नीतीश कुमार केंद्रीय योजनाओं के दम पर बने 'सुशासन बाबू'?: नज़रिया

  • 23 जून 2019
नीतीश कुमार, मुजफ्फरपुर इमेज कॉपीरइट Getty Images

अगर किसी सरकार को सालों से उस बात की तारीफ़ या श्रेय मिल रहा हो जो उसने किया ही न हो तो यह सुनिश्चित है कि जब वास्तविक चुनौती भरी स्थिति आती है तो प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह से ध्वस्त हो जाती है.

शायद बिहार में जो मौजूदा हालात हैं उससे बेहतर इस बात का कोई दूसरा उदाहरण हो ही नहीं सकता, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगभग 14 सालों से सत्ता संभाले हुए हैं, सिर्फ़ नौ महीने के एक संक्षिप्त समयावधि को छोड़कर.

उत्तरी बिहार में बीमारी के चलते सैकड़ों लोग मारे गए हैं, जिनमें ज़्यादातर बच्चे हैं और यह कि दक्षिण बिहार में गर्म हवाएं मौत की हवाएं बनकर बह रही हैं.

लेकिन जिस तरह इस पूरे मुद्दे पर राज्य प्रशासन का ढुलमुल रवैया नज़र आया उससे आम आदमी ही नहीं, एनडीए नेता भी खासे ख़फ़ा दिखे. बीजेपी के एमएलसी सच्चिदानंद राय ने अपनी ख़ुद की पार्टी, जदयू नेताओं और सरकारी तंत्र की नाकामी की आलोचना करने में कोई कमी नहीं रखी.

मीडिया कई बार बिहार में विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर काम के लिए नीतीश कुमार को सुशासन बाबू कहता रहा है.

लेकिन 2016 में हुए टॉपर स्कैम और अभी इतनी बड़ी संख्या में हुई बच्चों की मौतों से सिर्फ़ एक बात स्पष्ट होती है कि बिहार में सिस्टम पूरी तरह सड़ चुका है.

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Image caption अख़बारों में नीतीश कुमार के दौरे की ऐसी तस्वीरें दिखाई जाती हैं, जबकि अधिकतर अस्पताल मुलभूत सुविधाएं के लिए जूझ रहा है

लोचना के बाद नीतीश ने बदला फ़ैसला

एक ओर जहां राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने मुज़फ़्फ़रपुर में हो रही बच्चों की मौत पर बहुत देर से प्रतिक्रिया दी. वहीं गया, नवादा, औरंगाबाद और जमुई जैसे ज़िलों में, जहां लू के चलते कई लोगों की जान जा चुकी है, वहां मुख्यमंत्री हवाई सर्वेक्षण के लिए जाने वाले थे.

मुख्यमंत्री के इस हवाई सर्वेक्षण की सोशल मीडिया पर जमकर आलोचना हुई. जिसके बाद उन्हें मजबूरी में अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ा.

इससे पहले, केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे भी मुज़फ्फ़रपुर नहीं जा पाए लेकिन 16 जून को जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने मुज़फ़्फ़रपुर का दौरा किया तो उन्हें भी मरते हुए बच्चों की याद आई और वो भी उनके साथ वहां पहुंचे.

आपको संभवत: याद हो कि यह वही अश्विनी चौबे हैं, जिन्होंने साल 2012 में नीतीश सरकार के दौरान स्वास्थ्य मंत्री के पद पर रहते हुए डॉक्टरों को धमकी दी थी कि अगर वे हड़ताल पर गए तो उनके हाथ काट लिए जाएंगे.

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मुज़फ़्फ़रपुर के मासूमों की मौत का असल ज़िम्मेदार कौन

प्रचार और सच

एक कड़वा लेकिन तथ्य यह है कि बिहार में एक लंबे समय से हालात काफी बिगड़े हुए हैं. हालांकि यह बिल्कुल सही है कि लालू-राबड़ी शासन के दौरान भी राज्य के हालात सही नहीं थे लेकिन कम से कम मीडिया वॉचडॉग की तरह अपना कर्तव्य निभा रहा था और न्यायपालिका भी सक्रिय थी.

प्रशासनिक तंत्र में कम से कम इस बात का डर था कि अगर कुछ ग़लत हुआ तो वो उजागर हो सकता है और फिर उस पर कार्रवाई की जा सकती है.

24 नवंबर, 2005 के बाद से यह डर कम हो गया है. राजनीतिक गलियारों की ही बात नहीं बल्कि नौकरशाही भी यह जान गई है कि उन्हें तो श्रेय मिलना ही है क्योंकि उनका राज्य तो हर क्षेत्र में विकास कर रहा है.

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का उदाहरण दें तो यह वो विकल्प होना चाहिए जहां ग़रीब सबसे पहले जाने चाहिए. लेकिन अगर मीडिया में आ रही ख़बरों की माने तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति राज्य में बेहद ख़राब है जिसकी वजह से लोगों को बड़े अस्पताओं का रुख करना पड़ता है.

लेकिन यह वही मीडिया है जो कुछ साल पहले तक यह दावा कर रही थी कि नीतीश कुमार की सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं का कायापलट कर दिया है. उन्होंने इस सरकार के दौरान प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीज़ों की बढ़ी हुई संख्या को उदाहरण के तौर पर पेश किया था.

लेकिन सच्चाई कुछ और ही है. बीते कुछ सालों में अगर बिहार राज्य में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं में ज़रा भी बेहतरी आई है तो यह नीतीश कुमार सरकार की किसी योजना का परिणाम नहीं है बल्कि इसका सीधा संबंध केंद्र सरकार के केंद्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन से है.

इस योजना के तहत केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा भारी सुविधाएं दी गईं थीं. डॉक्टरों के वेतन में वृद्धि की गई. पैरा-मेडिक्स और केंद्र से आने वाली दवाओं का वितरण किया गया.

तो ऐसे में राज्य की तरफ़ से कोई बड़ी योजना थी ही नहीं तो पूरी व्यवस्था का चरमरा जाना स्वाभाविक था.

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Image caption 2015 में परीक्षा में कदाचार की इस तस्वीर ने बिहार सरकार की देश-दुनिया में ख़ूब फ़जीहत करवाई थी

झूठा श्रेय ले रहे हैं नीतीश कुमार

इससे पहले मीडिया इस बात को मुद्दा बनने में नाकाम रही थी कि राज्य में मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, ख़ास कर पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हड़ताल की वजह से 500 से अधिक मरीज़ों की मौत हुई थी.

तो अगर मुज़फ़्फ़रपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में स्थिति हाथ से बाहर चली गई थी तो इसके पीछे रहे कारणों को समझा जा सकता है.

बिहार में कई बड़े अस्पतालों में 50 फीसदी डॉक्टरों के पद खाली पड़े हैं लेकिन राज्य सरकार पटना और राजगीर में बड़ा म्यूज़ियम बनाने और सम्मेलन के लिए आधुनिक सेंटरों के निर्माण में व्यस्त रही है.

बिहार में मीडिया ने करोड़ों के गर्भाशय घोटाले को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया, हालांकि बीबीसी वर्ल्ड सर्विस की एक टीम ने इस पर एक विशेष कहानी की.

यह सच है कि बिहार में सड़कों की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन यह एक बार फिर से केंद्र प्रायोजित प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, राष्ट्रीय राजमार्गों और पूर्व-पश्चिम गलियारे और स्वर्णिम चतुर्भुज योजनाओं के कारण संभव हुआ है.

नीतीश ने इन सबका श्रेय ख़ुद लिया जबकि सच्चाई यह थी कि उनकी सरकार के प्रयास केवल राज्य के राजमार्गों और जिला सड़कों के निर्माण तक ही सीमित थे.

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उद्घाटन, दौरे होते रहे पर नहीं लगा उद्योग

इसमें कोई शक़ नहीं कि बिहार में छात्राओं को साइकिल बांटी गई थी और स्कूल की इमारतों को सर्व शिक्षा अभियान के तहत बेहतर बनाने की कोशिश की गई है. लेकिन राज्य सरकार ने पारा टीचर्स के नाम पर लाखों अशिक्षित या कम शिक्षित टीचरों की नियुक्ति कर शिक्षा व्यवस्था की ही कमर तोड़ कर रख दी.

साइकिल और छात्रवृत्ति देने की योजना का नतीजा ये भी हुआ कि इससे स्कूल में दाखिले के नाम पर एक नया करोड़ों रुपयों का घोटाला सामने आया. निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र भी छात्रवृत्ति और साइकिल के लिए सरकारी स्कूलों में एडमिशन लेने लगे.

इधर, राज्य में निवेश लाने में लगातार नाकाम होने के बाद भी मीडिया ने भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सुशासन बाबू और बेहतरीन सीएम के नाम से नवाज़ते रहना जारी रखा.

मुकेश अंबानी ने बिहार का दौरा किया था और इसके अलावा सोनालिका ट्रैक्टर का उद्घाटन भी हुआ था, लेकिन इस कंपनी से एक भी ट्रैक्टर बन कर नहीं निकला और राज्य की चीनी मिलें भी बीमार ही बनी रहीं.

राज्य की प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक उद्योग क्षेत्रों में कोई सुधार न होने पर भी राज्य का विकास 11 फ़ीसदी की दर से होता रहा. हालांकि ये विकास मूलत: निर्माण कार्य में आई तेज़ी के कारण था. इसका बड़ा कारण ये था कि राज्य में केंद्र की सड़क और रेल परियोजना का काम चल रहा था, जिसमें भारी निवेश किया जा रहा था.

नीतीश सरकार ने विज्ञापनों के लिए बड़ी मात्रा में पैसा खर्च करना जारी रखा, तो उनका मीडिया के चहेते भी बने रहना तो लाज़मी ही था. दूसरी बात ये कि लालू-राबड़ी की सत्ता से छुटकरा पाने की चाहत रखने वाले पत्रकारों के लिए वो एक विकल्प दिखे.

राज्य में जो कुछ हो रहा था उसका कभी न कभी पूरी व्यवस्था पर बुरा असर पड़ना लाज़मी था.

बीते कुछ सालों में इंजीनियरिंग, मेडिकल और सिविल सेवा परीक्षाओं में पास होने वाले बिहार बोर्ड के बच्चों की संख्या भी काफी कम हुई है.

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