असम में बाढ़ का कहर, क्या है वहां की स्थिति?

  • 15 जुलाई 2019
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भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम में बाढ़ के कारण 3181 गांव पानी में डूब गए हैं. बाढ़ से उत्पन्न स्थिति की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए बचाव कार्य के लिए कई जगहों पर सेना की मदद ली जा रही है.

असम राज्य आपदा प्रबंधन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार इस समय प्रदेश के 28 ज़िले बाढ़ की चपेट में हैं और 26 लाख 45 हज़ार 533 लोग प्रभावित हुए हैं. कई नए इलाक़ों में बाढ़ का पानी घुस आने से प्रभावित लोगों की संख्या में भारी इजाफ़ा हुआ है.

रविवार को बाढ़ के पानी में डूबने से चार लोगों की मौत हो गई है. इस तरह पिछले पांच दिन में बाढ़ और भूस्खलन के कारण कम से कम 12 लोगों की मौत हो चुकी है.

आपदा प्रबंधन विभाग की आयुक्त-सचिव अरुणा राजोरिया ने बीबीसी से कहा, "बाढ़ की स्थिति से निपटने के लिए तमाम तरह के उपाए किए जा रहे हैं. फिलहाल बाढ़ से उत्पन्न स्थिति से हम खुद ही निपट रहें हैं. केंद्र सरकार से अभी तक किसी तरह की मदद नहीं मांगी गई है."

"सभी जिला उपायुक्तों को बचाव और राहत सामग्री पर्याप्त मात्रा में देने के निर्देश दिए गए हैं. कई और राहत शिविर खोले गए हैं और दवाईयों का इंतजाम किया गया है. फिलहाल प्रदेश के 327 राहत शिविरों में 16,596 लोगों ने शरण ले रखी है."

वहीं, राहत और बचाव कार्य में जुटी एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीम लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के लिए दिन-रात काम कर रही हैं. ऊपरी असम के जोरहाट निमाती घाट में ब्रह्मपुत्र का पानी अपने ख़तरे के निशान से ऊपर बह रहा है.

जिला प्रशासन ने फिलहाल निमाती घाट से माजुली के अलग-अलग घाट तक चलने वाली नाव सेवाओं को रद्द कर दिया है.

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कई इलाक़ों में टूटे बांध और पुल

बाढ़ के कारण कई इलाक़ों में सरकार द्वारा निर्मित बांध और पुल टूट जाने से स्थिति ज़्यादा गंभीर हो गई है. इस बीच मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को फोन कर राज्य में बाढ़ की ताजा स्थिति के बारे में अवगत कराया है.

मुख्यमंत्री सोनोवाल ने एक ट्वीट कर जानकारी देते हुए लिखा है कि केंद्र सरकार ने इस संकट की घड़ी में राज्य की हर संभव मदद करने का भरोसा दिया है.

बाक्सा ज़िले के बालीपुर चर गांव में बचाव कार्य के लिए सेना की मदद ली जा रही है.

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गुवाहाटी में तैनात सेना के जनसंपर्क अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल पी खोंगसाई ने बीबीसी से कहा, "बाक्सा जिला उपायुक्त ने बाढ़ प्रभावित इलाके में बचाव कार्य के लिए सेना की मदद मांगी थी. जिसके तहत हमारे जवानों ने बाढ़ के पानी में फंसे करीब डेढ़ सौ लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला है."

"हमने अपनी सेना को अलर्ट कर रखा है अगर राज्य सरकार अन्य किसी क्षेत्र में भी हमारी मदद मांगती है तो हम पूरी तरह से तैयार है."

असम के कुल 33 जिलों में से 28 जिले इस समय बाढ़ की चपेट में आ गए हैं. राज्य में गोलाघाट ज़िले का मीठाम चापोरी गांव एक ऐसा इलाक़ा है जहां पिछले साल भयंकर बाढ़ आई थी लेकिन इस बार अभी तक वहां कुछ नहीं हुआ है लेकिन वहां रहने वाले लोग काफी डरे हुए हैं.

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40 साल के मंटू मंडल का घर धनश्री नदी के बिल्कुल पास है. नदी और मंटू के घर के बीच की दूरी किसी को भी भयभीत कर सकती है.

असम में बाढ़ की ख़बर से मंटू का पूरा परिवार परेशान है. वो कहते हैं, "रोजाना अख़बार में बाढ़ से हो रही तबाही की ख़बर पढ़कर घबराहट होने लगती है. राज्य में सभी नदियों का पानी लगातर बढ़ रहा है. लेकिन धनश्री नदी में अभी ज्यादा पानी नहीं हुआ है. मैं रोज सुबह जल्दी उठकर नदी में पानी का स्तर देखता हूं. पता नहीं कब अचानक नदी में पानी आ जाए."

मंटू के घर के सामने से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बनी एक पक्की सड़क निकलती है जो महज 30 मीटर आगे जाकर धनश्री नदी में ख़त्म हो जाती है. ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में से एक धनश्री के किनारे अब केवल पांच परिवार रहते हैं. अधिकतर लोग इस जगह को छोड़कर जा चुके हैं लेकिन इन पांच परिवारों के पास दूसरी कोई जमीन नहीं है, इसलिए वो वहीं रहने को मजबूर हैं.

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'1986 के बाद सबसे भयंकर बाढ़'

दरअसल, असम के गोलाघाट जिले का मीठाम चापोरी नामक यह गांव पिछले साल बाढ़ की सबसे बड़ी तबाही झेल चुका है. गांव के कुछ बुजुर्ग बताते है कि 1986 के बाद इतनी भयंकर बाढ़ कभी नहीं आई.

अपनी 72 साल की बुढ़ी मां के पास आंगन में खड़े मंटू कहते है, "हमारा परिवार मीठाम चापोरी गांव में पिछले 60 सालों से बसा है. एक समय था जब हमारे पास 36 बीघा जमीन हुआ करती थी लेकिन बाढ़ और भूमि कटाव ने सबकुछ तबाह कर दिया."

अपने बेटे की ये बातें सुनकर पूर्ण लखी रोने लगती हैं. कुछ देर बाद अपने आंसुओं को पोंछती हुई धीमी आवाज में कहती हैं, "हमारे घर के पीछे जो नदी आप देख रहे हो वो पहले कई किलोमीटर दूर हुआ करती थी. हमारे पास इस गांव में सबसे ज्यादा जमीन थी."

"केवल खेती से ही हमारा परिवार काफी अच्छा चलता था लेकिन अब हम लोगों की हालत रास्ते के भिखारी की तरह हो गई है. मेरे तीन बेटे इस जगह को छोड़कर चले गए हैं. अगर सरकार ने भूमि कटाव को रोकने के लिए नदी किनारों पर बांध बांधा होता तो शायद आज हमारी यह हालत न हुई होती."

असम में बाढ़ और भूकटाव ने केवल मंटू के परिवार को ही तबाह नहीं किया है बल्कि ऐसे सैकड़ों परिवार हैं जो भूमि कटाव के कारण अपनी जमीन गंवा चुके हैं. 1950 से अब तक यहां करीब 25 बड़े सैलाब आ चुके हैं.

जलवायु परिवर्तन के चलते यहां बाढ़, मिट्टी के कटाव और भूकंप का खतरा हर वक्त मंडराता रहता है. ऐसे परिवार जो पीढ़ियों से आजीविका के लिए खेती करते आ रहे है अब मिट्टी के कटाव के कारण बेघर होते जा रहे हैं.

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अनंत अपनी बुढ़ी मां, पत्नी, एक बहन और दो बच्चों के साथ मीठाम चापोरी गांव में रहते हैं और ठीक उनके घर के पीछे धनश्री नदी बहती है.

सरकार की मदद के बारे में पूछने पर अनंत कहते हैं, "सरकार के लोग बाढ़ के दौरान राहत के नाम पर चावल, आटा, नमक देने आते हैं और बाद में ख़बर तक नहीं लेते. पक्का मकान और खेत कटाव में चले गए हैं."

"हमारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा? हमने सरकारी जमीन के लिए आवेदन कर रखा है लेकिन कोई सुनवाई नहीं है. ज़िला प्रशासन के लोग कहते हैं कि अभी नदी ने आपका घर तोड़ा नहीं है. इसका क्या मतलब हुआ, जब घर समेत हमारा पूरा परिवार पानी में डूब जाएगा, तब कोई कार्रवाई होगी?"

दरअसल, असम में हर साल बाढ़ के कारण भारी तबाही होती है लेकिन सरकार की तरफ से पीड़ितों को उनकी आवश्कता के अनुसार मदद नहीं मिलती जिसके कारण उनकी हालात ख़राब हो जाते हैं.

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