आर्थिक संकट: मोदी दवा बदलेंगे या डोज़ बढ़ाएंगे- नज़रिया

  • 25 जून 2019
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पांच जुलाई को आम बजट से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार को शीर्ष अर्थशास्त्रियों और उद्योग जगत के दिग्गजों के साथ बैठक की.

इससे पहले, पिछले कार्यकाल में भी प्रधानमंत्री ने आर्थिक हालात पर विचार-विमर्श के लिए शायद ही ऐसी कोई बैठक की हो.

माना जा रहा है कि आर्थिक मंदी के असर का खंडन करते रहने के बावजूद अब मोदी सरकार में चिंता दिखनी शुरू हो गई है.

आम चुनावों में भारी बहुमत से जीतने के बाद भले ही मोदी ने भारत को आने वाले समय में पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का वादा किया हो लेकिन आर्थिक संकेतक कुछ और ही इशारा कर रहे हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ देश में बेरोज़गारी 45 सालों में सबसे ज़्यादा हो गई है और आर्थिक वृद्धि दर में भारत चीन से पिछड़ गया है.

प्रधानमंत्री के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने जीडीपी आंकड़ों पर सवाल खड़ा कर आर्थिक हालात को और बहस के केंद्र में ला दिया है.

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डोज़ बढ़ाएंगे या दवा बदलेंगे

बीजेपी को अब समझ में आ रहा है कि उसने आर्थिक मुद्दों पर ये चुनाव नहीं जीता है. वे मुद्दे बिल्कुल अलग थे, जिन पर उन्हें भारी बहुमत मिला.

अब मोदी सरकार के सामने लगातार बिगड़ती अर्थव्यवस्था की चुनौती है. इतने बड़े पैमाने पर बैठक बुलाने का मतलब है कि वो इस बारे में गंभीर हैं कि अर्थव्यवस्था को लेकर कुछ करना होगा.

मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर और उपभोक्ता बाज़ार में सुस्ती के साथ बेरोज़गारी के आंकड़ों को भले ही मोदी सरकार ने नकारा हो लेकिन ये आर्थिक विकास में अब बड़ी चिंता बन चुके हैं.

ये ताजा चिंतन मनन यही दिखाता है कि जिन ज़मीनी सच्चाइयों से सरकार मुंह मोड़े थी, अब कहीं न कहीं वो इन्हें स्वीकर कर रही है.

लेकिन मोदी सरकार की हालत उस डॉक्टर जैसी है जिसके सामने ये बड़ा सवाल है कि बीमारी न ठीक होने पर दवा की डोज़ बढ़ाई जाए या दवा बदली जाए.

अर्थव्यवस्था में जान फ़ूंकने के लिए मोदी ने रिज़र्व बैंक पर दबाव डाला और ब्याज़ दरों में कटौती की गई लेकिन उससे भी कोई फ़र्क पड़ता नहीं दिख रहा है.

समस्या ये है कि मोदी के आर्थिक सलाहकारों के घेरे में वही लोग हैं जिनकी सलाह पर पिछले पांच साल में नीतियां तय की गईं.

जब तक इस घेरे से बाहर मोदी विचार-विमर्श नहीं करते, उसी डॉक्टर से बार-बार सलाह लेने से कोई ठोस बात निकलेगी, इसमें संदेह की पूरी गुंजाइश है.

इस बात का सबसे अधिक डर है कि जिन नीतियों की वजह से आज अर्थव्यवस्था की ये हालत हुई है, मोदी सरकार उसी को और ज़ोर शोर से लागू करेगी.

क्योंकि किसी हकीक़त को स्वीकार करना और परिस्थितियों का ठीक से आकलन कर सही क़दम उठाना अलग-अलग बातें हैं.

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ये तीन काम करे सरकार

जो दिखाई पड़ रहा है उससे तो यही लग रहा है कि सरकार आर्थिक संकट के पीछे के कारणों को नहीं समझ पा रही है क्योंकि चारों ओर यही शोर मचा हुआ है कि आर्थिक सुधार को और तेज़ी से लागू किया जाए.

इसका मतलब ये हुआ कि जिन आर्थिक सुधारों को लागू कर हमारी ये हालत हुई है उन्हीं को और आगे बढ़ाया जाए. हालांकि मोदी सरकार के पास एक अच्छा मौक़ा है कि वो बुनियादी नीति में बदलाव लाए.

आगर आर्थिक हालात को फिर से पटरी पर लाना है तो आर्थिक मोर्चे पर सरकार को तीन काम करने होंगे.

सबसे पहले तो सरकार ने जो मुक्त व्यापार की नीति अपना रखी है, उसे बंद किया जाना चाहिए. चीन का सामान बिना आयात शुल्क के आ रहा है तो आने दिया जाए, इस नीति को अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप से सीख लेते हुए तिलांजलि दे देनी चाहिए.

अमरीका ने भारत से आयात होने वाले सामानों पर आयात कर बढ़ा दिए थे, भारत एक साल बाद जागा और अमरीकी सामानों पर आधा अधूरा कर लगाकर राहत की सांस ले ली.

भारत सरकार को अभी तक ये समझ नहीं आ रहा है कि पूरी दूनिया संरक्षणवाद की ओर जा रही है, जबकि हम अभी अपने पुराने फ़ॉर्मूले पर अटके हुए हैं.

भारत को आयात कर बढ़ाने चाहिए जिससे देश के छोटे और लघु उद्योगों में प्रतिस्पर्द्धा करने की ताक़त बढ़ेगी जिससे देश में रोज़गार भी बढ़ेगा.

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बड़े उद्योगों से मोह छोड़ें

दूसरी सबसे अहम बात है कि सरकार को बड़े उद्योगों के प्रति अपने मोह को त्याग देना चाहिए.

पीएम मोदी के दिमाग़ में शायद चीन और अमरीका की तरह ही बड़े-बड़े कारखाने लगाने का ख्याल हो, लेकिन ये भारत की परिस्थिति के लिहाज से कितना सही रहेगा, इस पर वो विचार नहीं कर रहे हैं.

इसकी वजह ये है कि अपने देश में रोज़गार सबसे अधिक छोटे कारखानों में पैदा होता है, इसलिए छोटे उद्योगों को संरक्षण देना चाहिए.

तीसरी अहम बात है कि सरकार अपने वित्तीय घाटे को कम करने का मंत्र बना रखा है और उसकी वजह से पूंजी निवेश कम होता जा रहा है. उसकी जगह उसे चालू खाते या राजस्व घाटे को कम करने और निवेश बढ़ाने पर ज़ोर देना चाहिए.

अगर सरकार ये तीन नीतियां अपनाती है तो ये उम्मीद की जा सकती है कि अगले छह महीने में अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी.

इसीलिए अगर मोदी चाहें तो अगले छह महीने में देश की अर्थव्यवस्था को काफ़ी कुछ ठीक कर सकते हैं लेकिन उन्हें कुछ बुनियादी परिवर्तन करने होंगे.

नोटबंदी से, जीएसटी से और बड़े उद्योगों को बढ़ावा देने से जो अर्थव्यवस्था को भारी नुक़सान पहुंचा है, उसे इस सरकार को स्वीकार करना पड़ेगा, तभी वो आगे कोई सटीक क़दम उठा सकती है.

सरकार के सामने चुनौतियां काफ़ी हैं. पिछले साल मोदी के आर्थिक सिपहसालार अरुण जेटली अब उनके साथ नहीं हैं. नई सरकार में पूर्व रक्षा मंत्री निर्मला सीतारण को वित्त मंत्री बनाया गया है.

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नई वित्त मंत्री कितना कर पाएंगी?

कुछ ही दिन में बजट पेश करने की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई है. उनके बारे में कहा जाता है कि वो चीज़ों को गहराई से समझती हैं लेकिन अर्थशास्त्र थोड़ा अलग मामला है और इतने कम समय में वो कितना समझ पाएंगी और क्या कर पाएंगी इस पर शंका है.

ऐसा लगता है कि इस आम बजट में मूल रूप से जो पुरानी नीतियां हैं उन्हीं का अनुमोदन होगा.

हो सकता है कि थोड़े-मोड़े बदलाव किए जाएं लेकिन कोई बुनियादी बदलाव आएगा, इसकी उम्मीद बहुत कम है.

सरकार में मंथन चल रहा है कि जीएसटी में पांच स्लैब की बजाय तीन स्लैब कर दिए जाएं या सिंगल रेट कर दिया जाए.

लेकिन सरकार को समझना होगा कि मूल समस्या ये है ही नहीं. जीएसटी के लागू होने से छोटे और लघु उद्योगों पर क़ागज़ी कार्रवाई का इतना भार पड़ गया है कि वो इसी से दब गए हैं.

दूसरे बड़े उद्योगों के अंतरराज्यीय व्यापार को आसान कर दिया गया जिससे छोटे उद्योग और दबकर रह गए हैं. इसलिए असल सवाल है छोटे उद्योगों को बुनियादी राहत देने की, जिसके बारे में सरकार फ़िलहाल कुछ नहीं सोच रही है.

ऐसा लगता नहीं है कि मोदी सरकार जीएसटी के दुष्प्रभावों को समझ भी पा रही है, इसे दूर करना तो दूर की बात है.

(वरिष्ठ अर्थशास्त्री भरत झुनझुनवाला के साथ संदीप राय की बातचीत पर आधारित)

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