सूखे बुंदेलखंड में कैसे हरा-भरा है ये गांव

  • 25 जून 2019
बुंदेलखंड का जखनी गांव इमेज कॉपीरइट Samiratmaj mishra/BBC

पूरा बुंदेलखंड भले ही सूखे की चपेट में हो, बूंद-बूंद पानी के लिए लोग संघर्ष कर रहे हों लेकिन इसी बुंदेलखंड के बांदा ज़िले का एक गांव ऐसा भी है जहां कुंए और तालाब पानी से लबालब भरे हैं, खेतों में धान-गेहूं और सब्ज़ियों की जमकर खेती हो रही है और हैंड पैंपों में हर समय पानी आता है.

बांदा ज़िला मुख्यालय से क़रीब बीस किमी दूर जखनी गांव में प्रवेश करते ही गर्मी के मौसम में भी खेतों में उगी सब्ज़ियां दिखने लगती हैं, कुछ खेतों में गेहूं कट चुका है तो अब धान बोने की तैयारी हो रही है और हर तरफ़ पेड़-पौधों की हरियाली दिखती है.

पूरे बुंदेलखंड में जल स्तर भले ही दो सौ-ढाई सौ फुट नीचे चला गया हो लेकिन यहां कई कुंए ऐसे हैं कि बाल्टी हाथ में लेकर पानी निकाल सकते हैं. यानी महज़ छह-सात फुट पर ही पानी है. तालाबों में तो ख़ैर पानी भरा ही है.

ऐसा नहीं है कि इस गांव में प्रकृति ने कुछ अतिरिक्त 'कृपा' की है या फिर कोई दैवीय चमत्कार हुआ है बल्कि ये सब यहां के लोगों की सोच, मेहनत और उनकी आपसी एकता का प्रतिफल है.

क़रीब पंद्रह साल पहले यहां की स्थिति भी वैसी ही थी जैसी कि बांदा और पूरे बुंदेलखंड के दूसरे गांवों की, लेकिन कुछ ग्रामीणों की सोच ने सब कुछ बदलकर रख दिया.

गांव के अशोक अवस्थी बताते हैं, "हमारे घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. हाईस्कूल पास करने के बाद कमाने-धमाने के लिए सूरत चला गया. मेरे साथ कई और लोग भी थे गांव के और कुछ पहले से ही बाहर रह रहे थे. वहां के किसानों को देखकर मुझे लगा कि कुछ ऐसा अपने गांव में भी किया जा सकता है. मेरे पास ज़्यादा खेती नहीं थी लेकिन जितनी थी उसी में मैंने शुरुआत की. पुराने और परंपरागत तरीक़े से ही खेती शुरू की गई. बहुत अच्छी पैदावार हुई. मेरा उत्साह बढ़ा तो और लोगों को प्रोत्साहित किया. देखते-देखते गांव के दर्जनों युवा अपने गांव लौट आए."

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अशोक अवस्थी जिस जगह पर खड़े होकर हमें ये कहानी सुना रहे थे वो रामविशाल कुशवाहा का खेत था.

गांववासियों की एकता ने दिखाया रंग

क़रीब एक बीघे के इस खेत में बैंगन, लौकी, तुरई जैसी सब्ज़ियां उगी थीं. इसी साल कुशवाहा ने छह लाख रुपये का बासमती चावल बेचा है. कुशवाहा बताने लगे, "हम लोग इतनी सब्ज़ी उगाते हैं कि पूरे बांदा में हमारे गांव की सब्ज़ी मशहूर है. जखनी का परवल पूरे बांदा क्या उसके बाहर भी मशहूर है. सब्ज़ी के अलावा धान, गेहूं, आलू, दलहन हर फ़सल उगाते हैं."

इस गांव के लोगों की ये खेती इसलिए फल-फूल रही है और सोना उगल रही है क्योंकि यहां पानी का संकट नहीं है.

पानी का संकट दूर करने के लिए गांव वालों ने ख़ुद ही पहल की और अपने बूते उसका उपाय ढूंढ़ा.

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गांव के ही समाजसेवी उमाशंकर पांडेय कहते हैं कि इस अभियान में हम लोगों ने न तो किसी की मदद ली, न ही कोई नई तकनीक अपनाई और न ही कोई सरकारी अनुदान लिया.

उमाशंकर पांडेय कहते हैं, "बुंदेलखंड में पानी का संकट कोई नई बात नहीं है लेकिन हमारे पूर्वजों ने इसका जो समाधान ढूंढ़ा था, हमने उसी को अपनाया. हम लोगों ने एक संगठन बनाकर अपने गांव के पुराने तालाबों और कुंओं के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया. कुंओं की सफ़ाई की, तालाबों को संरक्षित किया और अतिक्रमण हटाया, खेतों की मेड़बंदी की और नालियों के पानी को खेतों में पहुंचाया. पंद्रह साल की मेहनत का नतीजा है कि जलस्तर इतना ऊपर है कि कुछ कुंओं में आप हाथ से पानी निकाल सकते हैं."

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उमाशंकर पांडेय बताते हैं कि उन लोगों ने इस सिद्धांत पर काम किया कि पानी की एक बूंद भी बेकार न जाए. गांव में बरसात के पानी को रोकने का हर उपाय किया गया है और तालाबों में पानी रुका रहे, इसका इंतज़ाम किया गया है. जखनी गांव में छह बड़े तालाब हैं जो पानी से लबालब भरे हैं और इनमें से कुछ तालाबों में तो बाक़ायदा नाव भी चलती है.

बासमती चावल उगाने की वजह

जखनी गांव के लोगों ने पंद्रह साल पहले जलग्राम समिति नाम की एक कमेटी बनाई जिसने गांव की खुशहाली के बारे में कुछ करने की ठानी.

इस समिति में संयोजक उमाशंकर पांडेय समेत कुल 15 सदस्य हैं. यही समिति मेड़, तालाब, कुंआ, नाली आदि के रखरखाव पर पूरा ध्यान देती है और दूसरों को भी प्रेरित करती है.

उमाशंकर पांडेय बताते हैं कि इस साल गांव वालों ने सिर्फ़ बासमती चावल ही अठारह हज़ार कुंतल पैदा किया है और ये सारी खेती जैविक खाद से होती है, रासायनिक खाद का इस्तेमाल नाममात्र का होता है. गांव वालों ने इस बार इक्कीस हज़ार कुंतल बासमती चावल पैदा करने का लक्ष्य रखा है. जखनी गांव बहुत बड़ा नहीं है. यहां खेतिहर ज़मीन क़रीब ढाई हज़ार बीघे ही है लेकिन गांव के लोग सिर्फ़ अपने ही गांव में खेती नहीं करते बल्कि आस-पास के गांवों के खेत भी ठेके पर लेकर उसमें फ़सल उगाते हैं.

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बासमती चावल उगाने के पीछे उमाशंकर पांडेय एक दिलचस्प वजह भी बताते हैं, "धान के खेत को पानी चाहिए इसलिए धान बोने पर उस खेत में साल के क़रीब सात आठ महीने पानी भरा रहता है. जब इतने समय तक उस खेत में पानी रहेगा, तो नीचे की ज़मीन में नमी अपने आप बनी रहेगी."

गांव के मामून अली बताते हैं कि पहले वो भी नोएडा में रहते थे और उनका ख़ुद का ठीक-ठाक व्यवसाय भी था लेकिन बाद में वो भी गांव चले आए. मामून अली के पास ज़मीन भी ज़्यादा है और उन्होंने इसी साल बड़े से तालाब में मछली पालन भी शुरू किया है. हालांकि बड़े तालाबों में मछलियां पहले से ही पाली जा रही हैं.

ख़त्म हुई पानी की क़िल्लत

जल संरक्षण के चलते जखनी गांव के लोगों को जहां पानी की क़िल्लत का सामना नहीं करना पड़ रहा है, वहीं अच्छी खेती करके आर्थिक समृद्धि भी आई है. राजाराम वर्मा जैसे छोटे किसान भी यहां साल भर में चार-पांच लाख रुपये की आमदनी कर लेते हैं, ऐसा ख़ुद उनका कहना है. उमाशंकर पांडेय बताते हैं कि यह सब सामूहिक प्रयास है और उसी के चलते जखनी को जलग्राम बनाना संभव हो पाया.

गांव के लोगों के मुताबिक़, उनके इस सामूहिक प्रयास की बदौलत छोटे से गांव को प्रधानमंत्री सड़क योजना के तहत तीन सड़कें स्वीकृत हुई हैं जिनमें से दो बन चुकी हैं और तीसरी सड़क पर निर्माण कार्य जारी है. इसी सामूहिक प्रयास के चलते जखनी जैसे छोटे से गांव में प्राइमरी स्कूल के अलावा इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज भी खोले गए.

बुंदेलखंड का जखनी गांव

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उमाशंकर पांडेय बताते हैं कि जल संरक्षण की प्रेरणा उन्हें दिल्ली में प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र से मिली और उसी के बाद उन्होंने इसका प्रयोग अपने गांव में करना शुरू कर दिया. पांडेय के मुताबिक, "हमने किसी भी तालाब के किनारे को पक्का नहीं किया है बल्कि जैसा था, वैसा ही रहने दिया गया है. पक्का करने पर पानी ज़मीन के अंदर नहीं जा पाता है. गांव में कुछ और भी तालाब हैं जिन पर लोगों ने काफ़ी पहले से कब्ज़ा कर रखा है लेकिन हम लोगों ने पहले अपना ध्यान उन तालाबों पर केंद्रित किया जो चालू थे और यही वजह है कि हमारे गांव में छह बड़े तालाब हैं जो पानी से भरे हैं."

जखनी गांव में शायद ही कोई ऐसा हैंडपंप हो जिसमें पानी न हो. इसकी वजह ये है कि गांव के अलावा इस पूरे इलाक़े में जल स्तर ऊपर उठ गया है. मामून अली बताते हैं कि उन लोगों की देखा-देखी आस-पास के गांव वालों ने भी अब ऐसा करना शुरू कर दिया है और बासमती धान की खेती करने लगे हैं.

बांदा के ज़िलाधिकारी हीरालाल का कहना है ज़िले में सभी गांवों को जखनी जैसा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है. बीबीसी से बातचीत में उनका कहना था, "हम लोग अपने ज़िले में तालाब और कुंओं के संरक्षण के लिए एक अभियान चला रहे हैं और इसके तहत जखनी को आदर्श गांव के तौर पर लोगों के सामने उदाहरण के लिए रखा जाता है."

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