30 साल सेना में रहने के बाद सनाउल्लाह को कैसे बना दिया गया विदेशी

  • 11 जून 2019
मोहम्मद सनाउल्लाह इमेज कॉपीरइट BBC/Dilip Kumar Sharma

"29 मई की वो रात मेरे जीवन की सबसे काली रात थी. पुलिस मुझे देर शाम क़रीब 8 बजे ग्वालपाड़ा डिटेंशन सेंटर लेकर पहुंची थी. जेल के अंदर क़दम रखते ही मेरा बदन कांपने लगा था. मैं फ़ौजी हूं लेकिन मेरे सामने जो हालात थे उससे मैं टूट चुका था."

"मेरी आंखों के सामने फ़ौज में गर्व से काटे वो दिन बार-बार याद आ रहे थे. मैं सोच नहीं पा रहा था मैंने क्या ग़लती कर दी और मुझे जेल में डाल दिया गया. मेरा ब्‍लड प्रेशर हाई हो गया था. मैं उस रात बहुत रोया."

भारतीय सेना में 30 साल सेवा देने वाले रिटायर्ड सूबेदार मोहम्मद सनाउल्लाह डिटेंशन सेंटर में गुज़ारे अपने अनुभव को साझा करते हुए मायूस हो जाते हैं.

दरअसल, कामरूप ग्रामीण ज़िले की एक फॉरनर्स ट्राइब्यूनल (एफ़टी) अदालत ने बीते 23 मई को रिटायर्ड फ़ौजी सनाउल्लाह को विदेशी नागरिक घोषित कर दिया था.

इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर 29 मई को ग्वालापाड़ा जेल के अंदर बने डिटेंशन सेंटर में भेज दिया गया. कुल 11 दिन जेल में काटने के बाद गुवाहाटी हाई कोर्ट से मिली अंतरिम ज़मानत पर आठ जून को सनाउल्लाह बाहर निकले हैं.

52 साल के मोहम्मद सनाउल्लाह ने बीबीसी से कहा, "ग्वालपाड़ा जेल में मुझे रूम नंबर तीन में रखा गया. जेल में विदेशी नागरिकों के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं है. मेरे सेल में दूसरे क़ैदी भी थे. ऐसी स्थिति का सामना जीवन में कभी नहीं हुआ था. मैने 30 साल तक देश की सेवा की और मुझे ऐसे दिन देखने पड़ रहे थे. जेल के भीतर एक अलग दुनिया थी. मैं चाह कर भी ख़ुद को उस स्थिति से निकाल नहीं पा रहा था."

"दो दिन तक मैंने जेल में किसी से कोई बात नहीं की. केवल अपने बारे में, परिवार के बारे में सोचता रहा. इन दो-तीन दिनों में मेरा शरीर काफ़ी कमज़ोर हो गया था. मेडिकल चेकअप भी करवाया. मैंने फ़ौज के दिनों को याद किया और उससे मुझे ताक़त मिली. सेना में हमें हर मुसीबत का सामना करना सिखाया जाता है. मैंने सीमा पर बहादुरी से खड़े होकर अपने देश का बचाव किया है. इसलिए हार नहीं मानूंगा. मैं भारतीय हूं और अपने देश में ही रहूंगा. मुझे यक़ीन है कि इस क़ानूनी लड़ाई में मेरे साथ न्याय होगा."

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'मेरे जैसे कई थे वहां'

ग्वालपाड़ा डिटेंशन सेंटर में क़ैद विदेशी नागरिकों का ज़िक्र करते हुए सनाउल्लाह कहते है, "40 फुट के कमरे में क़रीब 45 कैदियों के साथ मुझे रखा गया था. शाम छह बजे ही हम सबको रूम में बंद कर दिया जाता था. ज़मीन में एक पतला-सा कंबल बिछाकर सोना पड़ता था, वो शरीर में काफ़ी चुभता था. दिन में मैं कुछ ऐसे क़ैदियों से मिलता था जो विदेशी नागरिक घोषित करने के बाद जेल में बंद हैं."

वे बताते हैं, "उनकी तकलीफ़ सुनकर मैं अपना ग़म भूल गया. ऐसे लोग हैं जो 10 सालों से जेल में बंद हैं. अब उनसे कोई मिलने नहीं आता. घर-परिवार, बच्चे सब बर्बाद हो गए हैं. कुछ क़ैदियों को तो यह भी मालूम नहीं है कि आगे उनकी ज़िंदगी में क्या होगा. मुझसे सुझाव मांग रहे थे कि कैसे जेल से रिहा होंगे. अधिकतर क़ैदी न तो पढ़े लिखे हैं और न ही उनके पास कोर्ट में केस लड़ने के पैसे हैं."

हालांकि पिछले महीने, सुप्रीम कोर्ट ने असम में 'अवैध विदेशी' नागरिक के तौर पर डिटेंशन सेंटर में बंद लोगों को सशर्त रिहाई देने की अनुमति दी है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे बंदियों को जो तीन साल से अधिक समय तक डिटेंशन सेंटर में रह चुके हैं, उन्हें एक लाख रुपए के दो ज़मानती बॉन्ड प्रस्तुत करने के बाद रिहा किया जा सकता है.

ऐसे क़ैदियों को रिहाई के बाद अपने पूरे पते का विवरण जमा करना होगा और सुरक्षित डेटाबेस के लिए बायोमेट्रिक विवरण भी देना होगा. इसके साथ ही उन्हें हर हफ़्ते एक बार पुलिस स्टेशन को भी रिपोर्ट करना होगा.

जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, असम, मणिपुर, पंजाब, आंध्र प्रदेश और दिल्ली जैसी जगहों पर अपनी सेवाएं देने वाले सनाउल्लाह अगस्त 2017 में सेना की इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर कोर से रिटायर्ड हुए थे.

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सनाउल्लाह अपनी भारतीय नागरिकता पर कहते है, "मैं 21 मई 1987 को फौज में भर्ती हुआ था. सेना में भर्ती के वक़्त सभी काग़ज़ातों की गहरी छानबीन की जाती है. मेरे पास पिता जी के नाम पर 1931 का खैराजी भूमि पट्टा था. पहले खैराजी पट्टा अस्थायी हुआ करता था लेकिन बाद में 1957 में ज़मीन का स्थायी पट्टा दिया गया. इसके अलावा 1966 की मतदाता सूची में मेरे पिता का नाम है. मेरे पास मैट्रिकुलेशन प्रमाण पत्र है. मैं विदेशी कैसे हो सकता हूं?"

अगर आपके पास नागरिकता से जुड़े सारे काग़जात हैं तो ट्राइब्यूनल को दिखाए क्यों नहीं?

इस सवाल का जवाब देते हुए सनाउल्लाह कहते हैं, "मुझे तो मालूम ही नहीं था कि मेरे ख़िलाफ़ 2008-09 में विदेशी होने का मामला दर्ज किया गया. मैं पिछले साल पहली बार ट्राइब्यूनल के समक्ष पेश हुआ था. अब इस पूरी जांच प्रक्रिया में किससे ग़लती हुई है उस बारे में अभी बात नहीं कर सकता. फ़िलहाल मेरा मामला हाई कोर्ट में है. मुझे कोर्ट पर पूरा भरोसा है और मैं जानता हूं मुझे अदालत से न्याय मिलेगा."

इस समय सनाउल्लाह के घर पड़ोसी से लेकर मीडिया के लोगों का आना-जाना लगा हुआ है. उनसे मिलने वाले लोग भी हैरानी जता रहें है कि 30 साल सेना में काम करने वाला व्यक्ति 'विदेशी नागरिक' कैसे बन गया.

मोहम्मद सनाउल्लाह सेना से रिटायर्ड होने के बाद 2017 में असम पुलिस की बॉर्डर ब्रांच में बतौर सब-इंस्पेक्टर नियुक्त हुए थे जिनका काम अवैध विदेशी नागरिकों की जांच करना था.

मोहम्मद सनाउल्लाह का परिवार उनकी रिहाई से थोड़ी राहत में ज़रूर है लेकिन वो आगे की क़ानूनी लड़ाई को लेकर परेशान भी है.

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जो हुआ कभी दिमाग़ में भी नहीं आया

उनकी पत्नी सनीमा बेग़म 28 मई के दिन को याद करते हुए कहती है, "मेरे पति फ़ौज में रह चुके हैं और अब बॉर्डर पुलिस में काम कर रहे थे. इसलिए उन्हें कोई पकड़ कर ले जाएगा, ऐसी बात दिमाग़ में कभी आई ही नहीं थी. जब इन्हें थाने में बुलाया गया तब तक मेरे मन में किसी तरह की टेंशन नहीं थी. लेकिन जब ये पूरी रात घर नहीं आए तो मुझे काफ़ी चिंता हुई. दूसरे दिन मुझे रिश्तेदारों ने बताया कि पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है. यह सुनकर मेरा शरीर कांपने लगा था. मैं उनसे मिलने पहुंची लेकिन पुलिस ने ज़्यादा बात करने नहीं दिया और उन्हें ग्वालापाड़ा ले गई."

वो बताती हैं, "हमारे साथ बहुत बुरा हुआ है. आप सोचिए रमज़ान का महीना चल रहा था. मैं रोज़ा रखे हुए थी. बच्चे रो रहे थे. घर का पूरा माहौल टेंशन में आ गया था. देश की सेवा करने वाले व्यक्ति को कारागार में डाल दिया गया. अभी केवल ज़मानत मिली है. आगे क़ानूनी लड़ाई लड़नी होगी. पैसा भी चाहिए होगा. लेकिन अदालत पर भरोसा है वो मेरे पति को सही सलामत छोड़ देंगे."

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असम में सनाउल्लाह का यह इकलौता मामला नहीं है. इसके अलावा पूरे राज्य में ऐसे कई सैनिक और पूर्व सैनिकों के मामले सामने आए हैं जिन्हें अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने को कहा गया है.

इससे पहले साल 2017 में सनाउल्लाह के एक ममेरे भाई मोहम्मद अजमल हक़ को भी फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल की तरफ से 'संदिग्ध नागरिक' होने का नोटिस भेजा गया था. मोहम्मद अजमल हक़ भी 30 साल सेना में काम करने के बाद 2016 में जूनियर कमीशन अफ़सर (जेसीओ) के पद से रिटायर हुए थे.

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मोहम्मद सनाउल्लाह को डिटेंशन सेंटर में भेजने को लेकर उनकी बड़ी बेटी शहनाज़ अख़्तर प्रशासन के कामकाज़ पर सवाल उठाते हुए कहती है, "मैंने अपने पिता को फौज़ की वर्दी में देश के लिए काम करते हुए देखा है. उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था. इंडियन आर्मी में काम करने वाले व्यक्ति को विदेशी घोषित कर देना का मतलब कलेजा फट जाने जैसी बात थी. मुझे अपनी पिता पर गर्व है."

वो कहती हैं, "सेना में नौकरी के दौरान मैं अपने पिता के साथ कई जगह रही. लोग पूछते है कि नॉर्थ ईस्ट में ऐसा क्यों हो रहा है. आर्मी में काम करने वाले व्यक्ति को ही जेल में डाल दिया जा रहा है तो आम आदमी का कितना बुरा हाल होता होगा."

"ये सारी परेशानी प्रशासनिक व्यवस्था में मौजूद कमियों के कारण हुई है. मेरे पिता के मामले के जांच अधिकारी रहे चंद्रमल दास के कारण ही आज हमें यह दिन देखना पड़ा है."

सनाउल्लाह मामले के जांच अधिकारी चंद्रमल दास के ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला दर्ज किया है. जिन कथित गवाहों के आधार पर वो रिपोर्ट तैयार की गई, उनका कहना है कि उन्होंने कभी गवाही दी ही नहीं.

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Image caption मोहम्मद सनाउल्लाह की बेटी शहनाज़ अख़्तर

900 लोग विदेशी घोषित

चंद्रमल दास पिछले साल बॉर्डर पुलिस से रिटायर हो चुके हैं लेकिन 23 मई के फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल अदालत के फ़ैसले के बाद समाचार चैनल एनडीटीवी से बातचीत में उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति की उन्होंने जांच की वो सनाउल्लाह थे न कि मोहम्मद सनाउल्लाह, इसलिए ये प्रशासनिक भूलचूक का मामला है.

सनाउल्लाह के मामले में कथित गवाही देने वाले कुरान अली, सोबाहान अली और अमज़द अली, ये सभी असम के कामरूप ज़िले में कलाहीकाश गांव के रहने वाले हैं. लेकिन अब इन तीनों का कहना है कि उन्होंने जांच अधिकारी चंद्रमल दास से कभी बात ही नहीं की.

असम में विदेशी नागरिकों के मामलों की सुनवाई के लिए इस समय सौ ट्रिब्यूनल चल रहे हैं. इस व्यवस्था के तहत एफटी में नियुक्त सदस्य विदेशी अधिनियम, 1946 के अंतर्गत यह देखते हैं कि जिस व्यक्ति पर मामला है वो एक विदेशी है या नहीं. हालांकि इस एफटी के कामकाज़ को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं.

अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए गठित इन विदेशी ट्राइब्यूनल ने अब तक करीब 900 लोगों को 'विदेशी' घोषित किया है जिसके बाद इन लोगों को राज्य के छह अलग-अलग डिटेंशन सेंटर में रखा गया हैं. इनमें से लगभग सभी लोग बंगाली भाषी मुसलमान या हिंदू हैं.

मोहम्मद सनाउल्लाह का मामला बेहद संवेदनशील और गंभीर है. पिछले कुछ दिनों में फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल से लेकर पुलिस के स्तर पर जो कार्रवाई हुई है उससे कई सवाल खड़े हो गए है.

दरअसल, बॉर्डर पुलिस ने सनाउल्लाह को हमेशा के लिए नौकरी से बर्खास्त कर दिया है और उनसे वर्दी वापस ले ली है. ऐसे में अब इस मामले में सबकी नजर गुवाहाटी हाई कोर्ट पर टिकी है. देखना होगा आने वाले समय में देश की फौज में काम करने वाला यह व्यक्ति खुद को भारतीय नागरिक साबित कर पाता है या नहीं.

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