या है. क्योंकि बच्ची की चप्पलें कहीं और मिल रही हैं. बच्ची के पैर मिट्टी में सने हुए हैं. पैरों में चोटों के निशान हैं. बच्ची का पूरा शरीर कोयला हो गया है. हमें लगता है कि बच्ची को मारकर बाद में जलाया गया है."

लेकिन मंजू का कहना है कि किसी को पता नहीं चला. यहां तक की दरवाज़े के एकदम बाहर लेटे लड़की के भाई को भी नहीं. उनके मुताबिक उसके भाई को भी लोगों ने सुबह घटना के बाद उठाया. उन्होंने कहा कि कि शायद धुएं में दम घुटने की वजह से चीख नहीं पाई होगी.

मंजू ने कहा कि हैरानी की बात है कि जलने की बू तक नहीं आई.

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वहीं बच्ची के पिता का दावा है कि घर में कोई ऐसी चीज़ नहीं थी, जिससे आग लग सकती थी.

वो कहते हैं, "ना घर में कोई सिलेंडर था, ना कोई दिया. कैसे आग लग जाती. रसोई भी बाहर है."

लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बच्ची के गले में Soot Particles होने की बात कही गई है. पुलिस के मुताबिक ये पार्टिकल तभी अंदर जाते हैं, जब इंसान की जलकर मौत हुई हो, अगर मरने के बाद उसे जलाया जाए तो ये पार्टिकल अंदर नहीं जा सकते.

पुलिस का दावा- हत्या नहीं हादसा

लेकिन इलाके के चौकी इंचार्ज मनोज शर्मा का कहना है कि जांच से लग रहा है कि ये 'हादसा है.' उनका कहना है कि ऐसा लगता है कि बच्ची ने मच्छर मारने की अगरबत्ती जला रखी थी. जो नीचे पड़े कपड़ों पर गिर गई. उससे जो धुआं बना, उससे बच्ची बेहोश हो गई. झुग्गी में रजाई और गोबर के उपले भी रखे थे. उससे आग और भड़की होगी और बच्ची बुरी तरह झुलसकर मर गई.

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क्या बच्ची ने कभी किसी को कुछ बताया?

बच्ची अपने पिता और भाई के साथ भट्टे के मज़दूरों के लिए बनी बस्ती में तो रहती थी, लेकिन वो भट्टे पर काम नहीं करती थी.

वो घर पर रहती थी. पिता और भाई के लिए खाना बनाती थी और भट्टे पर उन्हें खाना देने जाया करती थी.

उसके घर के पास की महिलाओं ने बताया कि वो ज़्यादा किसी से मतलब नहीं रखती थी. बच्ची की मां गांव में रहती थी.

लेकिन बच्ची के पिता ने बताया था कि सामने वाली झुग्गी में रहनी वाली हम उम्र लड़की उसकी अच्छी दोस्त थी, जब हमने उस लड़की से बच्ची के बारे में पूछा तो कहा कि वो तो बच्ची से कभी बात करती ही नहीं थी.

भट्टा

अभियुक्त का पक्ष

एफआईआर में प्रमुख अभियुक्त बनाए गए और भट्टे के मालिक 49 वर्षीय गुड्डू ने सभी आरोपों से इनकार किया है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "भीम आर्मी के दबाव में मुझ पर आरोप लगा रहे हैं. मैं तो लोकेशन पर आया नहीं. मैं घर था. मुझे सुबह पांच बजे पता लगा. मेरा घर देवबंद में है जो भट्टे से 25 किलोमीटर दूर है. मैं सच बोल रहा हूं, मुझे डरने की ज़रूरत नहीं. सारे सबूत हमारे पक्ष में है. पोस्टमॉर्टम में भी सब साफ हो गया है. मैंने तो उस लड़की को कभी देखा भी नहीं. वो भट्टे पर काम नहीं करती थी और मैं कभी लेबर के डेरे में नहीं जाता. मेरी खुद की 21 साल की बेटी है, मैं ऐसा सोच भी नहीं सकता."

गुड्डू जाट समुदाय से हैं और उनका कहना है कि उनके ज़्यादातर मज़दूर दलित समुदाय के हैं और उन्होंने कभी किसी तरह की शिकायत नहीं की.

भीमा आर्मी के ज़िलाध्यक्ष उपकार बावरा
Image caption भीमा आर्मी के ज़िलाध्यक्ष उपकार बावरा

भीम आर्मी के दावे पर सवाल

भीम आर्मी के ज़िलाध्यक्ष उपकार बावरा ने कहा, "ये मजदूर बहुत ही गरीब लोग हैं, वो कुछ भी नहीं बोलेंगे. क्योंकि उनको वहां काम करना है, वो सच नहीं बोलेंगे. वो रोज़ाना दो ढाई सौ कमाने वाले लोग हैं, वो कहां कोर्ट कचहरी के धक्के खाते फिरेंगे. इसलिए वो बोलना नहीं चाहते. हमने उनसे पूछताछ की. कोई मुंह खोलने के लिए तैयार नहीं है. पता सबको है, पर कोई बोलने के लिए तैयार नहीं है."

उन्होंने कहा, "अगर किसी का हाथ भी जल जाए तो वो बहुत बुरी तरीके से चिल्लाता है. जिस तरह से वो बच्ची जली है, वो दस-पांच मिनट या आधे घंटे में नहीं जली. उसको लगभग घंटों लगे जलने में पूरा. कोई भी जलता है तो चिल्लाता है, लोग कह रहे हैं हमें पता नहीं चला. कैसे हो सकता है. पहले मारी गई, फिर जलाई गई."

उपकार कहते हैं कि इतिहास गवाह है दलितों या बहुजनों पर अत्याचार होता है तो शासन प्रशासन उसे दबाने की कोशिश करता है और वही नीतियां यहां चल रही हैं.

लेकिन भट्टे में काम करने वाले लोगों का कहना है कि जो लोग यहां थे उनकी बात मानने के बजाए उनकी बात क्यों सुनी जाए जो यहां रहते ही नहीं.

हालांकि भट्टा मालिक और पुलिस खुद ये कह रही है कि भीम आर्मी मामले को जबरन विवाद बनाना चाहती है. वहीं भीम आर्मी ने इस तरह की बातों को ख़ारिज किया है और कहा है कि वो पीड़ित दलित परिवार की मदद कर रहे हैं.

हरीश सिंह भदौरिया
Image caption हरीश सिंह भदौरिया

जांच जारी

क्षेत्राधिकारी नगर हरीश सिंह भदौरिया ने बताया कि मामला 302, 376 डी, 201, एससी एसटी एक्ट 3(2)(V), ¾ पोक्सो एक्ट की धाराओं के तहत दर्ज किया गया है.

पुलिस का कहना है कि बच्ची के पिता बार-बार बयान बदल रहे हैं. उनका कहना है कि परिजन ने पहले रेप और हत्या का मामला दर्ज नहीं कराया था, लेकिन बाद में दलित संगठनों के लोगों ने साथ आकर मामला दर्ज करवाया.

हरीश सिंह भदौरिया का कहना है कि दलित संगठन श्रेय लेने के लिए मामले को भटका रहे हैं. लेकिन उनके मुताबिक पुलिस साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई कर रही है.

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