प्रशांत कनौजिया मामले में कौन सही कौन ग़लत

  • 11 जून 2019
प्रशांत कनौजिया इमेज कॉपीरइट प्रशांत कनौजिया परिवार

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ़्तार पत्रकार प्रशांत कनौजिया को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर एक कथित आपत्तिजनक ट्वीट मामले में रिहा करने का आदेश दिया.

प्रशांत कनौजिया के अलावा पुलिस ने एक टीवी चैनल नेशन लाइव के दो पत्रकारों इशिका सिंह और अनुज शुक्ला को इस ट्वीट में अपलोड किए गए वीडियो पर बहस आयोजित करने पर गिरफ़्तार किया था.

पिछले तीन दिनों में पुलिस ने तीन और लोगों को गिरफ़्तार किया है. उन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छेड़छाड़ की गई तस्वीरों को शेयर करने या उन्हें अपलोड करने से जुड़े आरोप हैं.

जहां इशिका सिंह और अनुज शुक्ला या उनके परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है, दिल्ली में रह रहे प्रशांत कनौजिया के मामले में सबसे ज़्यादा बहस हुई है.

शनिवार आठ जून क़रीब 12, साढ़े बज़े दोपहर का वक्त था. पत्रकार प्रशांत कनौजिया पूर्वी दिल्ली के पूर्वी विनोद नगर के अपने तीसरी मंज़िल के घर से नीचे कुछ सामान ख़रीदने गए थे.

जब वो वापस घर आए तो उनके साथ दो और लोग थे.

इमेज कॉपीरइट AFP/Getty

केंद्रीय दिल्ली में प्रेस क्लब के बाहर प्रदर्शन कर रहे पत्रकारों के पास खड़ीं प्रशांत की पत्नी जगीशा ने कहा, "प्रशांत ने कपड़े बदले और चले गए. जाने से पहले उन्होंने कहा कि उन्हें योगी आदित्यनाथ पर एक ट्वीट को लेकर ले जाया जा रहा है."

साथी पत्रकार प्रशांत और दो अन्य पत्रकारों की गिरफ़्तारी के खिलाफ़ नारे लगा रहे थे. एक के हाथ में तख़्ती थी जिस पर लिखा था, "पत्रकारों, अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए इकट्ठा हो."

प्रशांत के विवादास्पद ट्वीट में एक वीडियो के साथ उनकी एक टिप्पणी थी. इस ट्वीट पर शिकायत करने वाले लखनऊ के सब-इंस्पेक्टर विकास कुमार हैं.

बीबीसी से बातचीत में विकास कुमार ने कहा कि उस ट्वीट में "मुख्यमंत्री जी के खिलाफ़ आपत्तिजनक शब्द थे" और वो "अशोभनीय" थी.

क्या उन्हें ख़ुद इस ट्वीट पर आपत्ति थी या फिर उन्हें किसी ने शिकायत दर्ज करने के लिए कहा, इस पर विकास कुमार ने हमें उच्च अधिकारियों से बात करने को कहा.

उधर प्रशांत के नज़दीकी एक व्यक्ति के मुताबिक़ उन्हें ख़ुद पुलिस के साथ जाने की बजाय तुरंत सोशल मीडिया पर ज़िक्र करना चाहिए था ताकि सभी को तुरंत इस बारे में पता चला जाता.

पत्नी जगीशा का आरोप है कि "सादे कपड़े में" उनके घर पहुंचे लोगों ने ना गिरफ़्तारी का वॉरंट दिखाया और न गिरफ़्तारी का कारण.

जगीशा के मुताबिक़ ये सब कुछ इतना जल्दी हुई कि उन्हें कुछ समझ ही नहीं आया.

वो बताती हैं, "जब मुझे होश आया तो मैंने प्रशांत को फ़ोन किया. उसने बताया कि पुलिस उसे लखनऊ ले जा रही थी. आवाज़ से लगा कि वो डरे हुए थे."

जगीशा कहती हैं, "वो मज़ाकिया ट्वीट था और उसे कई लोगों ने रिट्वीट किया, लाइक किया. कई ने उसके बारे में फ़ेसबुक पर लिखा. फिर सभी लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? सिर्फ़ प्रशांत के खिलाफ़ कार्रवाई क्यों हुई?"

उत्तर प्रदेश पुलिस प्रमुख ओपी सिंह से तमाम कोशिशों के बावजूद इन आरोपों पर बात नहीं हो पाई लेकिन मामले के जांच अधिकारी वृजेंद्र कुमार मिश्र जगीशा अरोड़ा के आरोपों से इनकार करते हैं.

वृजेंद्र के मुताबिक चार पुलिसकर्मी प्रशांत कनौजिया के घर गए थे, उन्होंने पुलिस की यूनिफॉर्म पहनी हुई थी और उन्होंने गिरफ़्तारी का कारण बताया गया था.

वो कहते हैं, "स्थानीय पुलिस को टीम (गिरफ़्तारी के बारे में) बताकर आई थी." वृजेंद्र मिश्रा के मुताबिक़ वो ख़ुद टीम में शामिल नहीं थे.

उधर वकील अर्जुन शेओरान गिरफ़्तारी को "गिरफ़्तारी नहीं, राज्य द्वारा अपहरण" बताते हैं.

वो कहते हैं, "अगर आप ये किसी पत्रकार के साथ कर सकते हैं तो बाकी लोग भी अपनी आलोचना बंद कर देंगे. सोच यही है."

प्रशांत कनौजिया को आईपीसी की धारा 500 और भारतीय आईटी क़ानून की धारा 66 के अंतर्गत गिरफ़्तार किया गया.

आईपीसी की धारा 500 मानहानि से जुड़ी है जबकि आईटी क़ानून की धारा 66 का ताल्लुक कंप्यूटर से जुड़े अपराध से है जिन्हें बेईमानी और धोखे से किया गया हो.

अर्जुन शेओरान कहते हैं, "आईपीसी की धारा 500 में गिरफ़्तारी का कोई प्रावधान नहीं है. पहले आपको अपना मामला साबित करना होता है. फिर आपको (अदालत मे) बुलाया जाता है. जब तक आपको सज़ा नहीं दे दी जाती तब तक आपको गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता. (प्रशांत की) गिरफ़्तारी क़ानून की प्रक्रिया का उल्लंघन है."

शेओरान के मुताबिक़ धारा 66 हैकिंग जैसे मामलों में लगाई जाती है न कि किसी ट्वीट पर.

वो कहते हैं, "अगर योगी आदित्यनाथ को लगा कि अपमानजनक हैं तो उन्हें एक केस फ़ाइल करना चाहिए था. अभियुक्त को बुलाया जाता और शायद उसे सज़ा होती."

"आपको सादे कपड़े में आए लोग गिरफ़्तार नहीं कर सकते. आपको कौन गिरफ़्तार कर रहा है, इसका पता होना चाहिए. किस धारा में आपको गिरफ्तार किया जा रहा है, आपको इसके बारे में पता होना चाहिए."

उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्रवाई की एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने कड़ी निंदा की है.

एक वक्तव्य में गिल्ड ने इसे प्रेस को डराने और अभिव्यक्ति की आज़ादी का दम घोटने की कोशिश बताया.

इमेज कॉपीरइट PRASHANT KANOJIA/FACEBOOK

उधर पूर्व उत्तर प्रदेश पुलिस प्रमुख प्रकाश सिंह के मुताबिक, "जो लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी का उल्लंघन कर रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई आवश्यक है. उस कार्रवाई में नियमों को ध्यान में रखा गया या नहीं, ये एक अलग विषय है."

वो कहते हैं, "असली ट्वीट को तो मैंने नहीं देखा है, लेकिन किसी ने वो ट्वीट फॉरवर्ड किया और उसे मैंने पढ़ा था और वो बहुत आपत्तिजनक, निंदनीय और चिढ़ानेवाला है. इस देश में दुर्भाग्य से अभिव्यक्ति की आज़ादी को गाली देने, बदनाम करने, नीचे गिराने, बेइज़्जती करने और मज़ाक उड़ाने की आज़ादी के तौर पर देखा जा रहा है."

"अभिव्यक्ति की आज़ादी की भी एक सीमा है और संविधान में इसका ज़िक्र है. इससे शांति व्यवस्था पर असर नहीं पड़ना चाहिए. इससे मर्यादा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए. लेकिन यहां अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब है आप जो भी चाहे बोलना चाहो, जो भी आरोप लगाना चाहो लगा लो, उसका कोई आधार हो या न हो."

सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर गिरफ़्तारी या पुलिस की कार्रवाई कोई नई बात नहीं है.

अखबार मिंट के मुताबिक साल 2017, 2018 में सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर कम से कम 50 लोगों को गिरफ़्तार किया गया था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार