बिहार में लू कैसे बन गई है जानलेवा

  • 19 जून 2019
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बिहार में पिछले कुछ दिनों से हो रही भीषण गर्मी और लू की चपेट में आकर कितने लोग मरे हैं, यह सही-सही कह पाना मुश्किल है.

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तीन दिनों में ही आंकड़ा दो सौ को पार कर चुका था. लेकिन बिहार के स्वास्थ्य विभाग ने आधिकारिक रूप से पुष्टि की है कि लू लगने से अभी तक 108 लोगों की मौत हो चुकी है.

लू लगने के कारण सबसे अधिक मौतों की ख़बर गया ज़िले से है. गया के डीएम अभिषेक सिंह ने बीबीसी को बताया कि "इस बार की गर्मी और लू के कहर ने प्राकृतिक आपदा का रूप ले लिया है. हमारे रिकॉर्ड के अनुसार अभी तक ज़िले के 33 लोगों की मौत हीटवेव से हुई है.

निकटवर्ती ज़िलों के मरीज़ भी मगध मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए आए हैं, जहां इसके लिए खास इंतज़ाम किए गया है. बाहर से आए 14 मरीजों की मौत भी हीटवेव से ही हुई है."

गया ही वो पहला ज़िला है जिसके डीएम ने पहली बार धारा 144 में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए लू और भीषण गर्मी के कारण दिन के 11 बजे से दोपहर बाद चार बजे तक बिना किसी जरूरी काम के घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगा दिया है. फिलहाल बिहार के छह ज़िलों के ज़िलाधिकारियों ने अपने यहां भी इस तरह का आदेश जारी कर दिया है.

हालात ऐसे बन गए हैं कि लू से बचाव की सलाह सुनाने और लोगों को घर से बाहर न निकलने की अपील करने के लिए नगर निगम और जिला प्रशासन की गाड़ियां गांव-गांव, मुहल्ले और गलियों में लाउडस्पीकर लेकर घूम रही हैं.

लू में काम का इंतज़ार करते मज़दूर

डेल्हा में ही एक जगह सड़क के एक ओर झुंड के झुंड लोग बैठे हुए दिखे. पूछने पर पता चला कि दिहाड़ी मजदूर हैं, काम के इंतजार में बैठे हुए हैं. इस गर्मी की मार मज़दूरों पर साफ़ दिखाई पड़ती है.

ताज्जुब हुआ कि जिस शहर में दिन के 11 बजे गर्मी और लू के कारण बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगाया गया है, वहां लोग खुले आसमान के नीचे सड़क के किनारे बैठ कर काम का इंतजार कर रहे थे.

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Image caption डेल्हा में काम के इंतजार में बैठे मजदूर.

यह चौक लेबर चौक के नाम से भी जाना जाता है. बैठे लोगों से बात करने पर पता चला कि रोज़ाना वहां दो से ढाई सौ लोग काम मांगने आते हैं. पिछले कुछ दिनों से गर्मी के कारण लोग कम आ रहे हैं. लेकिन जो वहां थे उनकी दिक्कत ये थी कि काम भी नहीं मिल रहा है. वरना आमतौर पर वो लोग तो 10 बजे तक ही इंतजार करते हैं.

कीरीत नवादा से बस से आए लालू यादव झुंड के बाहर एक कोने में बैठे थे. पूछने पर बताया कि उन्हें तीन दिनों से कोई काम नहीं मिला है. उसके पहले दो दिन नहीं आए थे. आज भी अभी तक काम नहीं मिला था.

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कहते हैं, "पैसा नहीं रहेगा तो हम खाएंगे क्या? तीन बच्चे हैं. उनकी पढ़ाई-लिखाई है. घर का ख़र्च है. खेती बाड़ी से नुकसान ही हो रहा है."

लालू की तरह गोह से बस पकड़ कर आए विरेंद्र यादव और विनय साव, टिकारी से आए कृष्ण देव यादव और वहां मौजूद उनके जैसे तमाम लोग कुछ भी पूछने पर सिर्फ यही कहते हैं कि घर में बैठ जाएंगे तो खाएंगे क्या!

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Image caption काम के इंतजार में बैठे लालू यादव

तभी झुंड में एक नया सदस्य शामिल हो जाता है. बाकी लोग उससे पूछने लगते हैं कि वो क्यों आ गया जबकि उसे काम मिला था?

गोह के रहने वाले अरविंद ने सबको बताया कि मालिक उसे फर्श प्लास्टर कराने का काम कहकर ले गया था. वहां पिलर ढालने को कहने लगा. यह काम कठिन है लेकिन तीन सौ रुपये में कौन लिंटर ढालेगा."

मज़दूरी के पूरे पैसे नहीं मिल पाते

वहां के दिहाड़ी मजदूरों का रेट यही था. 300 से 350 के बीच. जैसा काम, वैसा रेट. लेकिन उसमें भी अधिकांश की शिकायत ये थी कि ठेकेदार जितने पैसे में तय करके ले जाता है, उतने पैसे भी नहीं देता.

वहां मौजूद कई लोगों से हमने ये पूछा कि क्या उनका कोई साथी लू की चपेट में अब तक आया है. ज़्यादातर लोगों ने कहा कि खुद उन्हें लू लगी थी लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया.

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Image caption गया के एक मुहल्ले में धूप में काम करता दिहाड़ी मज़दूर

मरने वालों संख्या बढ़ रही है

फल्गू नदी के किनारे विष्णुपद पद घाट से हाल के दिनों में ऐसी खबरें आयी थीं कि वहां शव ज्यादा पहुंचने लगे हैं.

दोपहर एक बजे का वक्त था. जब हम विष्णुपद घाट पहुंचे तो वहां नदी किनारे 14 शव एक साथ जल रहे थे. दो शवों को लाकर रखा गया था. जलाने का इंतजार था.

सूखी पड़ी फल्गू नदी में संजय एक चिता तैयार कर रहे थे. वो शव जलाने का काम करते हैं. उन्होंने बताया, "ये आज की 23वीं चिता लगाई जा रही है. कल 33 शव आए थे. लेकिन उसके पहले दो दिन बहुत शव आए थे. एक दिन तो रिकॉर्ड 85 तक पहुंच गया था."

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Image caption एक साथ जलती कई चिताएं.

गर्मी और लू के बारे में पूछने पर वह कहते हैं, "देखते नहीं फिर भी लोग नदी के ही अंदर जलाने की जिद करते हैं. लू से आदमी मर रहा है और उसकी चिता जलाने वाले को भी लू लग रही है."

विष्णुपद घाट पर के एक शिलापट्ट में साफ-साफ लिखा है कि शवों को विद्युत श्मशान गृह में ही जलाया जाए. बाहर घाट पर शव जलाने पर प्रतिबंध है.

लेकिन विद्युत श्मशान गृह जो बना था, वह बन कर टूट भी गया था. उसके शेड के अंदर वो लोग धूप से बचकर बैठे थे जिनके संबंधियों की चिताएं बाहर जल रही थीं. शमशान घाट पर बना विश्राम गृह पहले से भरा था. फर्श पर लोग बैठकर शवों के जलने का इंतजार कर रहे थे.

दुकानदारों का भी बुरा हाल

रिकॉर्ड्स के अनुसार गया में बोधगया का इलाका सबसे गर्म रहता है. वहां महाबोधि मंदिर के अंदर लोगों का आना-जाना बहुत कम हो गया था. गेट के बाहर लगने वाली फुटपाथी दुकानें ज्यादातर बंद थीं.

सत्यनारायण साव जिहोंने अपनी दुकान खोल रखी थी, उनसे बंद दुकानों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया, "बिक्री ही नहीं है, तो गर्मी में कौन दुकान लगाएगा. हम लोगों के पास दूसरा कोई रास्ता नहीं है रोजी रोटी चलाने का."

वहीं अपने आइसक्रीम के ठेले के साथ धूप में विजय साव भी खड़े थे. जो रोज 20 किमी दूर शेरघाटी से सुबह ही आते हैं. दिन भर आइसक्रीम बेचते हैं. घर पहुंचने तक रात के आठ बज जाते हैं.

वो कहते हैं," ग्राहक कम हो गए हैं इन दिनों. हम तो रोज पैसा लेकर जाते हैं, रोज उसी का खाते हैं, अगर एक दिन भी बैठ गए तो जुर्म जैसा ही लगता है."

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Image caption महाबोधि मंदिर के पास बाहर धूप में आइसक्रीम का ठेला लगाए विजय साव

महाबोधि मंदिर में प्रवेश से पहले बहुत से पुलिस प्वाइंट्स से होकर गुजरना पड़ता है. सड़क पर आदमी दिखें ना दिखें, पुलिस के जवान जरूर दिखते हैं.

एम्बैसी मोड़ पर एक पुलिस चेकपोस्ट बनाया हुआ है. बाहर एक छोटे से पेड़ के नीचे थोड़ी सी छाया में तीन चार पुलिसकर्मी स्टैंड फैन लगाकर बैठे थे. वो कहने लगे, "दोपहर में ये पंखा बंद ही रखते हैं हम लोग. गर्म हवा देता है."

तेज़ धूप और लू में काम करते पुलिस वाले

लू और धूप की अपनी ड्यूटी के बारे में पूछे जाने पर सिपाही कहते हैं, "ड्यूटी है तो करनी ही है. ऊपर के स्तर पर इसमें कोई रियायत नहीं है. आठ घंटे की शिफ्ट है. कुल आठ चेक प्वाइंट्स हैं. जवानों की भी कमी है. किसी चेक प्वाइंट पर एक, किसी पर दो, किसी पर तीन-तीन जवान तैनात हैं. जब ब्रेक लेने का मन करता है तो मन मसोस कर रह जाते हैं. चेकप्वाइंट छोड़कर जाएं तो किसके हवाले. प्रशासन की ओर से यही कूलर मिला है. पीने का पानी तो आया था लेकिन वो भी गर्म हो गया है. हम लोग बगल के दुकानों से खरीद कर पी लेते हैं. आखिर लू भी झेलनी है."

चार बजने में अभी भी एक घंटा बाकी था. हम बोधगया से वापस गया की ओर लौट रहे थे, रास्ते में एक जगह सड़क किनारे फुटपाथ बनाने का काम चल रहा था. दर्जनों मज़दूर ईंटें बिछाने का काम रहे थे. पता चला कि नगर निगम का काम है.

हमने फिर से पूछा क्योंकि नगर निगम की गाड़ियों से तो सुबह में लाउडस्पीकर पर यह बजाया जा रहा था कि दिन में किसी को बाहर तक नहीं निकलना है, डीएम ने किसी भी तरह के निर्माण के काम पर प्रतिबंध लगा दिया है.

एक मजदूर ने कहा कि वे लोग अभी-अभी आए हैं. तीन बजे. सुबह 11 बजे के पहले चले गए थे.

लेकिन हमें ये लोग उस वक्त भी काम करते दिखे थे जब हम दोपहर में करीब 12 बचे गया से बोधगया आ रहे थे. इसकी शिकायत हमने डीएम गया से भी की. उन्होंने जब यह कहा कि अगर ऐसा कहीं होता दिखता है तो फोटो खींच कर उन्हें सूचित करें. वे कार्रवाई करेंगे. हमने लौटते हुए वो तस्वीर उन्हें भेज दी है.

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Image caption पुलिसवाले पंखा लगाकर ड्यूटी कर रहे हैं

शाम होने से पहले गया के आसमान में बादल छाने लगे थे. सड़कों पर गतिविधियां बढ़ गई थीं. धूप भी लगभग ख़त्म ही हो चुकी थी.

गया के स्थानीय पत्रकार आदित्य वर्धन कहते हैं, "इधर दो दिनों से रह-रह कर बादल आ रहे हैं. लेकिन बरस नहीं रहे. सब जगह आस-पास बारिश हुई, लेकिन गया में एकदम बारिश नहीं हुई. बस बादल आने से धूप नहीं लगती. लू फिर भी चल ही रही है."

बोधगया से लौटते हुए सड़क के किनारे सूखी फल्गू नदी को देखकर हमने विस्मय से एक स्थानीय बुजुर्ग से पूछ लिया कि ये नदी कब से सूखी है?

उसने कहा कि पुराणों में लिखा गया है कि एक जमाने में इसमें दूध की नदी बहती थी. इसे सीता का श्राप मिला है. इसलिए यह सूख गई है.

उन्होंने फिर थोड़ा रुककर बंजर जमीन की ओर इशारा करते हुए कहा, "सारा बालू तो निकाल लिया लोगों ने! नदी कहां से बचेगी. अब तो बालू भी नहीं बचा है. हमलोग चुल्लू में भर-भर के पानी पीते थे. अब 60 फीट नीचे भी पानी नहीं मिलता."

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