पीएम नरेंद्र मोदी और अमरीकी विदेश मंत्री माइक मोम्पियो क्या बात करेंगे?

  • 24 जून 2019
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अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो सोमवार को भारत के दौरे पर आएंगे. वो विदेश मंत्री के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाक़ात करेंगे. पोम्पियो ऐसे समय भारत आ रहे हैं जब ईरान और अमरीका के बीच तनाव युद्ध के मुहाने तक पहुंच गया है.

हालांकि पोम्पियो की ये भारत यात्रा पहले से निर्धारित थी. पोम्पियो की भारत यात्रा पर बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा ने मध्य-पूर्व और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर कमाल पाशा से बातचीत की और जानना चाहा कि उनकी भारत यात्रा क्यों अहम है?

प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि बेशक इसका महत्व दो चीज़ो को ध्यान में रखते हुए बढ़ा है. पहला ये कि हाल ही में अमरीका के ड्रोन को ईरान ने मार गिराया था जिसकी वजह से खाड़ी क्षेत्रों में तनाव और बढ़ गया है और वहां के हालात और नाज़ुक होते जा रहे हैं.

दूसरी बात ये है कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में ऑयल टैंकर पर जो हमला हुआ था उससे टैंकर के आने जाने में भी बाधा हुई है. इंश्योरेंस, प्रीमियम के बढ़ने से तेल की क़ीमत में इज़ाफ़ा हुआ है.

इन दोनों ही मुद्दों पर ट्रंप का कहना है कि वो सैन्य हमला करने वाले थे, लेकिन अंतिम समय में कुछ वजहों से फ़ैसला टाल दिया था. इन सबके कारण तनाव बढ़ता जा रहा है. और ईरान का कहना साफ़ है कि अगर अमरीका इस तरह की कोई हरकत करता है तो हर मुमकिन जवाब देगा.

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प्रोफ़ेसर पाशा इस बात पर ध्यान दिलाते हैं कि जिस मक़सद से माइक पोम्पियो दिल्ली आ रहे हैं उनमें ईरान ही नहीं बल्कि दो और अहम मुद्दे भी हैं.

400 एंटी बैलिस्टिक मिसाइल जो भारत रूस से ख़रीदना चाहता है. टैरिफ़ वार जिसमें ट्रंप अमरीका को सबसे महान और शक्तिशाली देश बनाना चाहते हैं. अर्थव्यस्था और सेना को मज़बूत और स्वतंत्र करना चाहते हैं.

नरेंद्र मोदी और पोम्पियो क्या बात करेंगे?

एक तरफ़ नरेंद्र मोदी अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपना क़रीबी दोस्त बताते हैं. लेकिन दूसरी तरफ़ दोनों ही देशों के बीच फ़िलहाल कई चीज़ों पर भारी असहमति है. ऐसे में दोनों क्या बात कर सकते हैं?

प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि सभी जानते हैं कि भारत अमरीका से अच्छे से अच्छे रिश्ते बनाना चाहता है. और इसकी शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के समय से चली आ रही है. और हर भारतीय अमरीका के साथ आगे बढ़ता जा रहा है और हर तरफ हर क्षेत्र में अमरीका के साथ गहरे ताल्लुक़ बनते जा रहे हैं. अब हाल ही में सेना के लिए हथियार ख़रीदने में काफ़ी प्रगति हुई है.

इसको ध्यान में रखते हुए दूसरी अन्य बातों पर भी सहमति होनी चाहिए थी लेकिन हो नहीं पाई. जिनमें से एक है पाकिस्तान और कश्मीर का मसला, जिसमें भारत चाहता था कि पाकिस्तान पर कश्मीर मुद्दे पर या चरमपंथियों के नियंत्रण पर अमरीका का दबाव बने. लेकिन उसमें भारत के अनुसार ज्यादा प्रगति नहीं हुई है.

प्रोफ़ेसर पाशा मानते हैं कि दूसरी बात ये है कि अमरीका भारत और चीन के बढ़ते रिश्तों से ख़ुश नहीं है. जबकि अमरीका चीन को अलग-थलग करने की हर मुमकिन कोशिश कर रहा है.

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चीन और भारत से पाकिस्तान और रूस के साथ रिश्ते पर अमरीका समझता है कि भारत अपनी एक रणनीति बनाए रखना चाहते हैं. जबकि अमरीका भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों के साथ एक अलायंस बनाना चाहता है.

अमरीका ये समझता है कि अगर रूस से भारत ने मिसाइल ख़रीद ली तो आगे चलकर अमरीका जो अलायंस बनाना चाहता है जिसमें वो भारत को भी शामिल करना चाहता है, वो अलायंस नहीं बन पाएगा.

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खाड़ी में तनाव होने पर भारत की भूमिका

प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि जब भी कोई अमरीकी अधिकारी भारत आता है तो भारत बार-बार उनको ध्यान दिलाता है कि खाड़ी देशों में 80 लाख से ज्यादा भारतीय हैं. भारत का जो भी ईंधन और गैस आता है वो वहीं से आता है और ट्रेड और दूसरे क्षेत्रों में भारत की बहुत रुचि है, जो हमारे प्रगति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं.

भारत यही बताना चाहता है कि वहां जो भी तनाव होता है उससे भारत की आर्थिक स्थिति पर बहुत ही गहरा असर होगा, जिसके लिए बहुत बारीकी से सोच-समझकर क़दम उठाना चाहिए. गलत क़दम उठाने से केवल ईरान या अमरीका पर ही नहीं बल्कि पूरे विश्व पर असर पड़ेगा.

इस तनाव को लेकर भारत भी ओमान या दूसरे देशों के ज़रिए बात करने की कोशिश करेगा. अमरीका-ईरान तनाव से तेल और पेयमेंट के मामले पर काफ़ी असर हो रहा है. इसलिए भारत अमरीका के साथ अच्छे से अच्छे रिश्ते बनाए रखेगा.

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