एनआरसी के डर से मूल निवासियों का रजिस्टर बना रहा है नगालैंड?

  • 16 जुलाई 2019
दीमापुर इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma

बिहार के सीतामढ़ी जिले के पुपरी के रहने वाले 37 साल के अजय यादव नगालैंड के दीमापुर शहर में बीते 10 साल से ऑटो रिक्शा चलाकर अपने परिवार का गुज़ारा कर रहे है.

वैसे उन्हें दीमापुर आए 20 साल से भी अधिक समय हो गया है. दिल्ली जैसे देश के अन्य बड़े शहरों को छोड़कर इतनी दूर दीमापुर में ही काम करने क्यों आए?

यह पूछने पर वो कहते है,"कम उम्र में ही यहां चले आए थे इसलिए अब दूसरी जगह एडजस्ट नहीं कर पाते. यहां की आबोहवा दूसरी जगह कहां मिलेगी."

यही कहना था दीमापुर शहर में सालों से लॉन्ड्री की दुकान चला रहे सीताराम का भी.

बिहार के मुजफ्फ़रपुर जिले के एक छोटे से गांव से रोज़ी रोटी की तलाश में आए सीताराम कहते है,"इंदिरा गांधी की मौत (1984) से दो साल पहले हम दीमापुर आए थे और तब से इसी दुकान में धोबी का काम कर रहें है. यहां उम्र बीत गई अब कहां जाएंगे?"

क्यों है ये चिंता

दरअसल नगालैंड के सबसे बड़े शहर और वाणिज्यिक केंद्र माने जाने वाले दीमापुर में इनर लाइन परमिट (आईएलपी) व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया गया है.

इसके साथ ही नगालैंड में मूल निवासियों अर्थात इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने के लिए राज्य सरकार ने एक अधिसूचना जारी की है. ऐसे में कई दशकों से यहां रह रहें खासकर गैर नगा लोगों के सामने कई तरह की परेशानियां खड़ी हो गई है.

नगा समुदाय के 30 से अधिक संगठनों को लेकर बनी सिविल सोसायटी की ज्वॉइंट कमेटी ऑन प्रिवेंशन ऑफ इलीगल इमिग्रेंट (जेसीपीआई) के संयोजक गोखेतो चोपी कहते है," आशंका है कि असम में बन रही एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से जिन लोगों का नाम कट जाएगा, वो हमारे राज्य में प्रवेश कर सकते है."

इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma
Image caption गोखेतो चोपी

"हमने सुना है 40 लाख लोगों का नाम एनआरसी में नहीं है. असम के साथ हमारा बॉर्डर लगता है और वहां से कोई भी इधर आ सकता है."

जेसीपीआई संयोजक तर्क देते है, "नरेंद्र मोदी की सरकार के पास बहुमत है और वो सिटीज़न अमेंडमेंट बिल (CAB) को अगर राज्य सभा से पास करवा लेती है तो बांग्लादेश से आए हिंदू बंगाली हमारे राज्य में घुस सकते हैं. इसलिए नए सिरे से इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाना ज़रूरी हो गया है. इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करनी की ज़िम्मेवारी सरकार होगी. हमारी मांग केवल इतनी है कि सरकार 1 दिसंबर 1963 को कट-ऑफ़ तारीख़ बनाए."

इस तरह की मांग के बाद ग़ैर नगा लोगों को इस बात की चिंता सताने लगी है कि कहीं इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाने के नाम पर उन्हें वर्षों पहले मिला ज़मीन का अधिकार भी न छीन लिया जाए.

इतिहास पर डालनी होगी नज़र

साल 2011 की जनगणना में नागलैंड की जनसंख्या 19 लाख 80 हज़ार 602 दर्ज है जबकि इसी जनगणना में केवल दीमापुर की जनसंख्या 3 लाख 80 हज़ार है जो कि प्रदेश की राजधानी कोहिमा की जनसंख्या से तीन गुना ज्यादा है.

नगालैंड में केवल दीमापुर ही एक मैदानी इलाक़ा है बाक़ी पूरा क्षेत्र पहाड़ी है. और यहां ग़ैर नगाओं की तादाद कुल जनसंख्या का क़रीब 40 फ़ीसदी है.

इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma

दरअसल 1 दिसंबर 1963 में नगालैंड राज्य का गठन होने से पहले दीमापुर असम का हिस्सा था. उस समय राजस्थान, यूपी, बिहार,पंजाब, बंगाल से लेकर बाहरी राज्य से आए लोगों को यहां ज़मीन खरीदने का अधिकार मिला हुआ था.

वहीं नागालैंड में सैकड़ों साल से बसे गोरखा लोगों को इंडिजेनस माना जाता है. लेकिन नगालैंड राज्य गठन होने बाद इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371 ए द्वारा संरक्षित कर दिया गया जिसमें भूमि का मालिकाना हक़ केवल इंडिजेनस लोगों के लिए आरक्षित रखा गया. हालांकि कई सालों तक दीमापुर को 371 ए से बाहर रखा गया.

लेकिन 1979 में नगालैंड विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित कर दीमापुर को भी 371 ए के तहत शामिल कर लिया. लिहाज़ा 1 दिसंबर 1963 से 1979 के बीच जिन ग़ैर नगा लोगों ने दीमापुर में व्यापार या फिर घर के लिए ज़मीन खरीदी थी, उनके सामने ज़मीन से बेदख़ल होने की समस्या खड़ी हो गई है.

क्या फ़र्क पड़ेगा

सालों से दीमापुर में बसे वरिष्ठ वकील अरुण कुमार मिश्रा ने बीबीसी से कहा, "नगालैंड मेरे दादा-परदादा की कर्मभूमि है. मेरे दादा ब्रिटिश आर्मी में नगालैंड में ही थे. मेरे पिता गुप्तेश्वर मिश्रा का जन्म 1935 में कोहिमा में हुआ था. हमारी ज़मीन भी उसी समय की है."

मिश्रा कहते हैं, "पिता जी नगालैंड बनने से पहले असम पुलिस में थे. बाद में उनकी ड्यूटी नगालैंड में लगी थी. अब तक मेरे पिता एकमात्र ग़ैर नगा है जो नगालैंड पुलिस से रिटार्यड हुए."

इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma

उस समय के बसे हुए ग़ैर नगाओं को दिए गए इंडिजेनस प्रमाण पत्र के बारे में जानकारी देते हुए मिश्रा कहते है," दरअसल यह सर्टिफ़िकेट एक स्थायी निवास प्रमाण पत्र होता है."

वह बताते हैं, "इस सर्टिफ़िकेट के होने से केवल दीमापुर में ज़मीन खरीदने-बेचने का अधिकार मिलता है बल्कि अन्य राज्यों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने जाने वाले बच्चों को भी इसकी ज़रूरत पड़ती है. हालांकि नगालैंड में इस तरह के सर्टिफ़िकेट होने पर भी गैर नगा लोगों को सरकारी नौकरी में आवेदन करने का अधिकार नहीं दिया गया है."

जबकि नगालैंड में वोट डालने का अधिकार सभी लोगों को दिया गया है. भले ही वो कुछ साल पहले ही नगालैंड में आकर बसा हो. दीमापुर में बिहार से आकर बसे लोगों की संख्या कुल आबादी के करीब 20 फ़ीसदी बताई जाती है.

नगालैंड भोजपुरी समाज के कार्यकारी अध्यक्ष प्रमोद सिंह कहते है, "यह बात सच है कि आईएलपी और इंडिजेनस सर्टिफ़िकेट जारी करने को लेकर गैर नगा लोग चिंतित है लेकिन घुसपैठ के मूद्दे को लेकर हमारा समाज नगा लोगों के साथ है. क्योंकि यह नगा लोगों की पहचान से जुड़ा मुद्दा है. लेकिन यहां सालों से बसे गैर नगा लोगों के अधिकार भी सुरक्षित होने चाहिए. राज्य सरकार को एक ऐसा मैकेनिज्म तलाशने की ज़रूरत है जिससे यहां बसे वास्तविक नागरिक को कोई दिक्कत न हो. क्योंकि ऐसे काफ़ी लोग है जो 1963 के बाद यहां आकर स्थाई रूप से बसे है."

इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma
Image caption प्रमोद सिंह

अन्य लोग भी परेशान

अजय यादव, सीताराम जैसे बिहार से आकर बसे लोगों को भले ही दीमापुर में 20 से 30 साल हुए है लेकिन इस शहर में गैर नगा लोगों की एक और ऐसी आबादी है जिनका इतिहास सौ साल से भी अधिक पुराना है.

श्री दिगंबर जैन समाज, दीमापुर के अध्यक्ष ओमप्रकाश सेठी कहते है, "पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह नगालैंड में भी अवैध प्रवासन की काफ़ी समस्या है. ऐसे में नगा आइडेंटिटी को सुरक्षित करना बेहद ज़रूरी हो गया है. आईएलपी हो या फिर इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने की बात हो हम इसका समर्थन करते है. लेकिन सरकार को कई पीढ़ियों से यहां बसे गैर नगा लोगों के बारे में भी ध्यान रखने की ज़रूरत है. समाज के लोग पूछते है कि अगर उनका नाम रजिस्टर में शामिल नहीं किया गया तो आगे भविष्य क्या होगा. नगालैंड में हमारी यह तीसरी पीढ़ी है."

वहीं दीमापुर बंगाली समाज के अध्यक्ष एडवोकेट के.के. पाल कहते है,"दीमापुर यहां का एक वाणिज्यिक केंद्र हैं और भारत के करीब हर राज्य के लोग यहां सालों से बसे है. हमारा नगा समुदाय के साथ बहुत पूराना मित्रतापूर्ण सबंध है. बात जहां तक आईएलपी लागू करने की है तो इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि दीमापुर बहुत तेजी से विकसित होता हुआ शहर है. यहां रोजाना 40 ट्रेनें आती है जिसमें हजारों की संख्या में लोग व्यापार के लिए आते है. यहां हवाई अड्डा है जहां केवल दीमापुर ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्र के लोग भी आना-जाना कर रहें है. लिहाजा आईएलपी लगाने से यहां कई तरह की समस्याएं उत्पन्न हो सकती है."

इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma

एडवोकेट पाल आगे कहते है,"इस शहर में काम के लिए काफी लोग बाहर से आ रहें है. इसमें हो सकता है अवैध आप्रवासी भी हो. हम चाहते है कि नागा आइडेंटिटी को सुरक्षित किया जाए और डिमापुर का ग्रोथ भी बाधित न हो. क्योंकि नगालैंड में इतनी अधिक साक्षरता दर होने के बाद भी 15-29 वर्ष आयु वर्ग में बेरोज़गारी की दर 56 प्रतिशत है."

जबकि दीमापुर मुस्लिम कांउसिल के अध्यक्ष अहिदुर रहमान भी एडवोकेट पाल की बात से इत्तेफाक रखते हुए मानते है कि दीमापुर में आईएलपी लागू होने पर व्यापार को काफी नुकसान होगा.

वो कहते है, "दीमापुर में पिछले कुछ सालों में अस्थायी लोगों की भीड़ बढ़ी है. इस तरह की भीड़ के कारण यहां अपराध से लेकर कई तरह की परेशानियां खड़ी हो गई है. लेकिन इनको रोकने के लिए सभी को एक व्यवस्था में डाल देना ठीक नहीं रहेगा. दीमापुर में मुसलमानों का इतिहास काफी पुराना है. शहर में जो मस्जिद है वो 1906 में बनी थी. कब्रगाह उससे भी पुरानी है. लिहाज़ा पुराने बाशिंदों को मान्यता मिलनी चाहिए. हमारे पूर्वजों ने यहां के लिए बहुत कुछ किया है."

इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma

हालांकि जेसीपीआई संयोजक चोपी ग़ैर नगा लोगों की चिंता का जबाव देते हुए कहते है, "जो भारतीय नागरिक है वो यहीं रहेंगे. किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है. इंडिजेनस सर्टिफिकेट का ग़लत इस्तेमाल हो रहा है और उसे रोकने के लिए नए सिरे से इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाया जा रहा है."

दीमापुर अर्बन कांउसिल चेयरमैन फ़ेडरेशन के अध्यक्ष सेनथुंगो लोथा कहते है," जो इंडिजेनस लोग है वो इंडिजेनस की तरह रहेंगे. जो बाहर के लोग है वो बाहर के हिसाब से रहेंगे. यह व्यवस्था किसी को यहां से बाहर निकालने के लिए नहीं है."

नए सिरे से इंडिजेनस सर्टिफिकेट जारी करने को लेकर राज्य सरकार पर दबाव बना रहें सर्वाइवल नगालैंड नामक संगठन के सलाहकार टिया लोंगचर कहते है,"पहले घर-घर जाकर सर्वे किया जाएगा. अगर फिर भी इस प्रक्रिया में कोई छूट जाता है तो एनआरसी की तरह ही यहां के लोगों को भी दावे और आपत्ति के लिए पूरा समय दिया जाएगा. इसमें किसी को भी घबराने की ज़रूरत नहीं है."

इमेज कॉपीरइट Dilip Sharma

सुमिया समुदाय

नगा प्रथा के तहत नए समुदायों को अपनाने की एक और चिंता सामने आई है. दरअसल सुमी नगा जनजाति की महिलाओं के साथ काफ़ी संख्या में मुसलमान पुरुषों ने शादी की है. ऐसे में इनके बच्चों को यहां सुमिया समुदाय के तौर पर जाना जाता है.

सुमी नगा के पास यहां बड़े पैमाने में खेती योग्य ज़मीन है. हालांकि नगा स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन जैसे संगठन का कहना है कि इंडिजेनस लोगों की श्रेणी में केवल उन्हें ही शामिल किया जाएगा जो खून से नगा है.

आखिर नगालैंड के लिए दीमापुर इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया है? देश के अन्य हिस्सों में भले ही लोगों ने दीमापुर का नाम एक बड़े शहर के तौर पर नहीं सुना होगा लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के इतिहासकार इसे एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान के रूप में जानते हैं.

जापानियों के साथ युद्ध के समय ब्रिटिश की 14 वीं सेना के लिए दीमापुर मुख्य आपूर्ति डिपो हुआ करता था. इसी वजह से जापानी सेना ने दीमापुर पर कब्जा करने का लक्ष्य बनाया था. दरअसल रेलहेड के कारण दीमापुर इतना रणनीतिक रुप से अहम बन गया था. दीमापुर आज भी राज्य का आर्थिक केंद्र है.यहां के 90 फिसदी व्यापार पर गैर नगा लोगों का नियंत्रण है.

इमेज कॉपीरइट DILIP/ASSAM

लेकिन लोगों में उत्पन्न हुई इस चिंता के लिए नगालैंड सरकार का कामकाज सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है. दरअसल नगालैंड सरकार ने बिना कोई तौर तरीके बनाए सीधे इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाने का फैसला ले लिया, जिससे कई लोगों के मन में शंका उत्पन्न हो गई है.

नगालैंड सरकार का कहना है कि वह प्रदेश में जारी हुए नकली स्वदेशी निवासी प्रमाण पत्र की जाँच करने के उद्देश्य से नगालैंड के मूल निवासियों का रजिस्टर तैयार करने जा रही है.

सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक एलायंस सरकार ने दीमापुर में आईएलपी लागू करने को लेकर बनी अभिषेक सिंह कमेटी की सिफारिशों को भी मंजूरी दे दी है.

अर्थात आईएलपी लागू होने के बाद कोई भी बाहरी व्यक्ति नगालैंड सरकार की अनुमति के बिना इस शहर में प्रवेश नहीं कर सकेगा. फिर चाहे वो भारतीय नागरिक ही क्यों न हो.

दरअसल आईएलपी व्यवस्था अपने ही देश में एक आंतरिक वीजा की तरह है जिसके तहत किसी भी अन्य राज्य के व्यक्ति को अनुमति लेकर ही उस प्रदेश (आईएलपी वाले) में प्रवेश करना पड़ता है.

वैसे तो आईएलपी व्यवस्था दीमापुर जिले को छोड़कर नगालैंड के सभी 11 जिले में पहले से लागू है लेकिन अब इसे समूचे नगालैंड में अर्थात सभी 12 जिलों में लागू करने का निर्णय लिया गया है.

नेफ़्यू रियो की सरकार ने पिछले महीने 29 जून को रजिस्टर ऑफ़ इंडिजेनस इन्हेबिटेंट्स ऑफ़ नगालैंड (RIIN) को लेकर जो अधिसूचना (No.CON-3/PAP/65/10) जारी की थी उसके अनुसार 10 जुलाई से नामित टीमों को गांव और शहरी इलाकों में घर-घर जाकर लोगों के बारे में जानकारियां संग्रह करना था.

लेकिन गैर नगा लोगों ने ही नहीं बल्कि नगा समुदाय के कई संगठनों ने भी सवाल खड़े किए कि बिना किसी मोडालिटीज के सरकार यह कदम कैसे उठा सकती है.

नगालैंड के शीर्ष संगठन नगा होहो के अध्यक्ष चुबा ओज़ुकुम ने पत्रकारों से कहा,"रियो सरकार को यह फैसला लेने से पहले इस मुद्दे पर सभी स्टेकहोल्डर्स से बात करनी चाहिए थी. हम सभी नगा हैं और दूसरे राज्यों के नगा भी यहां रह रहे हैं. सरकार ने बिना कोई कट-ऑफ तारीख स्पष्ट किए सीधे अधिसूचना जारी कर दी. नगाओं को विभाजित करने की इस प्रक्रिया के दूरगामी परिणाम भी हो सकते हैं."

इमेज कॉपीरइट DILIP/ASSAM

क्या कहती है सरकार

सत्तारूढ़ नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के डिमापुर जिले के नेता डेविड नैइखा ने रजिस्टर ऑफ़ इंडिजेनस इन्हेबिटेंट्स ऑफ़ नागालैंड के संदर्भ में संपर्क करने पर एक लिखित जबाव के ज़रिए बताया, "मैंने इस विषय को लेकर पार्टी के शीर्ष नेताओं से संपर्क किया था. चूंकि यह प्रक्रिया अपने शुरुआती चरण में है और सरकारी मशीनरी द्वारा अभी तक कोई ठोस तैयारियां नहीं की जा सकी हैं, इसलिए उन लोगों ने प्रारंभिक टिप्पणी करने से मना कर दिया."

इस तरह की प्रतिक्रियाओं के बाद राज्य सरकार ने फिलहाल इस प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोकते हुए 17 जुलाई को सभी नागरिक संगठनो के साथ विचार विमर्श करने के लिए एक बैठक बुलाई है.

केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता कर रहे चरमपंथी संगठन एनएससीएन (आईएम) ने भी इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े किए है. एनएससीएन (आईएम) ने नगाओं के निहित अधिकारों के लिए सरकार के इस कदम को "विरोधाभासी" बताया है.

भारत सरकार के साथ 2015 में फ्रेमवर्क समझौता पर हस्ताक्षर करने वाले एनएससीएन (आईएम) ने एक बयान जारी कर नगालैंड सरकार की आलोचना करते हुए कहा,"सभी नगा क्षेत्रों का एकीकरण आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार द्वारा स्वीकार किया गया है जो कि नगाओं का वैध अधिकार है."

नगालैंड के सबसे बड़े सशस्त्र समूह ने इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने के विषय को उन समूहों की साज़िश क़रार दिया, जो 1960 के 16-बिंदु समझौते पर सहमत हुए थे.

इमेज कॉपीरइट DILIP/ASSAM

दरअसल 26 जुलाई, 1960 को नई दिल्ली और नगा पीपुल्स कन्वेंशन के बीच हस्ताक्षरित उस समझौते ने 1 दिसंबर, 1963 को नगालैंड के राज्य का मार्ग प्रशस्त किया था. नया राज्य पहले असम का नगा हिल्स-तुएनसांग क्षेत्र था.

नगा आबादी वाले क्षेत्रों की आजादी के लिए चली लंबी लड़ाई को ध्यान में रखते हुए नए राज्य का गठन 'भारतीय संघ के भीतर" और "विदेश मंत्रालय के तहत" करने के लिए यह समझौते किया गया था.

एनएससीएन (आईएम) ने अपने बयान में कहा," इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाने की सरकार की यह कवायद दरअसल नगाओं के निहित अधिकारों में विभाजन लाने और उन्हें कमजोर करने के लिए किया जा रहा है जबकि केंद्र सरकार के साथ शांति प्रक्रिया अंतिम निपटान पर है."

नगालैंड सरकार के अनुसार, इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर बनाने का उद्देश्य राज्य के गैर-इंडिजेनस निवासियों को नौकरियों और लाभार्थी योजनाओं के लिए इंडिजेनस निवासी प्रमाण पत्र प्राप्त करने से रोकना है.

नगालैंड के अलावा अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर और म्यांमार में 50 से अधिक नगा जनजाति हैं. एनएससीएन (आईएम) का शांति मुख्यालय दीमापुर के पास हेब्रोन में है जहां अधिकतर कैडर टांगखुल सुमदाय के है जो मुख्य तौर पर मणिपुर के उखरूल और कामपोंग जिले से है. ऐसे में रियो सरकार को इंडिजेनस लोगों का रजिस्टर तैयार करने से पहले कट-ऑफ तारीख तय करते समय काफी सावधानी बरतनी होगी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे

संबंधित समाचार