असम में जापानी इंसेफ़ेलाइटिसः "अनीता को रोज़ याद करती हूं... बुख़ार से कोई मरता है क्या?"

  • 7 जुलाई 2019
अनीता की तस्वीर दिखाती विनती इमेज कॉपीरइट BBC/DILIP SHARMA

"15 दिन पहले अनीता को तेज़ बुख़ार हुआ था लेकिन दवाई लेने के बाद वो बिलकुल ठीक हो गई थी और स्कूल भी जाने लगी थी. लेकिन तीन-चार दिन बाद उसे फिर से बुख़ार आया. इस बार बुख़ार बहुत ज्यादा था, दवाई खाने के बाद भी वो ठीक नहीं हुई. मैं उसे हमारे चाय बागान के अस्पताल ले गई थी लेकिन वहां के लोगों ने डिब्रूगढ़ मेडिकल कॉलेज ले जाने को कहा और फिर..."

इतना कहने के बाद अनीता की मां विनती तांती की आंख से आंसू टपकने लगते है.

हाथ में अपनी 15 साल की बेटी की तस्वीर लिए वो लगातार रोए जा रही थीं.

कुछ समय बाद सिसकते हुए उन्होंने कहा," बुख़ार से कोई मरता है क्या? मुझे सैकड़ों बार बुख़ार हुआ है लेकिन मुझे तो कुछ नहीं हुआ. फिर अनीता क्यों मर गई? वो अब कभी नहीं आएगी. मैं उसे रोज याद करती हूं."

दरअसल, बीते 20 जून को 15 साल की अनीता तांती की डिब्रूगढ़ के असम मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में मौत हो गई थी. अस्पताल के चिकित्सक मौत का कारण दिमागी बुख़ार बताते हैं लेकिन जापानी इंसेफिलाइटिस यानी जापानी बुख़ार की साफ तौर पर पुष्टि नहीं करते.

असम मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में मेडिसीन विभाग में कार्यरत डॉ. रिमामोनी दौले कहती है,"अनीता संभावित जापानी इंसेफिलाइटिस से पीड़ित थी. क्योंकि इस घटना को कई दिन हो गए हैं. इसलिए मुझे रिकॉर्ड देखकर बताना होगा."

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अब तक हो चुकी हैं 49 मौतें

असम में इस साल 5 जुलाई तक केवल जापानी इंसेफेलाइटिस से 49 लोगों की मौत हो चुकी है.

प्रदेश में जापानी बुख़ार के प्रकोप का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी करके डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्य विभाग कर्मचारियों की सभी प्रकार की छुट्टियां 30 सितंबर तक के लिए रद्द कर दी हैं.

स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि केवल कोकराझाड़ ज़िले को छोड़कर प्रदेश के सभी ज़िले इस बीमारी से प्रभावित हैं.

लेकिन ज़मीनी हक़ीकत कुछ और ही है....

मंत्रियों और अधिकारियों की सारी बातें अनीता तांती के गांव पहुंचने पर फीकी लगने लगती है.

डिब्रूगढ़ से 40 किलोमीटर दूर लेंगराई चाय बागान के 10 नंबर लाइन में बांस और टीन के कच्चे मकान में कुछ दिन पहले तक अनीता बिलकुल स्वस्थ अपनी मां के साथ रह रही थी.

उसकी मौत के बाद भी यहां के हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

अनीता के घर के ठीक सामने गंदे पानी से भरे एक बड़े गड्ढ़े में मच्छरों की भिनभिनाहट से स़ाफ पता चल रहा था कि इस इलाके के लोगों में जापानी बुख़ार को लेकर किसी तरह की जागरुकता नहीं है. इसके अलावा वहां आस-पास के घरों में आधे दर्जन से ज्यादा पालतू सुअर घूमते हुए दिख रहे थे. पालतू सुअरों को इंसानों के शरीर में जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस पहुंचाने का मुख्य वाहक माना जाता है.

डिब्रूगढ़ ज़िला स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त निदेशक उदयन कुमार बरुआ ने बीबीसी से कहा,"जापानी इंसेफेलाइटिस के वायरस का शुरूआती वाहक बगुला पक्षी को माना जाता है.अभी इस मौसम में ये जंगली पक्षी हमारे इलाके में पहुंचते है. इस तरह जब इन पक्षियों को मच्छर काटते है उससे वो संक्रमित हो जाते है. फिर वही मच्छर पालतू सुअर को काटते है जिससे इसका वायरस पालतू सुअर के शरीर में चला जाता है. ग्रामीण इलाकों में अधिकतर लोग अपने घरों में ही सुअर पालते है और इनसे ही इंसान के शरीर में जापानी इंसेफेलाइटिस का वायरस पहुंचता है."

स्थानीय लोगों का कहना कि चाय बगानों में काम करने वालों को बहुत कम पैसे मिलते हैं. ऐसे में लोग सुअर पालते हैं.

क्या अनीता की मौत के बाद से आपको मच्छरों से डर लगने लगा है?

इस सवाल का जवाब देते हुई विनती कहती है,"मच्छरों से डरेंगे तो भूख से मर जाएंगे."

गोरखपुर के बाद एकमात्र अस्पताल

मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल के गृह जिले डिब्रूगढ़ को जापानी इंसेफिलाइटिस के नज़रिए से एंडेमिक क्षेत्र माना गया है. देश में गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के बाद डिब्रूगढ़ का असम मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल एक मात्र अस्पताल है जहां जेई के लिए सभी सुविधाओं से लैस 60 बिस्तरों वाला एक जेई ब्लॉक बनाया जा रहा है.

फिलहाल असम मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल के मेडिसिन विभाग के आईसीयू में जेई से संक्रमित तीन लोगों का इलाज चल रहा है.

यहीं मेरी मुलाकात बिहार से आई सीता देवी से हुई जिनका 15 साल का बेटा रंजन कई दिनों से आईसीयू में भर्ती है.दरअसल सिवान जिले के मझौलिया गांव का रहने वाला रंजन स्कूल की गर्मियों की छुट्टियों में अपने ननिहाल नामरूप घुमने आया था और कुछ दिन बाद ही जापानी बुख़ार की चपेट में आ गया.

सीता देवी कहती हैं,"25 मई मंगलवार को अचानक रंजन का सिर दर्द शुरू हुआ और थोड़ी ही देर में बुख़ार से उसका बदन तपने लगा. हमने उसे दवाई खिलाई थी लेकिन सुबह उसके शरीर में दो बार झटके लगे और मुंह टेढ़ा हो गया. कुछ देर बाद उसकी आवाज भी बंद हो गई. फिर हम तुरंत उसे डिब्रूगढ़ के एक प्राइवेट अस्पताल में ले आए. वहां कई दिन इलाज चला लेकिन कोई सुधार नहीं आया. अब हम उसे मेडिकल कॉलेज में लेकर आए है. पता नहीं मेरा बेटा कब ठीक होगा."

क्या कहना है डॉक्टरों का ?

जापानी इंसेफेलाइटिस संक्रमित रोगियों का इलाज कर रही डॉ. रिमामोनी दौले कहती है,"जापानी इंसेफेलाइटिस के अधिकतर मामलों में पीड़ित व्यक्ति के बचने की उम्मीद महज 30 फ़ीसदी होती है.जबकि 30 फ़ीसदी लोग आंशिक या पूर्ण विकलांगता के साथ-साथ मानसिक रोग के शिकार हो जाते है. हालांकि 30 फ़ीसदी लोगों के पूरी तरह ठीक होने की संभावना भी रहती है. "

"दरअसल जापानी इंसेफेलाइटिस एक ऐसी बीमारी है जिसके लिए विशेष तौर पर कोई दवा नहीं है. इंसेफेलाइटिस में ज्यादातर शिकार बच्चे और बूढ़े लोग होते है. इसे केवल टीकाकरण और मच्छरों को मारने से लेकर कई तरह की सावधानी से रोका जा सकता है."

"जून,जुलाई और अगस्त के महीने में जेई और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) के सबसे अधिक मामले आते है. अगर इन तीन महीनों में किसी को जेई का टीका लगाया भी जाता है तो उससे कोई फायदा नहीं होता. क्योंकि टीका लगाने के इतने कम समय में किसी भी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ नहीं सकती. इसलिए टीकाकरण जनवरी, फरवरी और मार्च में किया जाता है."

जेई जैसी जानलेवा बिमारी को नियंत्रण करने के उपाए बताते हुए डॉ. रिमामोनी दौले कहती हैं कि पालतू सुअरों को घर से दूर रखना और इसके अलावा पशुपालन विभाग की तरफ से पालतू सुअरों को भी इंसेफेलाइटिस का टीका लगाने की जरूरत है.

असम में जेई के बढ़ते मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने अपने स्वयं के परिवहन का उपयोग करके अस्पताल में पहुंचने वाले मरीजों को 1,000 रुपये का भुगतान करने की घोषणा की है.

इसके साथ ही आईसीयू में भर्ती रहने वाले जेई और एईएस रोगियों का पूरा खर्च सरकार द्वारा वहन करने की बात कही है. अगर जेई और एईएस का कोई मरीज निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम में इलाज कराते हैं तो उन्हें सरकार एक लाख रुपये की एकमुश्त वित्तीय सहायता देगी.

क्या कहते हैं आंकड़े?

सरकार की इस घोषणा से एक दिन पहले असम मेडकल कॉलेज एंड अस्पताल में जेई से पीड़ित अपनी 65 वर्षीय मां हेमंती मोरान का इलाज करवाए रहे नवज्योति ने कहा "अबतक मां का इलाज प्राइवेट अस्पताल में ही करवा रहें थे. करीब 80 हजार रुपए खर्च हो गए थे. आगे के इलाज के लिए ज्यादा पैसे नहीं थे इसलिए मां को मेडिकल कॉलेज ले आए.अब देखिए आगे क्या होता है."

एक सवाल का जवाब देते हुए 29 साल के नवज्योति कहते है,"गांव में जो सरकारी स्वास्थ्य केंद्र है उसके भरोश तो आपकी जान कभी नहीं बच सकती. वहां न कोई चिकित्सक आता है और न ही किसी तरह की दवाईयां उपलब्ध है. हम 60 किलोमीटर दूर से अपनी मां को इलाज के लिए यहां लेकर आए हैं."

जेई और एईएस से होने वाली मौत को लेकर प्रकाशित हो रही खबरों से नाराज़ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी कहते हैं कि मौत के आंकड़े दोनों बीमारी में अलग-अलग हैं. वो कुछ मीडिया वालों पर आरोप लगाते है कि सभी मौतों को जेई से हुई मौत बताकर लोगों में झूठी जानकारी फैलाई जा रही है.

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जबकि इन जिम्मेदार अधिकारियों के पास मौजूद रिपोर्ट होने के बाद भी इनके डेटा आपस में मेल नहीं खाते. उदाहरण के तौर पर असम मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल के मेडिसिन विभाग के एक चिकित्सक से कई बार पूछने के बाद भी वो अनीता तांती की मौत का कारण जापानी इंसेफेलाइटिस को बताते हैं लेकिन डिब्रूगढ़ ज़िला स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त निदेशक के पास मौजूद रिपोर्ट के अनुसार अनीता की मौत डेंगू से बताई गई है. डेंगू को एईएस के भीतर ही पकड़ा जाता है.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार असम में जापानी इंसेफ़िलाइटिस से साल 2013 में 134 लोगों की मौत हो गई थी. जबकि 2014 में 165 लोगों की, 2015 में 135 लोगों की, 2016 में 92 लोगों की, 2017 में 87 लोगों की, 2018 में 94 लोगों की और इस साल अबतक 49 लोगों की मौत हो चुकी है. केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी बीते कुछ दिनों से जिस तत्परता के साथ सक्रिय हुए है उससे साफ दिख रहा है कि जुलाई और अगस्त महीनों में असम में जापानी इंसेफ़िलाइटिस के प्रकोप को कम करना काफ़ी चुनौती का काम होगा.

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