मिस इंडिया फ़ाइनल में पहुंची सभी युवतियां एक जैसी क्यों?

  • 2 जून 2019
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बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा का करियर मिस इंडिया कांटेस्ट से ही शुरू हुआ था.

ऐसे में ये कोई हैरानी की बात नहीं है कि इस बार प्रतियोगिता के फ़ाइनल में पहुंचने वाली युवतियां अपनी प्रचार तस्वीरों में चौड़ी मुस्कान लिए हैं.

आख़िरकार ये ज़िंदगी बदल देने वाली प्रतियोगिता जो है.

लेकिन इन युवतियों की एक सामूहिक तस्वीर से अब विवाद भी खड़ा हो गया है. आलोचकों का कहना है कि प्रतियोगिता के आयोजनकर्ता त्वचा के रंग को तरजीह दे रहे हैं.

'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' अख़बार में प्रकाशित कोलाज में तीस ख़ूबसूरत लड़कियों के चेहरे हैं. ये अख़बार आयोजनकर्ता समूह का ही है.

लेकिन जब एक ट्विटर यूज़र ने इस कोलाज को पोस्ट करते हुए सवाल किया कि ''इस तस्वीर में ग़लत क्या है'' तो इस तस्वीर ने लोगों का ध्यान खींचना शूरू किया.

कंधों पर गिरते चमकीले बाल, साफ़ रंग जो बिलकुल एक जैसा लगता है, कुछ ने सवाल किया कि ये सब एक जैसी ही दिखती हैं.

कुछ ने मज़ाक़ में कहा कि ये एक ही व्यक्ति की अलग-अलग तस्वीरें हैं.

आलोचकों का तर्क है कि भले ही इस तस्वीर में कुछ ग़लत न हो लेकिन सभी का एक जैसा रंग एक बार फिर इस बात को रेखांकित करता है कि भारतीय साफ़ रंग को तरजीह देते हैं.

प्रतियोगिता की ग्रूमिंग एक्सपर्ट शमिता सिंह ने बीबीसी को बताया कि असली तस्वीरों को रीटच किया गया है क्योंकि सभी प्रतियोगी 'प्लास्टिक जैसी' लग रहीं थीं.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि फोटोशॉप टीम से कहा गया था कि प्रतियोगियों के रंग को न बदला जाए. उनका कहना है कि न्यूज़पेपर प्रिंट की वजह से ये सब ऐसी दिख रही हैं.

1990 के दशक के बाद से ब्यूटी पीजेंट या सौंदर्य प्रतियोगिताएं भारत में एक बड़ा व्यापार बन गई हैं. भारत में कई चर्चित मिस इंडिया हुई हैं जैसे एश्वर्या राय, सुष्मिता सेन और प्रियंका चोपड़ा.

मिस इंडिया जीतने वाली कई युवतियों ने बॉलीवुड में भी अच्छा नाम कमाया है.

यही वजह है कि देशभर में ऐसे संस्थान भी खुल गए हैं जो युवतियों को मिस इंडिया जैसी सौंदर्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए तैयार करते हैं.

ये भी एक तथ्य है कि है कि मिस इंडिया जीतने वाली अधिकतर युवतियां गोरे रंग की ही हैं और इसमें कोई हैरानी की बात भी नहीं है.

गोरे रंग को लेकर भारतीयों का दीवानापन जग जाहिर है, ख़ासकर महिलाओं के मामलों में. बहुत से लोग गोरे रंग को काले रंग से बेहतर भी मानते हैं.

कॉस्मेटिक बाज़ार की ज़रूरत

गोरे रंग वाली लड़कियों को शादी के मामले में भी प्राथमिकता दी जाती है. ये भी एक स्वीकार्य सच ही है.

1970 के दशक में देश के बाज़ार में रंग गोरा करने वाली क्रीम- फ़ेयर एंड लवली आई थी. अब रंग गोरा करने वाले कॉस्मेटिकों का बड़ा बाज़ार है और देश के शीर्ष सिने सितारे इनके विज्ञापन करते हैं.

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ऐसी क्रीम और जेल के विज्ञापन सिर्फ़ रंग गोरा करने का ही नहीं बल्कि जीवन में बेहतर नौकरी, प्रेम या शादी तक का वादा करते हैं.

और ऐसी सौंदर्य प्रतियोगिताएं गोरे रंग को बेहतर मानने वाली इसी धारणा को और मज़बूत करती हैं.

साल 2005 में किसी रचनात्मक व्यक्ति के मन में विचार आया कि गोरे रंग सिर्फ़ महिलाओं का ही नहीं होना चाहिए और फिर बाज़ार में आई पुरुषों को गोरा करने की पहली क्रीम- फ़ेयर एंड हैंडसम.

बॉलीवुड सुपरस्टार शाहरुख ख़ान ने इसका विज्ञापन किया और जल्द ही इस क्रीम ने बड़ा बाज़ार बना लिया.

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हाल के सालों में डार्क इज़ ब्यूटिफ़ुल (काले ख़ूबसूरत हैं) और #unfairandloverly जैसे अभियान शुरू हुए हैं जिन्होंने रंग को प्राथमिकता देने पर सवाल उठाए हैं.

लेकिन इससे बाज़ार में गोरा रंग बढ़ाने वाली क्रीम और कॉस्मेटिक में कोई कमी नहीं आई है. और यहां तक बगलों और महिलाओं के जननांगों का रंग साफ़ करने तक की क्रीम बाज़ार में आ गई हैं.

भारत में रंग गोरा करने का दावा करने वाली क्रीम और ब्लीच आदि का बाज़ार हज़ारों करोड़ रुपए का है.. माना जा रहा है कि साल 2023 तक महिलाओं का रंग गोरा करने के उत्पादों का बाज़ार 5 हज़ार करोड़ रुपए सालाना तक पहुंच सकता है.

इस तरह के उत्पादों का पक्ष लेने वाले कहते हैं कि रंग गोरा करने के उत्पाद लोगों की निजी पसंद हैं. अगर महिलाएं अपने होठों का रंग लाल करने के लिए लिपस्टिक लगा सकती हैं तो रंग गोरा करने के लिए क्रीम या जेल क्यों नहीं लगा सकती हैं?

ये बात तार्किक लग सकती है. लेकिन इसका विरोध करने वाले कहते हैं कि गोरे रंग को तरजीह देना भेदभाव को भी बढ़ावा देता है. इस तरह के उत्पादों से गोरे रंग की 'श्रेष्ठता' को धीरे-धीरे बढ़ावा मिलता है और इससे समाज में काले रंग के लोगों के प्रति नकारत्मक धारणा मज़बूत होती है. इसकी वजह से काले रंग वाले लोग के आत्मविश्वास को भी चोट पहुंचती है.

गोरे-काले का भेद

ऐसे उत्पादों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वालों का मानना है कि इससे काले रंग के लोगों के निजी और पेशेवर जीवन पर भी असर पड़ता है. कई बार तो इससे उनकी सफलता भी प्रभावित होती है.

ऐसी मॉडल है जो कहती हैं कि रंग की वजह से उन्हें काम मिलने में दिक्कत हुई. और बॉलीवुड में काले रंग वाली गिनी चुनी ही अभिनेत्रियां हैं जो प्रमुख भूमिका में रही हों.

साल 2014 में विज्ञापनकर्ताओं के स्व-नियामक संगठन एडवर्टाइज़िंग स्टेंडर्ड्स काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एएससीआई) ने कुछ दिशानिर्देश जारी किए थे जिसमें काले लोगों को बदसूरत, नाख़ुश, परेशान या चिंतित दिखाने पर रोक लगाई थी. संस्था ने ये भी कहा था कि शादी, नौकरी या पदोन्नति के मामले में भी उन्हें कमतर न दिखाया जाए.

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हालांकि विज्ञापन बनाए जाते रहे, ये अलग बात है कि अब वो पहले के चेहरा आधारित विज्ञापनों के मुकाबले थोड़ा कम हैं. चर्चित अभिनेता और अभिनेत्रियां अभी भी ऐसे उत्पादों के विज्ञापन करते हैं.

इसी बीच एक राहत देने वाली ख़बर भी आई है. दक्षिण भारतीय अभिनेत्री साईं पल्लवी ने दो करोड़ रुपए के रंग गोरा करने की क्रीम के विज्ञापन करने से इनकार करने की पुष्टि की है.

उन्होंने कहा, "ऐसा विज्ञापन करके मिले पैसों का मैं क्या करूंगी. मेरी ज़रूरतें बड़ी नहीं हैं. मैं ये कह सकती हूं कि जो पैमाने हमने तय किए हैं वो ग़लत हैं. ये हमारा भारतीय रंग हैं. हम विदेशियों के पास जाकर ये नहीं पूछ सकते हैं कि वो गोरे क्यों हैं."

"वो उनका रंग हैं, ये हमारा रंग है."

टिप्पणीकारों ने पल्लवी की टिप्पणी को ताज़ा हवा का झोंका कहा है. ख़ासकर तब जब उन्हें मिस इंडिया प्रतियोगियों के कोलाज के संदर्भ में देखा जा रहा है जिसमें भी प्रतियोगी- सफ़ेद पुती हुई सी दिख रही हैं.

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