जेपी नड्डा बीजेपी के वर्किंग प्रेसीडेंट पद तक कैसे पहुंचे

  • 18 जून 2019
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2017 में जब हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों के बीच भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने प्रेम कुमार धूमल का नाम मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए आगे किया तो बीजेपी में सुगबुगाहट शुरू हो गई.

कई लोगों के लिए तो ये हैरानी भरा फैसला था. पार्टी के युवा नेतृत्व में तो ये ज्यादा नज़र आ रहा था, जिसमें मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी शामिल थे.

वजह ये थी कि तत्कालीन स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री जे पी नड्डा के नाम पर लोग अटकलें लगा रहे थे. वहीं नड्डा भी मुख्यमंत्री पद की आस लगाए हुए थे.

हालांकि धूमल के लिए मौका हाथ से निकल गया क्योंकि वो विधानसभा चुनाव हार गए लेकिन नड्डा के लिए अब भी दिल्ली दूर थी.

नड्डा कैंप के ही जयराम ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाया गया जो पांच बार विधानसभा चुनाव जीतते आ रहे थे. नड्डा ने भी अपनी मंशा के बारे में पार्टी हाईकमान को पता नहीं लगने दिया.

ये वो वक़्त भी था जब प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह ने नड्डा को मुख्यमंत्री बनाने के बजाय उनके संगठनात्मक कौशल को लोकसभा चुनावों के लिए उत्तर प्रदेश में इस्तेमाल करने का सोचा.

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संगठनात्मक कौशल

और 2019 के नतीजों में उत्तर प्रदेश से बीजेपी को 62 सीटें मिली और एक बार फिर नरेंद्र मोदी को भारी बहुमत मिला.

लेकिन नड्डा का नाम मोदी की नई कैबिनेट लिस्ट में नहीं आया और उनके बजाय हिमाचल प्रदेश से चार बार के सांसद अनुराग ठाकुर को वित्त राज्यमंत्री बनाया गया.

जो लोग इस बात पर हैरान थे कि उत्तर प्रदेश के बढ़िया नतीजों के बाद भी नड्डा को कैबिनेट से बाहर क्यों रखा गया, उन्हें सोमवार को जवाब मिल गया. अब उन्हें ऐसा पद मिला है जिससे मान लेना चाहिए कि बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व में वो शक्तिशाली नेता हैं.

जल्द ही महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं और नड्डा का काम संगठन में पार्टी के लिए और समर्थक जुटाना है और उसके लिए भी जिसे अमित शाह 'कांग्रेस मुक्त भारत' कहते हैं.

नड्डा के संगठनात्मक कौशल से विपक्ष को चिंतित होना चाहिए. ख़ासकर पश्चिम बंगाल और केरल में. कश्मीर पर उनकी समझ भी उनकी रणनीति में मदद करेगी.

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पब्लिसिटी से दूर

सोमवार को छोटे से राज्य हिमाचल प्रदेश के 58 साल के नेता जेपी नड्डा बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर चुने गये.

बीजेपी ने कुछ दिन पहले ही तय किया था कि कैबिनेट में नंबर दो मंत्री अमित शाह महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के चुनावों तक पार्टी अध्यक्ष रहेंगे.

लेकिन पार्टी की संसदीय बोर्ड की मीटिंग में नड्डा का नाम अध्यक्ष पद के लिए चुना गया. ये बात उन नेताओं के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण है जो चुपचाप पब्लिसिटी से दूर अपना काम करते रहते हैं.

बीजेपी में उन्हें बड़ा रणनीतिकार माना जाता है और वे अमित शाह के भी ख़ास हैं. वे खुद मानते हैं, "मैंने अपने करियर में किसी पोस्ट के लिए हाथ-पैर नहीं मारे. जो भी काम मेरे वरिष्ठ नेताओं ने मुझे दिया, मैंने पूरी लगन के साथ किया. मैं अपने प्रचार में भी विश्वास नहीं करता."

हिमाचल प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष सतपाल सत्ती नड्डा की विनम्रता को उनकी सबसे बड़ी खूबी बताते हैं. वे कहते हैं, "मुश्किल से मुश्किल घड़ी में भी मैंने उनको परेशान नहीं देखा. अपने काम को पूरा करते हैं और डेडलाइन से पहले काम करने के लिए जाने जाते हैं. उनका व्यक्तित्व भी काफ़ी आकर्षक है और उनका भाषण भी."

नड्डा ने पार्टी में अपनी पूरी भूमिका निभाई है, फिर चाहे उनका रोल 1983-84 में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में एबीवीपी कार्यकर्ता का हो, चाहे 2014-15 में कैबिनेट मंत्री का हो या बीजेपी के संसदीय बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी का.

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जेपी आंदोलन से एबीवीपी तक

वे चुपचाप काम करते हैं और किसी तरह के विवाद में नहीं फंसते चाहे अपनी पार्टी के अंदर की बात हो या विपक्ष की.

उनका जन्म 2 दिसंबर 1960 में हुआ और शुरुआती पढ़ाई पटना के सेंट ज़ेवियर्स स्कूल, पटना कॉलेज में हुई और उसके बाद अंग्रेज़ी में मास्टर डिग्री के लिए वे हिमाचल यूनिवर्सिटी आ गए.

ये वो वक़्त था जब एबीवीपी शिमला की हिमाचल यूनिवर्सिटी में पैर जमाने की कोशिश कर रही थी लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पा रही थी. पार्टी ने नड्डा को पटना से शिमला भेजने का सोचा. नड्डा की मेहनत का ही कमाल था कि कैंपस में पहली बार एबीवीपी की सीट से वे अध्यक्ष चुने गए.

सतपाल सत्ती कहते हैं, "उनके व्यक्तित्व में जादू है और वे चुपचाप अपना काम करते रहते हैं."

नड्डा बिहार में जेपी आंदोलन से निकले नेता हैं और पटना में ही उन्होंने अपना राजनीतिक करियर 1977-79 में शुरू किया था. बाद में 1980-81 में वे शिमला आ गए.

उनके कौशल से प्रभावित होकर एबीवीपी ने 1986 में उन्हें दिल्ली में काम दिया और उन्हें एबीवीपी की दिल्ली यूनिट का नेशनल सेक्रेटरी और ऑर्गेनाइज़िंग सेक्रेटरी बनाया गया.

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गडकरी ने बनाया था महासचिव

बाद में उन्हें बीजेपी के यूथ विंग - भारतीय जनता युवा मोर्चा में भेजा गया जहां 1991 में उन्होंने इसकी कमान संभाली. ये वो वक्त था जब बीजेवाईएम कई राज्यों में फैला. उस वक्त वे सिर्फ 31 साल के थे.

आखिरकार पार्टी ने उन्हें दोबारा हिमाचल प्रदेश भेजा. हालांकि बीजेपी 1993 के विधानसभा चुनावों में सरकार नहीं बना पाई लेकिन नड्डा विधायक चुने गए. उसी कार्यकाल में उन्हें विपक्ष का नेता भी बनाया गया जबकि कई वरिष्ठ नेता इस पद पर नज़र लगाए हुए थे.

1998 में नड्डा फिर से विधायक चुने गए. उस वक्त नरेंद्र मोदी वहां पार्टी के प्रभारी थे और बीजेपी ने पूर्व टेलीकॉम मंत्री सुख राम की पार्टी की मदद से सरकार बना ली थी.

उन्हें तब राज्य सरकार में स्वास्थ्य मंत्री और संसदीय मामलों का मंत्री बनाया गया. 2003 का चुनाव तो वे हार गए लेकिन 2007 में फिर से जीते. तब पर्यावरण और विज्ञान एवं तकनीक मंत्री बनाए गए.

जब नितिन गडकरी 2010 में बीजेपी अध्यक्ष बने तो उन्होंने नड्डा को महासचिव बनाया. नड्डा ने हिमाचल कैबिनेट छोड़ा और दिल्ली आ गए.

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हिमाचल प्रदेश में अब तक कोई राजपूत ही मुख्यमंत्री बनता आया है लेकिन उसी राज्य से एक ब्राह्मण नेता को बीजेपी की टॉप पोजीशन दी गई है.

नड्डा बिलासपुर ज़िले के रहने वाले हैं जहां 2017 विधानसभा चुनावों से पहले उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी के हाथों एम्स का शिलान्यास करवाया था.

पटना में अपने छात्र राजनीति के दिनों में इंदिरा गांधी की सत्ता के खिलाफ वे जेपी आंदोलन में शामिल हुए.

उनकी पत्नी मल्लिका नड्डा मध्य प्रदेश के नेता जयश्री बैनर्जी की बेटी हैं और उनके दो बेटे हैं. मल्लिका हिमाचल यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफेसर रही हैं और अभी हाल ही में उन्होंने नौकरी छोड़ी है. वे सामाजिक कामों से जुड़ी हैं.

उनके कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद अब अटकलों को भी विराम लग गया है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की कुर्सी उन्हें मिलने वाली है.

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