क्या भारत अपनी आर्थिक वृद्धि को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है?

  • 14 जून 2019
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भारत के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने कहा है कि काफ़ी मुमकिन है कि भारत अपनी आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा हो.

एक भारतीय अख़बार के लिए लिखे लेख में सुब्रमण्यम ने कहा है कि रिसर्च बताती है कि भारत ने आर्थिक वद्धि मापने का तरीक़ा बदल दिया है इसलिए इसकी जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) असलियत से लगभग 2.5 फ़ीसदी ज़्यादा दर्ज की गई.

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हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकारों के समूह ने सुब्रमण्यम के इस निष्कर्ष को ख़ारिज कर दिया है और कहा है कि वो उनके दावों का 'पॉइंट टु पॉइंट' जवाब देगा.

लेकिन इसके बावजूद सुब्रमण्यम की बातों ने भारत की आर्थिक वृद्धि के दावों की विश्वसनीयता पर एक बार फिर सवाल तो ज़रूर खड़े कर दिए हैं.

साल 2018 तक भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्था माना जाता था लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना था कि भारत में आर्थिक विकास मापने का तरीक़ा सही नहीं है और इससे अर्थव्यवस्था की सही स्थिति का पता नहीं चलता.

कैसे छिड़ा विवाद?

साल 2015 में भारत ने जीडीपी की गणना का तरीक़ा बदल दिया था. इनमें एक बड़ा बदलाव ये किया गया कि जीडीपी बाज़ार मूल्य के बजाय आधारभूत मूल्य के ज़रिए मापी जाने लगी. सीधे शब्दों में कहें तो पहले जीडीपी थोक मूल्य के आधार पर तय होती थी लेकिन अब कंज़्यूमर प्राइस इंडेक्स यानी ग्राहकों द्वारा भुगतान किए गए बाज़ार मूल्य से तय होती है.

इसके अलावा तिमाही और सालाना वृद्धि के आंकड़ों की गणना के लिए 'बेस इयर' (आधार वर्ष) भी 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया गया. इसके बाद से ही जीडीपी की गणना का ये तरीक़ा कई अर्थशास्त्रियों की पैनी नज़रों में आ गया.

अरविंद सुब्रमण्यम ने एक बार फिर जीडीपी गणना के इस तरीक़े पर बहस छेड़ दी है. उन्होंने कहा है कि वित्त वर्ष 2011-12 और 2016-17 में आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है. आधिकारिक अनुमान के अनुसार इस अवधि में आर्थिक विकास दर 7 फ़ीसदी रही है जबकि सुब्रमण्यम मानते हैं कि इस दौरान वृद्धि दर 4.5 फ़ीसदी के लगभग रही है.

सुब्रमण्यम के ये दावे उनके ख़ुद के शोध पर आधारित हैं जो हार्वर्ड विश्वविद्यालय के 'सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट' में प्रकाशित किया जा चुका है.

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Image caption नीति आयोग की बैठक की तस्वीर

साल 2015 से यानी जीडीपी गणना के नए तरीक़े लागू होने के बाद से एक-एक करके कई विशेषज्ञों ने मोदी सरकार में आर्थिक वृद्धि दर के आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं.

मोदी सरकार में उच्च और तेज़ आर्थिक विकास दर के बावजूद साल 2017-18 के बीच भारत में बेरोज़गारी दर पिछले 45 सालों में सबसे ज़्यादा रही.

भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी बेरोज़गारी की ऊंची दर को देखते हुए आर्थिक वृद्धि के सकारात्मक आंकड़ों पर संदेह ज़ाहिर किया है.

Image caption देश में बेरोज़गारी 45 सालों में सबसे ज़्यादा बढ़ी है

भारत सरकार क्या कहती है?

भारत सरकार ने जीडीपी गणना के नए तरीक़े का बचाव किया है. भारतीय सांख्यिकी मंत्रालय ने अपने एक बयान में कहा है, "भारत अपनी अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों के योगदान को निष्पक्ष रूप से शामिल करता है. भारत की जीडीपी की गणना मान्य और स्वीकृत तरीक़ों से होती है."

ये पहली बार नहीं जब भारत सरकार द्वारा पेश किए आंकड़ों पर सवाल उठाया गया है. सांख्यिकी मंत्रालय ने अपने एक अध्ययन में पाया कि जून 2016 में पूरे होते वित्त वर्ष में जिन कंपनियों के डेटाबेस का इस्तेमाल जीडीपी की गणना के लिए किया गया था उसमें से 36% कंपनियों को ट्रेस ही नहीं किया जा सका.

सरकार ने ख़ुद भी स्वीकार किया है कि इसके आंकड़े इकट्ठे करने के तरीक़ों में कमियां हैं.

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इससे भारत पर क्या असर पड़ेगा?

अरविंद सुब्रमण्यम ने भारत के जीडीपी की गणना के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक समिति बनाए जाने की ज़रूरत बताई है जिसमें भारतीय और विदेशी अर्थशास्त्री शामिल हों.

ये मोदी सरकार को बड़ा झटका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी बार चुनाव जीतकर सत्ता में आए हैं लेकिन उन पर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का दबाव है.

भारत सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़ भारत अब सबसे तेज़ी से विकसित अर्थव्यवस्था नहीं रहा है. भारत की ये जगह अब चीन ने ले ली है क्योंकि भारत की हालिया आर्थिक वृद्धि दर पिछले पांच वर्षों में सबसे कम रही है.

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आख़िर क्यों लगातार तीन बार ब्याज दरें घटाई गईं?

इन सबसे न सिर्फ़ भारत की छवि को धक्का लग सकता है बल्कि इससे ये भी पता चलता है कि पिछले कुछ सालों में लागू की गई आर्थिक नीतियों ने कैसे देश की अर्थव्यवस्था की ग़लत तस्वीर सामने रखकर आर्थिक विकास को नुक़सान पहुंचाया है.

मिसाल के तौर पर, भारत ने महंगाई को क़ाबू में करने के लिए ब्याज दरें ऊंची रखीं लेकिन इससे कारोबार बढ़ाने में ही दिक़्क़तें पैदा होने लगीं. इससे कारोबारियों को ऊंचे दरों पर ख़रीद के लिए मजबूर होना पड़ा. और इन सब के बीच हालात और ख़राब किया बैंकों को वापस न मिलनी वाले भारी भरकम क़र्ज़ की धनराशियों ने.

नतीजा ये हुआ कि लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक को इस साल लगातार तीसरी बार ब्याज दरें घटानी पड़ीं.

नौकरियों की कमी और कृषि संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं.

तेज़ी से कार्रवाई की ज़रूरत

जानकारों का कहना है कि भारत के सामने अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के अलावा, आंकड़ों को जुटाने और सांख्यिकी व्यवस्था में सुधार की ज़रूरत है ताकि नीतियों का सही विश्लेषण हो सके. भारत सरकार ने भी कहा है कि वो आंकड़े जुटाने के आधुनिक तरीक़ों को लागू करने के लिए विश्व बैंक के साथ मिलकर काम कर रही है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रोज़गार पैदा करने और निवेश आकर्षित करने के लिए योजनाओं पर काम करने लिए विभिन्न समितियां बनाई हैं. अरविंद सुब्रमण्यम का मानना है कि देश की कमज़ोर पड़ती अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार को तेज़ी से कार्रवाई करने की ज़रूरत है.

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