राज ठाकरे का एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाना खुदकुशी या आखिरी विकल्प?

  • 6 जून 2019
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राज ठाकरे क्या करेंगे, पिछले कई चुनावों में उन्हें लगातार हार का सामना करना पड़ा है तब भी महाराष्ट्र की राजनीति में उनका महत्व कम नहीं हुआ है.

लोकसभा चुनावों में उन्होंने कुछ भी दांव पर नहीं लगाया था, उनका एक भी उम्मीदवार नहीं खड़ा था, तब भी बीजेपी विरोधी उनका प्रचार अभियान एनसीपी-कांग्रेस के मुकाबले ज़्यादा असरदार रहा.

लेकिन उन्होंने राज्य में सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ़ जो माहौल बनाया है वो विधानसभा चुनाव में कितना फ़ायदा देगा?

अगले विधानसभा चुनावों में गठबंधन बनेगा या नहीं इस बात पर अभी तक राज ठाकरे, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और कांग्रेस की ओर से कोई साफ़ जवाब नहीं मिला है.

हालांकि लोकसभा चुनाव के बाद राज ठाकरे और शरद पवार की मुलाक़ात हुई. कांग्रेस के माणिक राव ठाकरे ने भी राज ठाकरे से मुलाकात की.

पिछले लोकसभा चुनाव में शरद पवार चाहते थे कि राज ठाकरे साथ आएं, लेकिन मुंबई कांग्रेस इसके ख़िलाफ़ थी क्योंकि उसे ठाकरे के उत्तर भारतीय विरोधी रुख़ से ख़तरा लगता था.

लेकिन अभी लोकसभा में भारी हार के बाद राज ठाकरे का रवैया बदला है.

गठबंधन की ज़रूरत

लेकिन सवाल यह है कि एनसीपी या कांग्रेस के पास ही जाना राज ठाकरे के लिए एकमात्र विकल्प बचा है? ये राज ठाकरे के लिए आत्महत्या जैसा होगा या सही विकल्प? हार की वजह से वो गठबंधन करेंगे या उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है?

राज ठाकरे ने लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ जमकर प्रचार किया था. लेकिन उससे पहले के सभी चुनावों में, उन्होंने कांग्रेस-एनसीपी को निशाना बनाया था और चारों दलों से खुद को अलग दिखाने की कोशिश की थी.

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तो क्या राज ठाकरे अपना स्वतंत्र वजूद छोड़ देंगे?

देखा जाए तो विधानसभा चुनाव महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के लिए वजूद की लड़ाई है. राजनीति में कोई पूरी तरह ख़त्म नहीं हो जाता. लेकिन लगातार हार से राजनीतिक जीवन की उम्मीद कम हो जाएगी. ये संकेत है कि राज ठाकरे लोकसभा के प्रचार में भीड़ इकट्ठा करने के बाद भी कोई असर नहीं डाल पाए.

मनसे ये स्थिति दोबारा नहीं चाहेगी, इसलिए वे हर संभावना को आजमा रहे हैं. उनमें से एक संभावना है कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन की.

लेकिन इसमें एक अड़चन है. पहली बात ये है कि ऐसा करने से क्या मनसे का खुद का कोई वोटर बेस बनेगा या शिव सेना-बीजेपी विरोधी वोट तैयार होगा.

देखा गया है कि राज ठाकरे को परंपरागत रूप से केवल शिवसेना और भाजपा के वोट मिले थे. शुरू में, उनकी राजनीति शिवसेना विरोध के भावनात्मक मुद्दे पर ही खड़ी थी.

लेकिन शहरी मध्य वर्ग, जो उस समय भाजपा का वोट बैंक था, विशेष रूप से पुणे-मुंबई-नासिक के त्रिकोण में, वे राज ठाकरे के पास भी गए.

इसके परिणामस्वरूप 2009 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इसका कुछ असर दिखा. नगरपालिका चुनावों में तीन शहरों में और उससे आगे भी उनका प्रभाव फैला.

साल 2014 के बाद, जब से राज्य में नरेंद्र मोदी की भाजपा की जीत हुई, राज ठाकरे की विफलता बढ़ती गई है.

शिवसेना का जो वोट मनसे को मिला था वो फिर शिवसेना की ओर लौट गया. उसका कांग्रेस और एनसीपी के वोटों पर कोई असर नहीं पड़ा.

इसी वजह से कांग्रेस-एनसीपी-मनसे का संयुक्त वोट बढ़ जाएगा, लेकिन इसमें राज ठाकरे को कितना फ़ायदा होगा ये देखना होगा.

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गठबंधन के साथ

राजनीतिक विश्लेषक अभय देशपांडे कहते हैं, "नेताओं के पास एक ही विकल्प हो सकता है कि वे गठबंधन के साथ रहें."

"अभी लोकसभा चुनावों में जो उन्होंने भूमिका निभाई उसके कारण शिवसेना और बीजेपी की ओर जाने का कोई मकसद नहीं बचा है और अकेले लड़ने में कुछ फ़ायदा नहीं है. राजनीति का इतना ध्रुवीकरण हो गया है कि तीसरा विकल्प भी नहीं बचा है. जो कुछ तीसरा विकल्प था वो प्रकाश आंबेडकर की पार्टी वंचित बहुजन अघाड़ी ने ले लिया है.

देशपांडे कहते हैं, "इसी वजह से उनका एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाना ही एकमात्र विकल्प बचता है. सेना बीजेपी के साथ जाने का कोई विकल्प नहीं है और उन्होंने खुद ही सारे दरवाज़े बंद कर दिए हैं. इसीलिए वो एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाकर बीजेपी -शिवसेना विरोधी मतों में हिस्सेदार बनना चाहते हैं."

लेकिन इस संभावित गठबंधन में राज ठाकरे को कितनी सीटें मिलेंगी? इसके अलावा, किन मुद्दों पर वे अधिकतम सीटें लेने का दबाव डालेंगे ये भी एक सवाल है.

लोकमत के वरिष्ठ सहायक संपादक संदीप प्रधान कहते हैं, "गठबंधन के साथ चुनाव लड़ते भी हैं तो उन्हें सीटें भी कम ही मिलेंगी."

वो कहते हैं, "कांग्रेस और एनसीपी के बीच सीट बंटवारे के बाद बची हुई सीटें ही मनसे को मिलेंगी. इसमें भी उन जगहों पर मनसे को सीटें दी जाएंगी जहां शिवसेना का गढ़ है, या वे सीटें जहां कांग्रेस-एनसीपी के उम्मीदवार सालों से जीत नहीं पाए हैं."

ऐसी स्थिति में उन्हें कम से कम सीटों में अधिक से अधिक परिणाम दिखाना होगा.

इसके अलावा कांग्रेस एनसीपी का घोषणा पत्र ही मनसे का भी होगा. जो मुद्दे कांग्रेस या एनसीपी को पसंद नहीं हैं वो उन्हें छोड़ने पड़ेंगे.

लेकिन इस चुनाव में उन्हें इस बात का फ़ायदा मिल सकता है कि कोई तो है उनके साथ. हालांकि गठबंधन के साथ जाने पर मनसे का चुनाव लड़ना पार्टी के लिए बहुत आसान नहीं होगा.

अभय देशपांडे कहते हैं, "शहरी क्षेत्रों में, विशेषकर मुंबई में एनसीपी की ज्यादा पैठ नहीं है. ठाणे ज़िले का एक छोटा हिस्सा छोड़ दें जहां इसका थोड़ा बहुत प्रभाव है तो अन्य जगहों पर उसका थोड़ा ही असर बचा है. यहां मनसे के कैडर हैं, और अगर यहां से उसे सीट मिलती है तो उसे अतिरिक्त वोट मिल सकते हैं. राज ठाकरे को इसी तरह की राजनीति करनी होगी."

मुंबई, नासिक, पुणे और ठाणे के कुछ हिस्सों में, जहां मनसे को पिछले चुनावों में ठीक-ठाक वोट मिले हैं और यहां के स्थानीय निकायों में भी उनके लोग हैं और विधायक भी चुने गए हैं, उनका दावा मजबूत होगा.

केवल शिवसेना के वोटों में सेंध लगाने वाली पार्टी के रूप में इस्तेमाल होने से मनसे को बचना होगा.

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क्या स्वतंत्र वजूद रह पाएगा?

अगर मनसे एनसीपी के साथ जाती है, तो क्या राज ठाकरे अपनी पार्टी का स्वतंत्र वजूद बचाए रख पाएंगे?

राज ठाकरे ने हमेशा से कहा है कि उनकी पार्टी भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी से अलग है.

उन्होंने हमेशा एक नया विचार देने की अपील की है. अबतक उन्होंने किसी पार्टी से गठबंधन नहीं किया है और इसी वजह से उन्हें वोट मिलते आए रहे हैं. पर अभी गठबंधन में शामिल होने से उनका अलग वजूद बना रह पाएगा?

अभय देशपांडे कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि उनके अलग वजूद पर गठबंधन के साथ जाने का कोई असर पड़ेगा."

देशपांडे ने कहा, "शिवसेना में 20 साल रहने के बाद, उन्होंने अपनी एक नई जगह बनाई है और यहां तक कि सीटें भी हासिल की हैं, इसलिए गठबंधन में रहकर खुद का वजूद खत्म हो जाएगा ऐसा कहना ग़लत होगा, वरना शिवसेना को तो सीटें ही नहीं मिलतीं. गठबंधन की राजनीति में खुद की जगह बनाई रखी जा सकती है."

"मुझे नहीं लगता कि अगर वे अकेले लड़ते हैं, तो उन्हें ज्यादा फ़ायदा नहीं होगा. मैं लोकसभा चुनावों के परिणामों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूं क्योंकि वे विधानसभा में अलग होते हैं. जैसे लोकसभा में मोदी को देख कर वोट पड़े तो विधानसभा में देवेंद्र फडनवीस का चेहरा आगे होगा."

आपातकाल के बाद, 'कांग्रेस-विरोध' के मुद्दे पर कई दल एक साथ आए. अब सभी दलों को 'भाजपा-विरोध' के एक मुद्दे पर एक साथ आने की ज़रूरत है.

संदीप प्रधान कहते हैं, "इस लिहाज से, राज ठाकरे का आगे आना फ़ायदेमंद होगा और लोगों को एकसाथ विकल्प मिलेगा. यदि ये सभी अलग-अलग लड़ते हैं, तो लाभ केवल सत्ता पक्ष को होगा. वे एक-दूसरे के ही वोट काटेंगे."

लेकिन राज ठाकरे को यह भी देखना होगा कि लोकसभा चुनावों में मोदी और भाजपा की लोकप्रियता उतनी ही थी, जितनी कांग्रेस और एनसीपी के विरोध का माहौल था.

क्योंकि ये न केवल इस लोकसभा चुनाव में दिखाई दिया, बल्कि पिछले चार सालों में राज्य में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भी देखा गया.

इसलिए, विपक्षी दलों के ख़िलाफ़ नाराजगी का यह सिलसिला, अगर विधानसभा चुनावों में जारी रहता है, तो राज ठाकरे को गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए आगे आना होगा.

लेकिन महाराष्ट्र ने यह भी देखा है कि राज ठाकरे, जो शरद पवार और कांग्रेस-एनसीपी के क़रीबी हैं, कभी नरेंद्र मोदी के भी क़रीबी थे.

उन्होंने उनकी तारीफ़ की थी. नितिन गडकरी भी उनके काफी क़रीबी माने जाते हैं.

हालांकि भाजपा के साथ रहने का उन्हें कोई राजनीतिक फ़ायदा नहीं मिला, शायद इसीलिए राज ठाकरे राजनीतिक दिशा बदल रहे हैं.

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राजनीतिक भविष्य

अभय देशपांडे कहते हैं, "पार्टी के लिहाज से देखा जाए तो 2007 से 2012 तक पांच साल में उन्होंने जो हासिल किया वो गंवा चुके हैं. इसीलिए 2014 के बाद की राजनीति में उन्हें कहीं और गठबंधन करने की ज़रूरत थी. साल 2012 के स्थानीय चुनाव से पहले उन्होंने गुजरात दौरा किया, मोदी की प्रसंशा की, पर इसका उनको कोई फ़ायदा नहीं मिला और शिवसेना-बीजेपी की सरकार सत्ता में आ गई."

शिवसेना-बीजेपी गठबंधन में हैं और उन्होंने लोकसभा चुनाव भी एक साथ लड़ा और एक साथ विधानसभा भी चुनाव लड़ेंगे.

यही कारण है कि विधानसभा चुनावों के बीच रुख़ बदलने की बजाय उन्होंने लोकसभा से ही इसकी शुरुआत कर दी.

अभय देशपांडे ने कहा कि लोकसभा प्रचार के दौरान भले ही एनसीपी-कांग्रेस को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ लेकिन इससे राज ठाकरे ने अपनी राजनीति की दिशा तय कर दी.

लेकिन यह केवल विधानसभा चुनाव ही नहीं है, बल्कि उनके आगे के राजनीतिक भविष्य का सवाल भी है.

जब मनसे का गठन हुआ, तो महाराष्ट्र की राजनीति में सालों से कोई नया विकल्प नहीं था. एक खाली जगह थी. इस जगह को बग़ावत करन वालों ने भरा.

इस स्थिति को देखते हुए ही राज ठाकरे ने अपनी पार्टी लॉंच की. परिणास्वरूप पार्टी के गठन के तुरंत बाद उन्हें कुछ सफलता भी मिली.

अब फिर से महाराष्ट्र में एक राजनीतिक शून्य है. पुराने विरोधी वापस चले गए हैं. लेकिन उन्हें एक विकल्प के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा है. उनके सामने विश्वसनीयता का संकट है. राज के पास उस अंतर को भरने का मौका है.

राज ठाकरे मतदाताओं का भरोसा जीतने के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन तीसरे विकल्प का उनका दावा अभी भी ज़िंदा है. अगर वो स्थापित नेताओं के साथ जाते हैं तो उनका वो दावा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा.

अगर वो पार्टी का वजूद बनाए रखना चाहते हैं, तो वर्तमान में, राज ठाकरे के व्यक्तिगत प्रभाव के अलावा मनसे के पास कोई और पूंजी नहीं है.

बहुमत वाली सरकार के साथ करिश्माई नेताओं की भी ज़रूरत होती है. देश और अनेक राज्यों में ऐसी स्थिति दिखाई देती है.

यह तय है कि महाराष्ट्र में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन देवेंद्र फड़नवीस के नाम और चेहरे पर लड़ेगा. इसके ख़िलाफ कोई दूसरा चेहरा नहीं है. हालांकि इस पर कोई सहमति नहीं है.

क्या मनसे करिश्माई राजनीति करेगा या नहीं ये देखना होगा. अगर वो ऐसा करते भी हैं तो उन्हें संगठन खड़ा करना ही होगा. सवाल केवल इतना है कि वो कौन सा पिच चुनते हैं.

राज ठाकरे खुद का करिश्मा दिखाएंगे या पार्टी के वजूद के लिए गठबंधन के साथ जाएंगे.

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