एनआईए को क्यों चाहिए और ताक़त?

  • 20 जुलाई 2019
एनआईए इमेज कॉपीरइट NIA

आतंकवादी हमलों की जांच करने वाली एजेंसी एनआईए (नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) को और ज़्यादा अधिकार देने वाला बिल सोमवार को लोकसभा में पेश हुआ.

इस पर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि अब तक एजेंसी ने जिन मामलों में जांच की है, उनमें से ऐसे 90 प्रतिशत मामलों में सफलता हासिल की है जिनमें फ़ैसले सुनाए जा चुके हैं.

मुंबई आतंकी हमलों के बाद साल 2008 के अंत में एनआईए की स्थापना के बाद से एजेंसी ने 244 मामलों की जांच की है जिनमें से 37 मामलों में फ़ैसले आए हैं.

राज्यसभा में भी बुधवार को ये बिल सर्वसम्मति से पास हो गया और दोनों सदनों में इसका कोई ख़ास विरोध देखने को नहीं मिला.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
लोकसभा में ओवैसी पर क्यों भड़के अमित शाह?

ख़तरा क्या है?

सवाल ये है कि अगर एनआईए की सफलता पहले से ही इतनी ज़बरदस्त है तो इसे और ज़्यादा अधिकार देने की क्या ज़रूरत है?

सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान के विशेषज्ञ सूरत सिंह के अनुसार, "आतंक से लड़ने के लिए राष्ट्रीय स्तर की एक जांच एजेंसी होनी चाहिए लेकिन इसे ज़रूरत से ज़्यादा अधिकार नहीं देना चाहिए."

वो कहते हैं, "मेरे विचार में विपक्ष का ये तर्क कि इसे अधिक पॉवर देने से इंडिया एक पुलिस स्टेट बन जाएगा, वाज़िब नहीं है लेकिन इसका दुरुपयोग होगा इसका बहुत बड़ा ख़तरा है."

इसी ख़तरे का इज़हार विपक्ष ने भी किया है. विपक्ष के सांसदों के अनुसार, एनआईए के पास पहले से ही ढेर सारे अधिकार हैं और अगर इस एजेंसी को और भी अधिकार दिए गए तो भारत 'एक पुलिस स्टेट की ओर बढ़ेगा और ताक़त का दुरुपयोग होगा.'

केंद्र सरकार का तर्क था कि एनआईए को ज़्यादा अधिकार देने से देश में आतंकवाद का ख़ात्मा हो जाएगा.

गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बिल संशोधन की ज़ोरदार तरीक़े से वकालत करते हुए माहौल कुछ ऐसा बनाया कि इसका विरोध करने की हिम्मत कम ही सांसदों ने दिखाई.

इमेज कॉपीरइट AFP

संशोधन पर सवाल

अमित शाह के भाषण के दौरान ऐसा एहसास हुआ कि जिसने भी इस बिल का विरोध किया उसने देश के हित में बात नहीं की. गृहमंत्री और हैदराबाद के सांसद असदउद्दीन ओवैसी के बीच तीखी बहस ज़रूर हुई, लेकिन बिल को पारित करने के समय केवल छह सांसदों ने इसका विरोध किया.

गृहमंत्री ने संसद को ये भरोसा दिलाया कि 'मोदी सरकार इसका दुरुपयोग नहीं होने देगी.' इस तरह से लोकसभा में इस बिल को पारित कर दिया गया.

नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के सांसद और प्रसिद्ध वकील मजीद मेमन कहते हैं, 'एनआईए को और भी ताक़तवर बनाने से दो तरह के दुरुपयोग की संभावना हैं. पहली, एजेंसी वाले मासूम व्यक्तियों को परेशान कर सकते हैं और दूसरी, सत्तारूढ़ पार्टी इसका इस्तेमाल अपने विरोधियों पर कर सकती है.'

मजीद मेमन कहते हैं कि एनआईए एक्ट में बदलाव लाने की ज़रूरत नहीं है.

वो कहते हैं, "भारत में राज्य स्तर पर कई जांच एजेंसियां हैं जिनका काम आपराधिक और आतंकी मामलों की जांच करना है. राज्य पुलिस के पास आतंकवाद विरोधी दस्ते हैं, केंद्र के पास सीबीआई है और इन सबने अच्छा काम किया है."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

चिदंबरम क्यों निराश?

कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को 'पिंजरे में बंद तोता' कहा था. एनआईए के ख़िलाफ़ अब तक ऐसे आरोप नहीं लगे हैं लेकिन कई मामलों में इसकी भूमिका ऐसी रही कि इसकी स्वायत्तता पर संदेह होता है और इस पर उंगलियां उठने लगी हैं.

मालेगांव, अजमेर दरगाह धमाके जैसी चरमपंथी घटनाओं में दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों से जुड़े अभियुक्तों की 'अपर्याप्त सुबूतों की कमी' के कारण ज़मानत, रिहाई, गवाहों के मुकरने के कारण ऐसे सवाल पूछे जा रहे हैं.

पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने पिछले साल बीबीसी से कहा था, "साल 2008 के अंत में मैंने एनआईए की कल्पना ऐसी एजेंसी के तौर पर की थी जिसकी प्रतिष्ठा स्कॉटलैंड यार्ड, एफ़बीआई जैसी हो, लेकिन आज एनआईए और किसी स्टेट क्राइम ब्रांच में कोई फ़र्क नहीं है. मैं बेहद निराश हूँ."

पिछले साल एनआईए अदालत ने मक्का मस्जिद धमाके के मामले में स्वामी असीमानंद समेत सभी अभियुक्तों को सुबूतों के अभाव में रिहा कर दिया था.

इमेज कॉपीरइट AFP

एनआईए की विफलताएं

उनका कहना था कि एनआईए का अब तक रिकॉर्ड मिला-जुला है. फ़रवरी में हुए पुलवामा आतंकी हमले की जांच एनएआईए कर रही है.

इसकी जांच रफ़्तार से मजीद मेमन संतुष्ट नहीं हैं, "मैंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से राज्यसभा में इस पर सवाल किया. मैंने कहा 40 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और इतने महीनों के बाद भी एनआईए की जांच अब तक जारी है. ये काम चार दिनों में हो जाना चाहिए था."

मजीद मेमन का कहना है कि वो एनआईए को अधिक पॉवर देने के ख़िलाफ़ हैं. उनके अनुसार, "एनआईए की स्थापना के 10 साल हो गए हैं लेकिन देश में आतंकी हमले रुके नहीं हैं. पुलवामा, उड़ी और पठानकोट जैसे बड़े हमले हुए हैं."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पोटा और टाडा का उदाहरण

सूरत सिंह कहते हैं, 'देश ने टाडा और पोटा जैसे आतंकवाद विरोधी क़ानून लागू किए, लेकिन इसके बावजूद आतंकी हमले नहीं रुके. उलटे पुलिस और और सरकार ने कई बार इनका ग़लत इस्तेमाल किया जिसके कारण इन दोनों क़ानूनों को ख़त्म कर दिया गया.'

सूरत सिंह कहते हैं कि उनके पास निर्दोष लोगों के मामले आए जिनके ख़िलाफ़ पोटा और टाडा जैसे क़ानून के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे.

अमित शाह ने पोटा क़ानून को ख़त्म करने पर संसद में कांग्रेस सरकार की आलोचना की थी. उनका कहना था कि इसे वोट बैंक के चलते ख़त्म कर दिया गया.

इमेज कॉपीरइट PTI

इस संशोधन से एनआईए को साइबर क्राइम, मानव तस्करी और विदेशों में भारतीयों पर हुए हमले की जांच करने की ताक़त दी गई है.

मजीद मेमन ने कहा, 'एनआईए के लिए विदेश में भारतीय या भारत के हितों पर हमले की जांच करना संभव नहीं होगा. अगर पाकिस्तान में किसी भारतीय पर हमला हुआ तो एनआईए वहां जाकर जांच कैसे करेगी?'

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार