क्या कांग्रेस के लिए मोदी मंत्र की काट खोज पाएंगी सोनिया गांधी?

  • 2 जून 2019
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"मैंने कैंपेन में कहा था कि जनता मालिक है और मालिक ने ऑर्डर दिया है. तो मैं सबसे पहले बीजेपी को, नरेंद्र मोदी जी को बधाई देना चाहता हूं. हमारी लड़ाई विचारधारा की लड़ाई है. दो अलग-अलग सोच हैं. एक नरेंद्र मोदी की, बीजेपी की सोच है और एक कांग्रेस पार्टी की सोच है. दो अलग-अल विज़न हैं. मगर हमें ये मानना पड़ेगा कि इस चुनाव में नरेंद्र मोदी जी और बीजेपी जीते हैं, तो मैं उनको बहुत-बहुत बधाई देता हूं."

ये शब्द राहुल गांधी के हैं जो उन्होंने 23 मई को यानी लोकसभा चुनाव के नतीजे साफ़ होने के बाद कहे थे. इसके साथ ही उन्होंने कांग्रेस पार्टी की हार की ज़िम्मेदारी भी ली थी.

हालांकि जब उनसे अध्यक्ष पद के इस्तीफ़े के बारे में पूछा गया तब उन्होंने इसे अपने और कांग्रेस कार्यसमिति के बीच का मुद्दा बताया. बाद में उन्होंने इस्तीफ़े की पेशकश भी की, जिसे कार्यसमिति ने ठुकरा दिया गया.

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हालांकि इसके बाद से ही पार्टी के ढांचे में बदलाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी.

इसके कुछ ही दिनों बाद पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला का ये बयान सुनने को मिला:

"कांग्रेस कार्यसमिति उन चुनौतियों, कमियों और विफलताओं को स्वीकार करती है जिनकी वजह से प्रतिकूल जनादेश आया. कांग्रेस कार्यसमिति पार्टी के हर स्तर पर संपूर्ण आत्मचिंतन के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष को अधिकृत करती है कि वो पार्टी के संरचनात्मक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन एवं विस्तृत पुनर्संरचना करें."

बयानों और कयासों के बीच आख़िरकार शनिवार दोपहर ख़बर आई कि यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुन लिया गया.

ये फ़ैसला ऐसे वक़्त में लिया गया है जब राहुल गांधी के अध्यक्ष पद पर बने या न बने रहने को लेकर भी स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं हैं. अब सोनिया गांधी ही लोकसभा में नेता का चुनाव करेंगी और उनके नेतृत्व में पार्टी का संसदीय दल भविष्य की रणनीतियां तय करेगा.

इस बदलाव के बाद कई अहम सवाल उठ रहे हैं.

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मसलन, क्या सोनिया गांधी को एक बार फिर आगे करके कांग्रेस अपना अस्तित्व बचा पाएगी? नई प्रतिभाओं को मौके देने की बजाय पार्टी पुराने चेहरों पर ही भरोसा क्यों जता रही है?

इस बारे में इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार और कांग्रेस को लंबे वक़्त तक कवर करने वाले रशीद किदवई कहते हैं कि कांग्रेस के लिए ये बदलाव का वक़्त है लेकिन उसकी समस्या यही है कि वो बदलना ही नहीं चाहती.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "कांग्रेस की मुश्किल ये है कि वो अपने काम करने के ढांचे को नहीं बदलना नहीं चाहती और साथ ही ये भी चाहती है उसके प्रति लोगों का नज़रिया बदल जाए. अभी राहुल गांधी ट्वीट करके अपनी मां को संसदीय दल का नेता चुने जाने की बधाई दे रहे हैं. नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने इसी परिवारवाद के ख़िलाफ़ माहौल बनाकर चुनाव जीता है. कांग्रेस में ये बदलाव का वक़्त है. ऐसे में अगर सोनिया गांधी लोकसभा नेता के पद के लिए नेहरू-गांधी परिवार से इतर कोई चेहरा मनोनीत करती हैं तो उससे सकारात्मक संदेश जाएगा."

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रशीद किदवई का मानना है कि इस वक़्त देश का माहौल परिवारवाद के ख़िलाफ़ और शायद राहुल गांधी ये बात समझ चुके हैं, इसीलिए उन्होंने इस्तीफ़े की पेशकश की है. बेहतर होगा कि राहुल गांधी का इस्तीफ़ा स्वीकार करके कोई अन्य विकल्प ढूंढा जाए.

किदवई कहते हैं, "दूसरी बात ये भी है कि अगर राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया है तो क़ायदे से कांग्रेस कार्यसमिति का भी कार्यकाल भी ख़त्म हो जाना चाहिए क्योंकि समिति के सदस्य ख़ुद राहुल ने ही चुने थे. लेकिन इन सब पर कोई स्पष्टता नहीं है, जो कि चिंता की बात है."

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अदिति फड़नीस का मानना है कि अगर क़रीब से देखा जाए तो कांग्रेस के पास सोनिया गांधी को आगे करने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है.

वो कहती हैं, "इस समय कांग्रेस के सामने अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है और एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाकर ये कोशिश कर रही है कि किसी तरह पार्टी बनी रहे. इस चुनाव में पार्टी को बहुत बुरी तरह से धक्का लगा है और इस हार से उबरने के लिए एक ऐसे नेता की ज़रूरत है जो उसका आत्मविश्वास लौटा सके. मेरे ख़्य़ाल से वो आत्मविश्वास और स्वाभिमान सोनिया गांधी ही फूंक सकती हैं क्योंकि पार्टी में सब मानते हैं कि इस समय कांग्रेस में उनसे बड़ा और प्रभावशाली नेता कोई और नहीं है."

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कांग्रेस की हार के पीछे क्या उसके उठाए मुद्दों की विफलता है या फिर लोगों के मन में पार्टी के लिए दुराव?

इसके जवाब में अदिति फड़नीस कहती हैं, "बात अगर मुद्दों की करें तो उन्हीं मुद्दों के दम पर पार्टी को केरल में सफलता हासिल हुई, तमिलनाडु में उसने बीजेपी को पछाड़ा, पंजाब में भी जीत मिली तो फिर बाकी जगहों पर क्यों नहीं? इसलिए हार के लिए मुद्दों को ज़िम्मेदार ठहराना वाजिब नहीं लगता."

लेकिन इस हार की ज़िम्मेदारी अकेले राहुल गांधी के सिर पर डालना कितना उचित है?

अदिति फड़नीस कहती हैं, "हां, एक मायने में देखा जाए तो राहुल गांधी विफल ज़रूर रहे. वो अपनी पार्टी के लिए अपेक्षित सीटें नहीं ला पाए लेकिन किसी चुनाव के हारने या जीतने में सिर्फ़ एक व्यक्ति की भूमिका नहीं होती. हां, ये चुनाव नरेंद्र मोदी का था और उन्होंने बीजेपी की जीत में बड़ी भूमिका निभाई लेकिन अगर पार्टी का पूरा तंत्र उनका साथ न देता तो शायद उसे इतनी बड़ी जीत न मिल पाती."

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नेहरू-गांधी परिवार से इतर चेहरों को पार्टी में बड़े पदों पर लाने के अलावा कांग्रेस और क्या कर सकती है जिससे उसकी खोई हुई ज़मीन कुछ हद तक ही सही, वापस आ सके?

इसके जवाब में रशीद किदवई कहते हैं, "कांग्रेस के लिए अभी एक अच्छा मौका ये है कि जो पार्टियां और नेता उससे छिटककर अलग हो गई हैं, उन्हें वो वापस लाए. जैसे कि शरद पवार की एनसीपी, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस और, केसीआर की तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीएसआर) चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी). ये सभी पार्टियां अपने-अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं और मज़बूत भी. कांग्रेस को चाहिए इन पार्टियों के साथ मिलकर एक संगठित मोर्चा बनाए और एक नई शुरुआत करे क्योंकि अब ये नेहरू-गांधी परिवार के बस की बात नहीं है कि वो नरेंद्र मोदी और बीजेपी की काट ढूंढ सके."

अदिति फड़नीस का मानना है कि कांग्रेस की वैचारिक शक्ति ही उसके वजूद को बचा सकती है.

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वो कहती हैं, "कांग्रेस अगर अपने 'आइडिया ऑफ़ इंडिया' को लोगों को समझा सके, इसे मूर्त रूप दे सक, तब शायद कुछ हो सकता है. दूसरा तरीका ये है कि जिन राज्यों में उसकी सरकार है वहां सकारात्मक और जन कल्याणकारी प्रयोग किए जाएं. ये इसलिए फ़ायदेमंद होगा क्योंकि बीजेपी शासित राज्यों और कांग्रेस शासित राज्यों की स्थिति में बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं है. ऐसे में अगर कांग्रेस अपने बेहतर प्रशासन और योजनाएं से साबित कर दे कि वो लोगों को बेहतर ज़िंदगी दे सकती है तो शायद लोग उसकी ओर एक बार फिर रुख करें."

रशीद किदवई भी पार्टी को ज़मीनी स्तर लोगों से जुड़ने और उनसे संवाद क़ायम करने की ज़रूरत बताते हैं.

हालांकि आगे के दिनों जो कुछ भी, फ़िलहाल सबकी नज़रें इस बात पर टिकी हैं कि सोनिया गांधी लोकसभा का नेता किसे चुनती हैं क्योंकि इसके बाद पार्टी की आगे की रणनीति काफ़ी कुछ साफ़ हो जाएगी.

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