यमुना एक्सप्रेस वे क्यों बनता जा रहा है हादसों का एक्सप्रेस वे

  • 17 जुलाई 2019

''आख़िरी बार जब पापा से बात हुई तो वे काफ़ी खुश थे.उन्होंने और मम्मी ने ज़िद की कि मैं उन्हें बस अड्डे लेने ऊं. पापा का जन्मदिन आने वाला था. वो हर रोज़ मुझे दिन गिनाते और पूछते मेरे बर्थडे पर क्या करेगा. मैं हंस कर कहता- अच्छे से सेलिब्रेट करूंगा. मुझे यक़ीन नहीं हो रहा कि पापा कभी नहीं मिलेंगे. नहीं बता सकता ये कितना मुश्किल है...''

रंजन शर्मा ये कहते-कहते अपनी रुंधी हुई आवाज़ को रोक लेते हैं और हमारे बीच एक काली-गहरी उदासी फैल जाती है.

आठ जुलाई को रंजन के पिता सत्य प्रकाश, पत्नी मंजू शर्मा के साथ उत्तर प्रदेश परिवहन की बस से लखनऊ से दिल्ली आ रहे थे लेकिन यमुना एक्सप्रेस वे पर इस बस का एक्सीडेंट हो गया, जिसमें 29 लोगों की मौत हो गई. मरने वालों में रंजन के पिता भी थे और उनकी मां इस वक़्त अस्पताल में भर्ती हैं.

Image caption रंजन शर्मा ने आठ जुलाई को हुए बस हादसे में अपने पिता को खोया है

वर्ष 2012 में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जब इस एक्सप्रेस वे का उद्धाटन किया तो कहा गया कि इससे आगरा से दिल्ली की दूरी ढाई घंटे में नाप ली जाएगी.

लेकिन इस दूरी को नापने निकले कई लोगों में से कुछ कभी अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच सके.

एक आरटीआई के जवाब के मुताबिक़ एक्सप्रेस वे पर अगस्त 2012 से लेकर जनवरी 2018 तक 5000 एक्सीडेंट हुए और 700 से ज़्यादा लोगों की इन हादसों में मौत हुई. लगभग 2000 लोग इन एक्सीडेंट में गंभीर रूप से घायल हुए.

क्यों हो रहे हैं हादसे

इस एक्सप्रेस-वे पर जब बीबीसी की टीम ये जानने पहुंची कि आख़िर क्यों इतनी जानें जा रही हैं, तो सामने आईं इंजीनियरिंग से जुड़ी ऐसी गड़बड़ियां, जो रोड एक्सीडेंट को और घातक बना सकती हैं.

जब हमने इस मामले में यमुना एक्सप्रेस वे अथॉरिटी से संपर्क किया तो हमें ईमेल का कोई जवाब नहीं मिला, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह ने बीबीसी को बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जेपी कंस्ट्रक्शन (एक्सप्रेस वे बनाने वाली कंपनी) को निर्देश दिया है कि वह अगर टोल वसूलते हैं तो वहां नियमों और कायदों का भी पालन करें.

जेपी नियमों को तोड़ने वाले ड्राइवरों का चालान काटती है, चालान की राशि भी बढ़ा दी गई है.

Image caption यमुना एक्सप्रेस वे से क्षतिग्रस्त कार को ले जाती क्रेन

लेकिन हमने इस एक्सप्रेस वे पर सफ़र के दौरान जो देखा, वो इन दावों से बिल्कुल मेल नहीं खाता.

  • यहां डिवाइडर पर किसी तरह के सेफ़्टी बैरियर नहीं दिए गए हैं. अगर गाड़ी का संतुलन बिगड़ता है तो वह आसानी से डिवाइडर पर चढ़ सकती है.
  • जब भी कोई कार/बस चल रही होती है तो उसमें कायनैटिक एनर्जी होती है. अगर ये गाड़ियाँ एक्सप्रेस-वे पर कंक्रीट से बनी चीज़ों से टकराती हैं तो इस कायनैटिक एनर्जी के कारण ज़ोरदार इंपैक्ट पड़ता है.
  • यहां हादसे ज्यादातर तेज़ गति और टायर फटने के कारण होते हैं. लेकिन तेज़ गति को नियंत्रित करने की कोई ढंग की कोशिश कहीं नहीं दिखी.

एक बेहद अहम बात है कि एक्सप्रेस वे के शोल्डर यानी किनारों पर रंबल स्ट्रैप होना चाहिए ताकि अगर कोई गाड़ी किनारों की तरफ़ जाए तो रंबल स्ट्रैप के कारण आवाज आए और ड्राइवर समय रहते संभल सके. ज़्यादातर एक्सीडेंट में थकान के कारण ड्राइवर सो जाता है ऐसे में ये रंबल स्ट्रैप उन्हें बचाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन हैरानी की बात ये है कि एक भी जगह ऐसी रंबल स्ट्रैप नहीं दी गई है.

सड़क पर सुरक्षा के मामलों में लंबे समय से काम कर रही संस्था सेव लाइफ़ फ़ाउंडेशन के प्रमुख पीयूष तिवारी इस सफ़र पर हमारे साथ थे.

जब हमने उनसे ये पूछा कि क्या कोई तय मानकों का पालन एक्सप्रेस वे बनाते समय किया जाता है, तो उन्होंने बताया, ''ऐसे कोई भी तय मानक नहीं हैं जिन्हें एक्सप्रेस वे पर लागू किया जा सके. इस वक़्त जो गाइडलाइन फॉलो हो रही हैं वो इंडियन रोड कांग्रेस की गाइडलाइन हैं जो 80 के दशक की हैं. ये बात सही है कि एक्सप्रेस वे नेशनल हाइवे के मुक़ाबले बेहतर तरीक़े से बनाए जाते और इसकी वजह पीपीपी मॉडल, फॉरेन फंडिंग होती है. लेकिन कई बेहद ज़रूरी बातों को इसमें नज़रअंदाज़ किया जा रहा है. जैसे खुले हुए सीमेंट की बनावटें, रंबल स्ट्रैप का नहीं होना.''

Image caption लाइफ़ फ़ाउंडेशन के प्रमुख पीयूष तिवारी

6 लेन वाले इस एक्सप्रेस वे पर दूर-दूर तक कोई पेट्रोलिंग गाड़ी नज़र नहीं आई जो दुर्घटना के वक़्त कोई सहायता दे सके या गति सीमा से तेज़ चल रही गाड़ी को चेतावनी दे या उन पर जुर्माना लगाए.

एक्सीडेंट के सबसे आम कारण

पीयूष मानते हैं कि इस सड़क पर हादसे की सबसे आम तीन वजहें हैं-

  • ओवर स्पीड- ज्यादातर एक्सीडेंट में गाड़ी की स्पीड ज्यादा रहने की बात सामने आती है, ऐसे में गाड़ी का टायर फटता है तो काबू असंभव हो जाता है और एक्सीडेंट होता है.
  • ज़िग ज़ैग ड्राइविंग- कई बार अचानक से लेन बदलना, ग़लत साइड पर गाड़ी चलाना और अचानक गाड़ी को बीच में रोक देने से पीछे आने वाली गाड़ियों से हादसा होने की आशंका प्रबल हो जाती है.
  • ड्राइवर की थकान- ट्रक और बस चलाने वाले ड्राइवर ज़्यादातर थके होते हैं, वे काफ़ी लंबा सफ़र तय करते हैं, ध्यान रखने वाली एक बात है कि जो भी रेस्टिंग प्वाइंट बने हैं वो छोटी गाड़ियों के लिए बने हैं, कार चालक पैसे देकर इसका फ़ायदा ले सकते हैं लेकिन बड़े वाहन चलाने वालों के लिए ये सुविधा नहीं है.

हाल ही में हादसों को देखते हुए केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि टायरों में सिलिकॉन का इस्तेमाल अनिवार्य किया जा सकता है ताकि इनमें नाइट्रोजन भरी जा सके.

दरअसल नाइट्रोजन एक कूलिंग एजेंट है, टायर में नाइट्रोजन भरते हैं तो ये टायर को ठंडा रखने में मदद करता है. लेकिन अगर आप नाइट्रोजन नहीं भरा सकते तो टायरों के मेटेंनेंस पर खास ध्यान दें.

30 साल पुराने मोटर वीकल बिल बदलना क्यों ज़रूरी

वर्तमान समय में चल रहा मोटर वीकल एक्ट 1988 को बदले जाने की ज़रूरत है और मोटर वीकल एमेंडमेंट बिल 2017 को पास करना चाहिए. इससे एक्सीडेंट को रोकने में मदद मिल सकती है. क्योंकि इसमें इंजीनियरिंग से जुड़े कुछ प्रावधान हैं, सबसे अहम बात इसमें बच्चों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान भी दिए गए हैं.

पीयूष कहते हैं, ''इन सबसे ज्यादा ज़रूरी है ह्यूमन इंफोर्समेंट, यानी इंसानों की मौजूदगी. उसके लिए एक पेट्रोलिंग सिस्टम की ज़रूरत है. शराब पी कर अगर कोई गाड़ी चला रहा है तो इसके लिए कोई फुल ऑटोमेडेट तकनीक काम नहीं करेगी इसके लिए इंसानों की मदद लेनी पड़ेगी.''

''इस मामले में मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे काफ़ी बेहतर है, यहां मुंबई पुलिस 120 गार्ड की मदद से नियमों का पालन करवा रही हैं. उस एक्सप्रेस वे पर पीछे बैठने वाले को भी सीट बेल्ट पहनना अनिवार्य है. तकनीक, इंजीनियरिंग और गार्ड की मदद से यहां हादसों की संख्या में 27 फ़ीसदी कमी आई है.''

165 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस पर पेट्रोलिंग नहीं

जब हम इस एक्सप्रेस वे पर सफ़र कर रहे थे तो हमने देखा कि किसी भी तरह के इमरजेंसी मदद के लिए कोई तैयारी नहीं है. एक भी पेट्रोलिंग करती गाड़ी नज़र नहीं आई, जो कोई हादसा होने पर तुरंत सहायता दे सके. ना ही कोई ऐसा साइन बोर्ड दिखा, जिससे कोई फ़ंसा हुआ व्यक्ति 165 किलोमीटर फैले इस एक्सप्रेस वे पर अपनी लोकेशन की ठीक जानकारी दे सके.

पीयूष कहते हैं, ''इस मामले में मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे काफ़ी बेहतर है, यहां मुंबई पुलिस 120 गार्ड की मदद से नियमों का पालन करवा रही हैं. उस एक्सप्रेस वे पर पीछे बैठने वाले को भी सीट बेल्ट पहनना अनिवार्य है. तकनीक, इंजीनियरिंग और गार्ड की मदद से यहां हादसों की संख्या मं 27 फ़ीसदी कमी आई है.''

30 साल पुराना मोटर वीकल एक्ट बदलना ज़रूरी

पीयूष तिवारी मानते हैं कि वर्तमान समय में चल रहा मोटर वीकल एक्ट 1988 को बदले जाने की ज़रूरत है और मोटर वीकल एक्ट 2017 को पास करना चाहिए. इससे एक्सीडेंट को रोकने में मदद मिल सकती है.

लेकिन इन सबसे ज्यादा ज़रूरी है ह्यूमन इंफोर्समेंट, यानी इंसानों की मौजूदगी. उसके लिए एक पेट्रोलिंग सिस्टम की ज़रूरत है. शराब पी कर अगर कोई गाड़ी चला रहा है तो इसके लिए कोई फुल ऑटोमेडेट तकनीक काम नहीं करेगी इसके लिए इंसानों की मदद लेनी पड़ेगी.

आप किन बातों का रखें ख़्याल

  • किसी भी लंबे सफ़र पर जाने से पहले गाड़ी की स्थिति सफ़र के अनुकूल है या नहीं ये जांच लें. ज्यादातर लोग गाड़ी को खूबसूरत रखते हैं लेकिन उसके इंजन-टायर की देखभाल पर ध्यान नहीं देते, लेकिन टायर ठीक हैं या नहीं ये सबसे पहले देखना चाहिए.
  • गाड़ी में बैठे सभी लोग सीट बेल्ट जरूर लगाएं. जानकार मानते हैं कि अगर एक भी शख्स सीट बेल्ट ना लगाए, तो वो सबकी मौत का कारण बन सकता है. क्योंकि एक्सीडेंट की दशा में वो एक पत्थर की तरह काम करता है और साथ बैठे लोगों को चोटिल कर सकता है.
  • इस बात का ख्याल रखें कि आपके आगे चलने वाली गाड़ी के बीच 3 सकेंड का अंतर हो. तेज़ स्पीड गाड़ियों को ब्रेक के बाद रुकने में इतना वक्त लगता है.
  • एक्सप्रेस वे पर गाड़ियों को रुकने के लिए शोल्डर एरिया दिया जाता है. ग़लती से भी उस पर ना चढ़ें और उसका इस्तेमाल ओवरटेक करने के लिए ना करें.

सरकार क्या कर सकती है

  • जानकार मानते हैं कि हमारे देश में इंजीनीयरिंग के मानक बेहद ख़राब हैं. नए मोटर वीकल एमेंडमेंट बिल के आने से इसमें सुधार होगा. दरअसल हम जब भी कुछ बनाते हैं तो ये मानते है कि कुछ प्रतिशत तो ह्यूमन एरर होगा ही तो सारा फ़ोकस इस बात पर होना चाहिए कि कैसे उस स्थिति से निपटा जाए.
  • मौजूदा रोड का समरी ऑडिट किया जाए, जिसमें देखा जाए कि मिडियन में अंतर कितना है, सड़क की हालत कैसी है, कंक्रीट से बनीं खुली बनावटें हैं तो उसे ढँकें.
  • कई बार नियमों की कम जानकारी भी एक्सीडेंट का कारण बन जाती है. ऐसे में ड्राइवरों को ज़रूरी ट्रेनिंग दी जाने की ज़रूरत है ताकि उन्हें लेन, स्पीड से जुड़ी जानकारी हो.
  • जानकार मानते हैं कि सड़क सुरक्षा एक मल्टी एजेंसी मुद्दा है, लाइसेंस परिवहन विभाग के अंतर्गत आता है, इनफ़ोर्समेंट पुलिस के अंतर्गत आता है, सड़कों की इंजीनियरिंग का काम पांच से सात विभागों के अंतर्गत आता है, ट्रॉमा केयर स्वास्थ्य विभाग का मामला है. ये सभी विभागों को एक साथ लाने के लिए एक अथॉरिटी का गठन करना बेहद ज़रूरी है. अमरीका से लेकर श्रीलंका तक जिन देशों ने एक्सीडेंट की संख्या में कमी की है वहां ऐसी अथॉरिटी होती हैं जिनके पास अच्छा स्टाफ़ होता है और इसके पास फैसले लेने की शक्तियां भी होती है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में 400 लोग हर दिन रोड एक्सीटेंड में मरते हैं. रंजन की तरह ही कई लोग अपनों को एक पल में खो देते हैं, ये वक़्त है जब सरकार और लोगों को इसे रोकने के लिए मिलकर काम करना चाहिए.

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