छत्तीसगढ़: देवताओं के घर में अदाणी को ठेके पर आदिवासियों का धरना

  • 9 जून 2019
आदिवासियों का प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट Mangal Kunjam/BBC

माओवादियों के गढ़ कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में बैलाडीला की पहाड़ियों का माहौल पिछले तीन दिनों से गरमाया हुआ है. हज़ारों की संख्या में आदिवासी अपने देवताओं के घर कहे जाने वाले बैलाडीला के एक हिस्से नंदराज पहाड़ को बचाने के लिये सड़कों पर उतरे हुए हैं.

बस्तर के अलग-अलग इलाक़ों से कई दिनों की पैदल यात्रा करके एनएमडीसी यानी नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के किरंदुल स्थित दफ़्तर पहुंचे आदिवासियों ने शुक्रवार को तड़के इस दफ़्तर को घेरा और तब से वे यहीं जमे हुए हैं.

इन आदिवासियों का कहना है कि एनएमडीसी और राज्य सरकार की कंपनी एनसीएल ने उनके नंदराज पहाड़ से लौह अयस्क निकालने के लिये इस पहाड़ के डिपोज़िट नंबर 13 का ठेका अदाणी को दे दिया है.

हालांकि, एनएमडीसी और राज्य सरकार की छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम के संयुक्त उपक्रम एनसीएल के मुख्य कार्यपालन अधिकारी वी.एस. प्रभाकर इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रहे हैं.

प्रभाकर के अनुसार, "डिपोज़िट-13 का स्‍वामित्‍व और खनन पट्टा एनसीएल के पास है. मेसर्स अदाणी इंटरप्राईजेज लिमिटेड को यह खदान केवल खान विकासकर्ता सह प्रचालक यानी एमडीओ के रूप में दी गई है."

अदाणी समूह का पक्ष

वहीं, बैलाडीला परियोजना पर अदाणी समूह ने बीबीसी को दिए अपने बयान में कहा है, "दंतेवाड़ा में दक्षिण बस्तर में स्थित प्राकृतिक संसाधन (बैलाडीला लौह अयस्क भंडार) भारत सरकार के स्वामित्व में है. इसलिए, ये ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि केंद्र और राज्य सरकारों का उपक्रम एनसीएल इन खदानों के मालिक हैं और एईएल केवल एक अनुभवी और जिम्मेदार खनन कॉन्ट्रैक्टर के रूप में सहयोग प्रदान करता है. अदाणी समूह 'ग्रोथ विद गुडनेस' (अच्छाई के साथ विकास) में प्रबल विश्वास रखता है."

"खनन गतिविधियों की शुरुआत के लिए, केंद्रीय पीएसयू एनएमडीसी लिमिटेड और राज्य पीएसयू, छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम लिमिटेड (सीएमडीसी लिमिटेड) ने वर्ष 2008 में एक संयुक्त उपक्रम का गठन किया था. एनएमडीसी ने 2010 से 2014 के बीच ग्राम सभाओं के आयोजन किए, 2015 में पर्यावरण संबंधी मंजूरी और जनवरी 2017 में वन मंजूरी हासिल की. इसके बाद, 2017 में, खनन लीज सरकारी स्वामित्व वाली संयुक्त उपक्रम कंपनी एनएमडीसी-सीएमडीसी लिमिटेड (एनसीएल) को हस्तांतरित कर दी गई."

"जनवरी 2018 में, कम से कम दस कंपनियों ने बैलाडीला लौह अयस्क भंडार क्रमांक 13 के विकास और परिचालन के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी बोली में हिस्सा लेने के लिए दिलचस्पी दिखाई. बोली लगाने वालों की संक्षिप्त सूची बनाने का काम निविदा के नियमों और शर्तों के अनुसार नियत तकनीकी और वित्त संबंधी योग्यता आवश्‍यकताओं के आधार पर किया गया था. पारदर्शी रिवर्स बिडिंग प्रक्रिया के माध्यम से अदाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) को सफल बोलीदाता के रूप में चुना गया था."

"दिसंबर 2018 में, एनसीएल ने लौह अयस्क खनन अनुबंध पत्र प्रदान करके एईएल को खनन कॉन्ट्रैक्टर के रूप में नियुक्त किया. इस तरह, पहले एईएल इस परियोजना के लिए मंजूरी प्राप्त करने में शामिल नहीं था और उसने केवल दिसंबर 2018 के बाद स्पर्धात्मक निविदा द्वारा खनन कान्ट्रैक्टर की भूमिका निभाई."

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जैव विविधता का घर बैलाडीला

लेकिन इस बीच राजनीति भी तेज़ हो गई है. सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने कहा है कि सारा मामला पूर्ववर्ती भारतीय जनता पार्टी की सरकार का है. वहीं, भाजपा ने आरोप लगाया है कि अंतिम रूप से अनुमति देने का काम कांग्रेस पार्टी की सरकार ने किया है.

बस्तर की बैलाडीला की पहाड़ियां लगभग 40 किलोमीटर की लंबाई और 10 किलोमीटर की चौड़ाई में फैली हुई हैं. इन पहाड़ियों में लौह अयस्क के 14 डिपोज़िट हैं, जिनमें श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले 1500 मिलियन टन लौह अयस्क होने का अनुमान है.

इन लौह अयस्कों की ख़ासियत ये है कि इनमें समृद्ध लौह तत्व यानी औसत एफ़ई 65 प्रतिशत है, जिसे दुनिया के बेहतर लौह अयस्क में शुमार किया जाता है.

बैलाडीला की 14 में से चार खदानों में पिछले 50 सालों से भी अधिक समय से लौह अयस्क का उत्खनन किया जा रहा है. जिसका बड़ा हिस्सा जापान को निर्यात किया जाता है.

उत्खनन का पूरा काम भारत सरकार के उपक्रम एनएमडीसी द्वारा किया जाता है. लेकिन समय-समय पर निजी कंपनियां इन लौह खदानों को हथियाने की कोशिश करती रही हैं.

1994-95 में बैलाडीला की 11-बी खदान को लेने के लिये एस्सार स्टील, विक्रम स्टील, सनफ्लेग और मुकुंद आयरन जैसी कई कंपनियों ने कोशिश की थी. इसके अलावा मित्तल ब्रदर्स की निप्पन डेनरो का नाम भी इस खदान से जुड़ा था.

तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के उद्योगपति बेटे पी.वी. प्रभाकर राव की दिलचस्पी भी 11-बी खदान में थी. इसे लेकर पी.वी. नरसिम्हा राव को विपक्षी दलों ने घेरा भी था.

उस समय बैलाडीला और लौह खदानों को लेकर कई बहुचर्चित रिपोर्टिंग करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर कहते हैं, "उस दौर में मज़दूर संगठन बेहद मज़बूत थे. सरकारी उपक्रमों और खदानों के निजीकरण को लेकर सरकारों में एक लिहाज़ बचा हुआ था. इसलिये खदान नंबर 11-बी निजी हाथों में जाने से बच गई. लेकिन अब जबकि अधिकांश राजनीतिक दलों और सरकारों की प्राथमिकताएँ बदल गई हैं, तब सारी की सारी खदानें निजी हाथों में सौंप दी जायें, तो भी आश्चर्य नहीं होगा."

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खदान नंबर-13 का विवाद

राज्य बनने के बाद एनएमडीसी और राज्य सरकार की संस्था छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम यानी सीएमडीसी ने 2008 में मिलकर लौह अयस्क के उत्खनन के लिये एनसीएल नामक कंपनी बनाई.

बैलाडीला की खदानों में से एक डिपोज़िट-13 के लौह उत्खनन का प्रस्ताव 2011 में केंद्र सरकार की फ़ॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी को भेजा गया. इस डिपोज़िट में 350 मिलियन टन लौह अयस्क का भंडार होने का अनुमान है.

लेकिन फ़ॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी ने अपनी बैठक में इस खदान को अनुमति देने से साफ़ इंकार कर दिया.

कमेटी का तर्क था कि जिस पहाड़ में खनन का प्रस्ताव दिया गया है, वह अत्यंत उच्च जैव विविधता का क्षेत्र है. इसके अलावा इसका पूरा वन क्षेत्र अब तक अछूता है.

26 अगस्त 2011 को फ़ॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया.

इसके बाद नये सिरे से 5 जून 2013 को राज्य की भाजपा सरकार द्वारा फिर से इस खदान के उत्खनन का प्रस्ताव फ़ॉरेस्ट एडवाइज़री कमेटी को भेजा गया. लेकिन बात फ़ाइलों में अटकी रही.

इसके बाद केंद्र में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी, उसके बाद 12 नवंबर 2014 को पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एनएमडीसी को पहले फ़ेज़ में 315.813 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन की अनुमति दे दी. इसके अलावा 9 जनवरी 2017 को दूसरे फ़ेज़ की अनुमति भी एनएमडीसी को दे दी गई.

चार साल पहले के उच्च जैव विविधता और अछूते वन के दावे ख़ुद ही सरकार ने ख़ारिज कर दिये.

इसके बाद एनएमडीसी ने एमडीओ यानी माइन डेवलपर कम ऑपरेटर के बतौर इस खदान को अदाणी इंटरप्राइजेज को सौंप दिया.

संयुक्त पंचायत जन संघर्ष समिति के मंगल कुंजाम कहते हैं, "इस खदान के लिये अनुमति लेने की जो प्रक्रिया अपनाई गई, वह पूरी तरह से फ़र्ज़ी है. बस्तर पांचवीं अनुसूची का क्षेत्र है. पांचवीं अनुसूची के क्षेत्र में पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया एक्ट लागू है. इस इलाके में ग्रामसभा को सर्वोच्च अधिकार दिये गये हैं. लेकिन फ़र्ज़ी ग्राम सभा के आधार पर सारी अनुमति दे दी गई. जिस इलाक़े में ये खदान है, उस ग्राम पंचायत हिरोली में ऐसी कोई ग्रामसभा ही नहीं हुई है."

कुंजाम का कहना है कि दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर ज़िलों के हज़ारों आदिवासियों के देवताओं का घर नंदराज पर्वत है और यह इन आदिवासियों की आस्था से जुड़ा हुआ सवाल है.

वह कहते हैं, "हमारा मुद्दा अदाणी या एनएमडीसी से जुड़ा हुआ नहीं है. हम आदिवासी किसी के भी द्वारा इस नंदराज पर्वत की खुदाई के सख़्त ख़िलाफ़ हैं."

आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय सचिव और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम का कहना है कि इस खदान को देने के लिये केंद्र और राज्य सरकार ने सारे नियम क़ानून को ताक पर रख दिया.

कुंजाम कहते हैं, "यह भयावह है कि यहां ग्राम सभा की भूमिका ही ख़त्म कर दी गई है. अदाणी को इस खदान को सौंपने के लिये सरकार ने आदिवासी हितों को किनारे कर दिया."

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प्रशासन की क्या है सफ़ाई

लेकिन एनसीएल के मुख्य कार्यपालक अधिकारी वी.एस. प्रभाकर का दावा है कि सब कुछ नियमानुसार किया गया है.

बीबीसी को भेजे गये अपने बयान में उन्होंने दावा किया कि खनन पट्टा अदाणी अथवा किसी अन्‍य को किसी भी समय स्‍थानांतरित नहीं किया जाएगा. इस परियोजना के अधीन वांछित भूमि का अधिग्रहण ज्वाइंट वेंचर कंपनी के नाम पर ही किया जाएगा तथा डिपोज़िट-13 से उत्‍पादित लौह अयस्‍क की बिक्री का अधिकार एनसीएल के पास होगा.

प्रभाकर का कहना है कि इस डिपोज़िट-13 खदान के लिये चार बोलियां नियत तारीख़ तक प्राप्‍त हुई थी. इनमें से तीन बोलीदाता योग्‍य पाए गए तथा एक प्रस्‍ताव निरस्‍त कर दिया गया क्‍योंकि बोलीदाता वांछित योग्‍यता नहीं रखता था.

वी.एस. प्रभाकर के अनुसार सभी तीन योग्‍य बोलीदाताओं की बोली खोली गई तथा इसके पश्‍चात रिवर्स ई-बोली प्रक्रिया छह घंटे तक चली. तीन बोलीदाताओं में मेसर्स अदाणी इंटरप्राईज़ेज़ ने न्‍यूनतम बोली लगाई थी तथा उन्‍हें न्‍यूनतम बोलीदाता घोषित किया गया.

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Image caption अजीत जोगी ने कहा है कि वह अदाणी को एक फावड़ा भी नहीं चलाने देंगे

राजनीति भी हो रही जमकर

आदिवासियों के आंदोलन के बीच सरकार और विपक्षी दलों की राजनीति भी तेज़ हो गई है.

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का आरोप है कि सरकार में आने के पहले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा था कि हम अदाणी को किसी भी सूरत में खदान नहीं देने देंगे लेकिन सरकार में आने के पाँच महीने बाद उसी अदाणी को उन्होंने पांच-पांच खदाने सौंप दी है.

जोगी कहते हैं, "मैं मरना पसंद करूंगा लेकिन भूपेश सरकार को अदाणी को एक फावड़ा या कुदाल चलाने की अनुमति नहीं देने दूंगा."

हालांकि इस खदान के मुद्दे पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि पिछली सरकार के निर्णयों की समीक्षा की आवश्यकता है.

कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी का दावा है कि एनसीएल की बोर्ड की मीटिंग में 28 जुलाई 2018 को निविदा के दस्तावेज़ों को सहमति दी गई. लेटर ऑफ़ इंटेट एलओआई 20 सितंबर 2018 को जारी किया गया और 6 दिसंबर 2018 को हैदराबाद में एनसीएल, सीएमडी, एनएमडीडी के चेयरमैन द्वारा अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर किये गये जबकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार ने 17 दिसंबर 2018 को शपथग्रहण किया है.

वह कहते हैं, "सारा कुछ भाजपा के शासनकाल में हुआ है, कांग्रेस पार्टी को ज़िम्मेवार ठहराना एक असफल कोशिश है."

लेकिन विपक्षी दलों का कहना है कि अगर कोई निर्णय ग़लत हुआ है तो भूपेश बघेल की सरकार को इसे ठीक करने का अधिकार है. राज्य सरकार चाहे तो वन भूमि डायवर्सन अधिनियम 1980 की धारा-2 के तहत जारी अंतिम आदेश को वापस ले सकती है.

इसी तरह जल एवं वायु प्रदूषण अधिनयम के तहत जारी सहमति पत्र को सरकार वापस ले सकती है. इसके अलावा सरकार माइनिंग लीज़ को रद्द कर सकती है.

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष रमन सिंह इसे कांग्रेस सरकार का नाटक मान कर चल रहे हैं.

रमन सिंह कहते हैं, "अगर इस खदान से आपत्ति थी, इतना विरोध था तो इस साल अप्रैल में इस खदान को कंसेंट टू ऑपरेट रोक देते. भूपेश बघेल की सरकार के पर्यावरण विभाग के मंत्री ने इस साल अप्रैल में सहमति दी है. अब नाटक करने का कोई मतलब नहीं है."

फ़िलहाल राजनीतिक दलों की बयानबाज़ियों के बीच आदिवासी अपना राशन-पानी लेकर जुटे हुये हैं. सड़कों पर ही खाना पक रहा है और सड़क ही अब इनका बिस्तर भी है. तेज़ गर्मी और बारिश के बावजूद उनके हौसले मज़बूत बने हुये हैं.

आदिवासी नेता सोनी सोरी कहती हैं, "इस बार बस्तर के आदिवासी महज़ ज्ञापन लेने-देने तक सीमित नहीं रहेंगे. इस बार फ़ैसले के बाद ही हम यहां से हटेंगे."

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