भीमा कोरेगांव: सुधा भारद्वाज अब तक जेल में क्यों?

  • 8 जून 2019
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पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज से मेरी सबसे पहली मुलाक़ात तब हुई जब उत्तरी छत्तीसगढ़ में बड़ी-बड़ी कंपनियां, स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर आदिवादियों की ज़मीन लेने का मसौदा बना रहीं थी और ग़रीब आदिवासी अपनी ज़मीन नहीं देना चाहते थे.

ये बात 10 साल पुरानी है. तत्कालीन सरकारों का दावा था कि विद्युत और स्टील प्लांट के लिए ज़मीनों का अधिग्रहण किया जा रहा था जिनसे राज्य और आम लोगों को फ़ायदा होगा. इनमें छत्तीसगढ़ के रायगढ़ की कोयले की खदानें भी शामिल थीं.

जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे थे. एक तरफ़ सरकारी तंत्र तो दूसरी तरफ़ आदिवासी. इस संघर्ष में प्रशासन ने कई मामले दर्ज किए मगर ग़रीब आदिवासियों के पास उतने पैसे ही नहीं थे कि वो अपना केस अदालत में लड़ सकते.

सुधा भारद्वाज से मुलाक़ात कराने वाले हाईकोर्ट के अधिवक्ता महेंद्र दुबे जब मुझे उनके पास लेकर गए तो वो ऐसे लोगों से घिरी हुईं थीं जिन्होंने ना ढंग से कपड़े पहने थे और ना ही उनके पांवों में चप्पलें थीं.

लोग आरोप लगा रहे थे कि कंपनियों के लोगों ने प्रशासन के साथ मिलकर फ़र्ज़ी तौर पर ग्राम सभा का आयोजन किया और बताया कि आदिवासी इन विकास की परियोजनाओं के लिए ज़मीन देने को तैयार हैं.

आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ के कई इलाक़े भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची में आते हैं और इसलिए किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले ग्राम सभा की अनुमति लेना क़ानूनी बाध्यता है.

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अमरीका में जन्म, आदिवासियों के बीच काम

संघर्ष ज़ोरों पर था मगर इन आदिवासियों के लिए कोई वकील नहीं था. ना इनके पास वकील को चुकाने के लिए पैसे ही थे.

इन सबके मामले लड़ रहीं थीं अमरीका में पैदा होने वाली सुधा भारद्वाज. वो पैदा तो अमरीका में हुईं लेकिन जब सिर्फ 11 साल की थीं तभी भारत आ गईं थीं. उन्होंने आईआईटी से उन्होंने गणित की डिग्री ली. वो चाहतीं तो वापस विदेश जाकर आगे की पढ़ाई करतीं और वहीं बस जातीं. मगर पढ़ाई के दौरान ही वो सुदूर अंचलों में आने-जाने लगीं और 1986 में वो छत्तीसगढ़ जनमुक्ति मोर्चा के मज़दूर नेता शंकर गुहा नियोगी से मिलीं और ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों के संघर्ष में शामिल हो गईं.

सुधा भारद्वाज को 'शहरी नक्सल' बताकर भीमा-कोरेगांव केस के सिलसिले में पिछले साल 6 जून को गिरफ़्तार किया गया है. पर कई आदिवासियों के लिए वह उनकी कानूनी लड़ाई लड़ने वाली रहनुमा हैं.

एक साल हो चला और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ़्तारी का केस विशेष जांच दल को सौंपने से इंकार भी कर दिया है.

जांच पर सवाल

पुणे पुलिस की जांच जांच में काफ़ी वक़्त लग रहा है और इसलिए उस पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं.

लेकिन पुलिस का कहना है कि कुछ देरी चुनाव की वजह से हुई और कुछ बचाव पक्ष की वजह से.

जांच अधिकारी शिवाजी पवार ने हमारे सहयोगी हलीमा कुरेशी से कहा, "अगर आप बाकी मामलों से इसकी तुलना करें तो इस केस में हर हफ़्ते सुनवाई हुई है. बस इस बार जो तारीख़, उसमें तीन हफ़्ते की देरी हुई थी. वो भी इसलिए क्योंकि चुनाव की वजह से ज़्यादातर पुलिसकर्मी बाहर थे. ऐसे में बाकी मामलों के अभियुक्तों को भी हमने अदालत में पेश नहीं किया. अभियोजन की ओर से देरी नहीं हुई है बल्कि बचाव पक्ष ने ही ज़मानत की कार्रवाई लंबी की. हमने ज़मानत की अर्जी पर एक महीने में कार्रवाई पूरी कर ली."

हालांकि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता महेंद्र दुबे सहित वहां बार एसोसिएशन के वकील भी उनकी गिरफ़्तारी से काफी आहत हैं.

वकील कहते हैं कि जिस तत्परता को दिखाते हुए भीमा-कोरेगांव केस में सुधा भारद्वाज सहित पांच लोगों को गिरफ़्तार ये कहकर किया कि वो माओवादियों के शहरी नेटवर्क का हिस्सा हैं, उस मामले के आरोपी शंभाजी भिड़े को अभी तक गिरफ़्तार नहीं किया गया है.

बल्कि भिड़े का नाम ही प्राथमिकी से ही ग़ायब है. इस मामले में एक और अभियुक्त मिलिंद एकबोटे को तो ज़मानत मिल भी गई है.

सुधा भारद्वाज के अलावा इस मामले में पिछले साल जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया था उनमें अधिवक्ता सुरेंद्र गाडलिंग, सुधीर धवले, दलित चिंतक महेश राउत, मुंबई स्थित टाटा इंस्टिट्यूट फॉर सोशल स्टडीज़ (टिस) की शोमा सेन और नागपुर विश्वविद्यालय की रोना विल्सन शामिल हैं.

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40 बार अदालत में पेश नहीं किया

सुधा भारद्वाज और अन्य अभियुक्तों की तरफ़ से लड़ने वाले अधिवक्ता निहाल सिंह राठौड़ का कहना है कि मामले में 60 बार सुनवाई के बावजूद भी किसी की ज़मानत की अर्ज़ी पर विचार नहीं किया गया.

वो ये भी आरोप लगाते हैं कि 40 बार ऐसा हुआ जब अभियुक्तों को पुलिस ने अदालत में पेश ही नहीं किया.

जबकि पुलिस का पक्ष है कि सुरक्षा समय पर मुहैया न कराए जाने के कारण अभियुक्तों को अदालत में पेश नहीं किया जा सका.

सुधा भारद्वाज की बेटी मायाशा ने भी अपनी मां की गिरफ़्तारी को लेकर एक बहुत ही मार्मिक चिट्ठी लिखी थी.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी ने भारत सरकार से भीमा कोरेगांव हिंसा के सिलसिले में जेल में बंद सामाजिक कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा करने की मांग की है.

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