कर्नाटक में राजनीतिक संकट पर क्या कह रहे हैं क़ानून के जानकार?

  • 20 जुलाई 2019
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Image caption कर्नाटक में भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा

कर्नाटक का राजनीतिक संकट अब संवैधानिक संकट बन गया है.

राज्यपाल वजुभाई वाला ने मुख्यमंत्री कुमारास्वामी को विश्वासमत हासिल करने के लिए दो समय-सीमाएं दी थीं. लेकिन इसके बजाए मुख्यमंत्री कुमारास्वामी ने विश्वासमत पर सोमवार को फ़ैसला कराने का फ़ैसला लिया है.

इस मामले में क़ानूनी बहस ये है कि क्या राज्यपाल को विधायिका के कामकाज में दख़ल देने की शक्तियां प्राप्त हैं?

ख़ासतौर पर तब, जब मुख्यमंत्री ने विश्वासमत का सहारा लिया है और मामले पर सोमवार या मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने की संभावना है.

सवाल यह है कि क्या राज्यपाल मौजूदा हालात को संवैधानिक तंत्र की विफलता करार देकर विधानसभा को निलंबित करने या राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा पर विचार कर सकते हैं.

क़ानून के जानकारों की अलग-अलग राय

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कर्नाटक के पूर्व एडवोकेट जनरल अशोक हरनाहल्ली कहते हैं, ''मुख्यमंत्री ने विश्वासमत हासिल करने के लिए राज्यपाल द्वारा तय दो समय-सीमाओं का पालन नहीं किया. प्रथम दृष्टया, राज्यपाल के पास सूचना है कि गठबंधन सरकार अपना बहुमत खो चुकी है.''

''उनका मानना है, सूचना ये है कि राज्यपाल अपनी रिपोर्ट केंद्र को पहले ही भेज चुके हैं. राज्यपाल सोमवार तक इंतज़ार कर सकते हैं, जब विश्वासमत की प्रक्रिया पूरी होनी है. उसके बाद राज्यपाल तय कर सकते हैं कि राष्ट्रपति शासन लगाना है या विधानसभा को निलंबित करना है.''

दूसरी तरफ़, कर्नाटक के पूर्व एडवोकेट जनरल रवि वर्मा कुमार का कहना है, ''मुख्यमंत्री जब विश्वासमत हासिल करने की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर चुके हैं, ऐसे में राज्यपाल को विधायिका में दख़ल देने का कोई हक़ नहीं है. वो केंद्र सरकार के नामित सदस्य भर हैं.''

उनका कहना है, ''राज्यपाल इस तरह से अपनी राय नहीं दे सकते. केंद्र चाहे तो राष्ट्रपति शासन लगा सकता है या विधानसभा को निलंबित कर सकता है. लेकिन विश्वासमत हासिल करने की प्रक्रिया ही एकमात्र तरीका है जिससे तय होगा कि मुख्यमंत्री ने विश्वास खोया है या नहीं.''

केंद्र दुर्भावना से प्रेरित होकर भी राष्ट्रपति शासन या विधानसभा को निलंबित करने के लिए कह सकता है. मत भूलिए कि बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह को नीतीश कुमार के मामले में अपना पद छोड़ना पड़ा था.''

ये नौबत क्यों आई

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Image caption कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर रमेश कुमार

कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर के 16 सदस्यों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था.

एक निर्दलीय सदस्य ने भी मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. कांग्रेस के साथ अपनी पार्टी (केपीजेपी) का विलय करने वाले एक अन्य सदस्य, जो मंत्री बने थे, उन्होंने भी इस्तीफ़ा दे दिया था. इसके बाद निर्दलीय विधायक और केपीजेपी के सदस्य ने बीजेपी का दामन थाम लिया था.

लेकिन विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने इस्तीफ़े मंज़ूर नहीं किए थे और कांग्रेस-जेडीएस की मांग के अनुरूप उन्हें अयोग्य घोषित भी नहीं किया था.

विधानसभा सत्र के पहले ही दिन मुख्यमंत्री कुमारास्वामी ने 'अफ़वाहों' को ग़लत बताकर दावा किया था कि उनकी सरकार स्थिर है और इसके साथ ही उन्होंने विश्वासमत की प्रक्रिया के लिए आग्रह किया था.

विधानसभा में बहुमत का सवाल आने पर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को शुक्रवार दोपहर 1.30 बजे तक विश्वासमत हासिल करने के लिए कहा था. लेकिन समयसीमा की अनदेखी होने पर राज्यपाल ने शुक्रवार का दिन ख़त्म होने तक विश्वासमत हासिल करने की प्रकिया पूरी करने का निर्देश दिया.

जब विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार ने शुक्रवार की शाम कांग्रेस विधायक दल के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से पूछा कि विश्वासमत पर मतदान कब कराया सकता है, उन्होंने कहा कि सोमवार इसके लिए मुनासिब होगा. उनका कहना था, ''अभी हमें लगभग 20 लोगों से बात करना बाक़ी है.''

इस पर विधानसभा अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री कुमारास्वामी की ओर देखकर पूछा, ''मैं जानना चाहता हूं कि इस बात पर क्या आप भी राज़ी हैं'' तो इस पर उन्होंने अपनी सहमति दी थी.

अब आगे क्या

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शुरु में ये उम्मीद की जा रही थी कि अयोग्य घोषित किए जाने की आशंका के डर से कम से कम पांच या छह बाग़ी विधायक लौट आएंगे. लेकिन सिर्फ एक बाग़ी रामलिंगा रेड्डी की वापसी हुई जिन्होंने विधानसभा में अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराई.

बीते दो दिनों के दौरान विधानसभा में हाज़िर होने वाले कांग्रेस-जेडीएस विधायकों की संख्या 98 रही, जबकि बीजेपी के 107 सदस्य विधानसभा पहुंचे. विधानसभा में कुल 224 सदस्य हैं.

कर्नाटक में सत्तारूढ़ मौजूदा गठबंधन इस समय सुप्रीम कोर्ट की ओर हसरत भरी नज़र से देख रहा है, ताकि विधानसभा में बाग़ी विधायकों की भूमिका तय हो सके.

लेकिन बीजेपी सरकार के पूर्व मंत्री सुरेश कुमार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के रुख़ से स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होगा.

लेकिन विधानसभा को निलंबित किए जाने पर, पूर्व एडवोकेट जनरल रवि वर्मा कुमार के शब्दों में, विधानसभा अध्यक्ष बाग़ी विधायकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकते हैं या उनके इस्तीफ़े भी स्वीकार कर सकते हैं.''

वहीं पूर्व एडवोकेट जनरल अशोक हरनाहल्ली का मानना है, ''जब तक कि विधानसभा अध्यक्ष उनके इस्तीफ़े स्वीकार नहीं कर लेते वो विधायक बने रहेंगे. मौजूदा सरकार के गिरने, बीजेपी को सरकार बनाने के लिए बुलाए जाने और नया विधानसभा अध्यक्ष चुने जाने पर वो चाहें तो विधायकों के इस्तीफ़े मंज़ूर भी कर सकते हैं.''

बीजेपी सरकार के पूर्व मंत्री सुरेश कुमार का कहना है कि राज्यपाल की भूमिका का पता सोमवार को ही चलेगा.

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