भारत का नाम रोशन करने वाले वैज्ञानिक की गुमनामी

  • 17 जुलाई 2019
ये शख़्स थे शंकर आबाजी भिसे, जो 19वीं सदी के एक अग्रणी भारतीय आविष्कारक थे.
Image caption शंकर आबाजी भिसे जो 19वीं सदी के एक अग्रणी भारतीय आविष्कारक थे.

उनके देशवासी उन्हें प्रसिद्ध अमरीकी आविष्कारक के नाम पर "भारतीय एडिसन" कहते थे.

अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का मानना था कि उनके खोजें वैश्विक प्रिटिंग उद्योग में क्रांति ला देंगी. उन्हें अपने समय के अग्रणी भारतीय राष्ट्रवादियों का सहयोग और प्रशंसा मिली थी.

ये शख़्स थे शंकर आबाजी भिसे, जो 19वीं सदी के एक अग्रणी भारतीय आविष्कारक थे. लेकिन, उन्हें आज भुला दिया गया है.

क्या था उनका सफ़र और क्यों खो गई उनकी पहचान?

भिसे को उस वक़्त प्रसिद्धि मिली जब भारत में उभरते वैज्ञानिकों, अन्वेषकों और इंजीनियर्स के लिए मुश्किल ही कोई संस्थान था.

उन्होंने खुद से ही प्रशिक्षण लिया था और गुमनामी से उभर रहे थे. हालांकि, अपनी मौत के बाद वो फिर उसी गुमनामी में चल गए.

कई दशक पहले भिसे ने ब्रुकलिन न्यूजपेपर से कहा था, ''उस अमरीकी मैगजीन से मैकेनिक्स पर मिली सभी जानकारियों का मैं बेहद अहसानमंद हूं.''

उन्होंने बॉम्बे (वर्तमान में मुंबई) में एक साइंटिफ़िक क्लब खोला था और 20 साल की उम्र तक वो गेजेट और मशीनें बनाने लगे थे जिनमें टैंपर-प्रूफ बोतल, इलैक्ट्रिकल साइकिल कॉन्ट्रासेप्शंस, बॉम्बे की उपनगरीय रेलवे प्रणाली के लिए एक स्टेशन संकेतक शामिल थे.

उन्हें 1890 में जाकर बड़ी कामयाबी मिली जब उन्होंने ब्रिटिश इंवेंटर्स जनरल द्वारा आयोजित एक प्रतियोगिता के बारे में सुना. इस प्रतियोगिता में सामान तोलने के लिए वेइंग मशीन बनानी थी.

Image caption भिसोटाइप मशीन

जब लंदन गए

भिसे को प्रतियोगिता से पहले एक सुबह वेटिंग मशीन के डिजाइन का आइडिया आया. उन्होंने मशीन का डिजाइन तैयार किया और ब्रिटेन के सभी उम्मीदवारों को हराकर प्रतियोगिता जीत ली.

इसके बाद बॉम्बे प्रशासन का ध्यान इस उभरते भारतीय आविष्कारक पर गया. उन्होंने लंदन जाकर निवेशक ढूंढ़ने की भिसे की इच्छा का सहयोग किया.

भिसे ने बॉम्बे में अपने दोस्तों के सामने संकल्प लिया था कि तब तक "घर वापस नहीं आऊंगा जब तक मैं सफल न हो जाऊं या अपना आख़िरी पाउंड तक ख़र्च न कर दूं." यहीं से भिसे के असाधारण करियर की शुरुआत हुई.

वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बॉम्बे आधारित सचिव दिनशा वाचा से लेटर ऑफ़ इंट्रोडक्शन लेकर लंदन पहुंचे.

एक राजनीतिक संस्थान में पद संभालने के साथ-साथ वाचा एक कुशल कारोबारी भी थे. साथ ही वो तकनीकी प्रतिभा को महत्व भी देते थे.

लंदन में भिसे ने वाचा से मिले पत्र को दादाभाई नरोजी को दिया. नरोजी भिसे की बढ़ती हुई अंतरराष्ट्रीय पेटेंट सूची को देखकर प्रभावित हुए. उन्होंने भिसे के साथ एक समझौता करने के बाद उन्हें भारतीय राष्ट्रवादी एजेंडे पर सूची दी.

उत्तरी लंदन में भिसे ने ठंड और नमी से भरी एक प्रयोगशाला में काम करना शुरू कर दिया.

लगातार किए अविष्कार

उन्होंने एक इलेक्ट्रॉनिक साइनबोर्ड डिजाइन किया जिसे लंदन में क्रिस्टल पैलेस में प्रदर्शित किया गया. साथ ही इसे सेंट्रल लंदन, वेल्स और संभवता पेरिस के स्टोर्स में भी रखा गया.

उन्होंने दादभाई नोरोजी को अपने अविष्कारों के बारे में बताया जिनमें किचन गैजेट, एक टेलिफोन, सिरदर्द ठीक करने वाली एक डिवाइस और एक अपने आप फ्लश होने वाला टॉयलेट था.

भिसे ने 1905 में एक पेटेंट की गई प्रोटोटाइप पुश-अप ब्रा, एक "बस्ट इंप्रूविंग डिवाइस" बनाई. हालांकि, संकोच के चलते उन्होंने दादभाई नोरोजी को इनके बारे में नहीं बताया.

लेकिन, भिसे की सबसे महत्वपूर्ण खोज प्रिंटिंग से जुड़ी थी. एक भिसोटाइप, एक टाइपकास्टर जो प्रिंटिंग उद्योग में क्रांति लाने वाला था.

यह बहुत ही सस्ती और जल्दी बन जाने वाली तकनीक थी जिसका इस्तेमाल किताबों और अख़बारों की छपाई के लिए होता था. यह मशीन से बहुत तेजी और ज्यादा कुशलता के साथ छपाई होती थी.

इस वक़्त पर नोरोजी ने भिसे से कहा कि उन्हें और ज़्यादा पैसा लगाने वाले निवेशकों की जरूरत है. उन्होंने भिसे को अपने दोस्त और 'ब्रितानी समाजवाद के जनक' हैनरी हिंडमैन के पास भेजा.

हिंडमैन कार्ल मार्क्स के शिष्य थे और भारतीय उपनिदेशवाद को लेकर ब्रिटेन के कड़े आलोचक थे. पूंजीवादी विरोधी हिंडमैन खुद एक प्रसिद्ध कारोबारी थे जिनके प्रिंटिंग उद्योग में अच्छे संपर्क थे. उन्होंने भिसोटाइप के लिए 15 हजार पाउंड जुटाने का वादा किया.

यहीं से भिसे के लिए मुश्किलें खड़ी हो गईं.

Image caption स्प्रिट टाइपराइटर के लिए भिसे की पेटेंट एप्लिकेशन

छूट गया एक बड़ा मौका

हिंडमैन से मिले वादे के बाद भिसे ने प्रिंटिंग उद्योग की जानीमनी कंपनी लिनोटाइप की एक पेशकश को ठुकरा दिया. कंपनी ने उनके बिशोटाइप को खरीदने की पेशकश की थी लेकिन उन्हें हिंडमैन के वादे पर पूरा भरोसा था.

लेकिन, 1907 में हिंडमैन को लगा कि वो भिसे के लिए पैसा इकट्ठा नहीं कर पाएंगे. अगले साल तक नोरोजी के फंड भी ख़त्म हो रहे थे.

दिसंबर 1908 में फंड ख़त्म होने के कारण भिसे को मायूसी के साथ अपना काम रोककर बॉम्बे वापस लौटना पड़ा. वो वाकई अपने संकल्प के मुताबिक 'आख़िरी पाउंड तक ख़र्च करके' लौट रहे थे.

बॉम्बे आकर उन्हें एक और झटका लगा.

भिसोटाइप को नहीं मिली पहचान

बॉम्बे आते वक़्त उनके साथ स्टीमर में प्रमुख कांग्रेसी नेता गोपाल कृष्ण गोखले थे. वो भिसे के टाइपकास्टर को देखकर हैरान रह गए.

गोखले ने बॉम्बे में टाटा समूह के रतन जी टाटा से संपर्क किया और भिसे के लिए फंड जुटाए. हालांकि, 1917 तक टाटा समूह का ये फंड भी ख़त्म हो गया लेकिन इससे भिसे को अमरीका में करियर बनाने का मौका मिला.

भिसे कभी अपने भिसोटाइप की अच्छी तरह मार्केटिंग नहीं कर पाए. हालांकि, न्यूयॉर्क में उन्होंने अपने आयोडीन सॉल्यूशन के चलते काफ़ी पैसे कमाए.

अपने अंतिम सालों में भिसे ने विज्ञान से अलौकिक शक्ति की ओर रुख किया. 'स्प्रिट टाइपराइटर' उनकी आख़िरी खोजों में से एक थी. यह एक उन्नत वीजा बोर्ड था. भिसोटाइप की असफलता इस भारतीय एडिसन के करियर का एक संदिग्ध अंत था. उनकी गुमनामी की भी शायद यही वजह थी.

फिर भी उनकी विरासत का एक पहलू याद रखने लायक है.

इस दुनिया से जाने तक भिसे ने अपने पूर्व निवेशकों द्वारा पैदा की गई उपनिवेशवाद विरोधी भावना को जीवित रखा.

लंदन में वो कई विरोध प्रदर्शनों और साभाओं में नोरोजी और हिंडमैन के साथ रहे. न्यूयॉर्क में उन्होंने गांधी के विचारों का समर्थन किया और भारतीय राष्ट्रवादियों का स्वागत किया.

भिसे ने भारत से लेकर ब्रिटेन और अमरीका तक प्रगतिशील राजनीति को विज्ञान के साथ मिला दिया.

(दिनयार पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ केरोलिना में इतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं.)

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