चंद्रयान-2: चांद के दक्षिणी धुव्र पर उतरने वाला पहला स्पेसक्राफ्ट

  • 14 जुलाई 2019
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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

चंद्रयान-1 की कामयाबी के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) चंद्रयान-2 के जरिए फिर इतिहास रचने की ओर बढ़ रहा है.

चन्द्रयान-2 को आंध्र प्रदेश के श्रीहरीकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 15 जुलाई, 2019 के पहले पहर 02:15 बजे लॉन्च किया जाएगा.

इस मिशन की ख़ास बात ये है कि ये चंद्रयान उस जगह पर जाएगा जहां अब तक कोई देश नहीं गया है. चंद्रयान चांद के दक्षिणी धुव्र पर उतरेगा.

इस इलाक़े से जुड़े जोखिमों के कारण कोई भी अंतरिक्ष एजेंसी वहां नहीं उतरी है. अधिकांश मिशन भूमध्यरेखीय क्षेत्र में गए हैं जहां दक्षिण धुव्र की तुलना में सपाट जमीन है.

वहीं, दक्षिणी ध्रुव ज्वालमुखियों और उबड़-खाबड़ जमीन से भरा हुआ है और यहां उतरना जोखिम भरा है.

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सबसे पहला उद्देश्य

मिशन का प्राथमिक उद्देश्य चांद की सतह पर सुरक्षित उतरना या कहे कि धीरे-धीरे आराम से उतरना (सॉफ्ट-लैंडिंग) और फिर सतह पर रोबोट रोवर संचालित करना है.

इसका मकसद चांद की सतह का नक्शा तैयार करना, खनिजों की मौजूदगी का पता लगाना, चंद्रमा के बाहरी वातावरण को स्कैन करना और किसी न किसी रूप में पानी की उपस्थिति का पता लगाना होगा.

इस तरह भारत पूर्व सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमरीका और चीन के बाद यहां उतरने वाला और सतह पर रहकर चांद की कक्षा, सतह और वातावरण में विभिन्न प्रयोगों का संचालन करने वाला चौथा राष्ट्र बन जाएगा.

इस प्रयास का उद्देश्य चांद को लेकर हमारी समझ को और बेहतर करना और मानवता को लाभान्वित करने वाली खोज करना है.

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Image caption चंद्रयान-2 की तैयारी में लगे इसरो के वैज्ञानिक

मिशन की जरूरत

चंद्रयान 1 की खोजों को आगे बढ़ाने के लिए चंद्रयान-2 को भेजा जा रहा है. चंद्रयान-1 के खोजे गए पानी के अणुओं के साक्ष्यों के बाद आगे चांद की सतह पर, सतह के नीचे और बाहरी वातावरण में पानी के अणुओं के वितरण की सीमा का अध्ययन करने की जरूरत है.

इस मिशन पर भेजे जा रहे स्पेसक्राफ्ट के तीन हिस्से हैं- एक ऑर्बिटर, एक लैंडर (नाम विक्रम, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक कहलाने वाले विक्रम साराभाई के नाम पर है) और एक छह पहियों वाला रोबोट रोवर (प्रज्ञान). ये सभी इसरो ने बनाए हैं.

इस मिशन में ऑर्बिटर चांद के आसपास चक्कर लगाएगा, विक्रम लैंडर चांद के दक्षिणी धुव्र के पास सुरक्षित और नियंत्रित लैंडिंग करेगा और प्रज्ञान चांद की सतह पर जाकर प्रयोग करेगा.

यह लैंडर इसी साल 6 सितंबर को चांद के दक्षिणी धुव्र के पास दो ज्वालामुखियों मैनज़ीनस सी और सिमपेलियस एन के बीच में ऊंची सपाट जगह पर उतरेगा. रोवर इस इलाक़े में पृथ्वी के 14 दिनों (एक लुनर डे) तक जांच और प्रयोग करेगा. ऑर्बिटर का मिशन एक साल तक के लिए जारी रहेगा.

इस मिशन के लिए भारत के सबसे ताकतवर 640 टन के रॉकेट जीएसएलवी एमके-3 का इस्तेमाल होगा. यह 3890 किलो के चंद्रयान-2 को लेकर जाएगा. स्पेसक्राफ्ट 13 भारतीय और एक नासा के वैज्ञानिक उपकरण लेकर जाएगा. इनमें से तीन उपकरण आठ ऑर्बिटर में, तीन लैंडर में और दो रोवर में होंगे.

इसके अलावा चंद्रयान-2 चांद पर अशोक चक्र और इसरो के प्रतीक की छाप छोड़कर आएगा. इसरो के अध्यक्ष के मुताबिक रोवर के एक पैर पर अशोक चक्र और दूसरे पर इसरो का प्रतीक छपा हुआ है जो उसके चलने के दौरान चांद पर छप जाएंगे.

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दक्षिणी धुव्र पर ही लैंडिंग क्यों?

कोई यह पूछ सकता है कि जोखिम होने पर भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास ही चंद्रयान क्यों उतरा जा रहा है और चांद में खोज के लिए जाने वाले मिशन के लिए ये ध्रुव महत्वपूर्ण क्यों बन गए हैं.

दरअसल, चंद्रमा का दक्षिणी धुव्र एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी अभी तक जांच नहीं की गई. यहां कुछ नया मिलने की संभावना हैं. इस इलाके का अधिकतर हिस्सा छाया में रहता है और सूरज की किरणें न पड़ने से यहां बहुत ज़्यादा ठंड रहती है.

वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि हमेशा छाया में रहने वाले इन क्षेत्रों में पानी और खनिज होने की संभावना हो सकती है. हाल में किए गए कुछ ऑर्बिट मिशन में भी इसकी पुष्टि हुई है.

पानी की मौजूदगी चांद के दक्षिणी धुव्र पर भविष्य में इंसान की उपस्थिति के लिए फायदेमंद हो सकती है. यहां की सतह की जांच ग्रह के निर्माण को और गहराई से समझने में भी मदद कर सकती है. साथ ही भविष्य के मिशनों के लिए संसाधन के रूप में इसके इस्तेमाल की क्षमता का पता चल सकता है.

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चांद पर इतना फोकस क्यों?

स्टीफन हॉकिंग ने एक बार कहा था, "मुझे लगता है कि अंतरिक्ष में जाए बिना मानव प्रजाति का कोई भविष्य नहीं होगा." सभी ब्रह्माण्डीय पिंडों में से चंद्रमा हमारे सबसे नजदीक है. यहां पर और गहरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए ज़रूरी तकनीकों का ज़्यादा आसानी से परीक्षण हो सकता है.

ऐसे ही कुछ फायदों के कारण चंद्रमा पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया गया है.

(लेखक ने 1972 में अमरीकी यूनिवर्सिटी डेट्रॉइट से केमिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी की है. उनका अकादमिक और कॉरपोरेट जगत में 42 साल का अनुभव है. उनके दो दर्जन तकनीकी पेपर, रिपोर्ट और एक साइंस बुक 'ट्रैवल बेयॉन्ड द अर्थ- रीचिंग द मून' प्रकाशित हो चुके हैं.)

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