शिमला में बंदर विनाशक घोषित, लेकिन उन्हें मारेगा कौन? लोग या सरकार...

  • 26 जुलाई 2019
बंदर, वर्मिन, विनाशक, हिमाचल प्रदेश, शिमला, बंदर वर्मिन या विनाशक घोषित इमेज कॉपीरइट Pradeep Kumar/BBC

मार दिया जाये कि छोड़ दिया जाये, बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाये... हिंदी फ़िल्म 'मेरा गांव, मेरा देश' का यह प्रसिद्ध गाना आज शिमला के दुःस्वप्न को बयान करता है.

इसके पीछे कारण हैं, शिमला के बंदर.

कभी भारत की गर्मियों की राजधानी रही और अब दुनिया के प्रसिद्ध हिल स्टेशन के रूप में विख्यात शिमला में बंदरों की आबादी न केवल इंसानों के लिए ख़तरा बन गयी है, बल्कि हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में किसानों की आजीविका के लिए भी कठिनाइयां पैदा कर रही है.

वो लोगों पर हमला करते हैं, ख़ासकर स्कूल जाने वाले बच्चों पर. महिलाओं पर घात लगाकर हमले करते हैं, उनके बैग, सामान, चश्मा छीनते हैं. पीछा करके पुरुषों को काटते हैं. पार्किंग में खड़ी गाड़ियों की खिड़कियों और विंड-स्क्रीन को तोड़ देते हैं.

दफ़्तरों में घुसकर फ़ाइलें, रिकॉर्ड नष्ट कर देते हैं और अब इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) जैसे राज्य के बड़े अस्पताल में घुसकर मरीज़ों, कर्मचारियों और डॉक्टरों पर आक्रमण किये हैं.

अकेले जून 2019 में आईजीएमसी में बंदरों के हमले/काटने के सबसे अधिक 141 मामले दर्ज किये गये हैं. स्कूल जाने वाले एक छात्र पर बंदरों के एक समूह ने हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया, उसे पीजीआई चंडीगढ़ रेफ़र किया गया है जहां वह अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहा है. बंदरों के हमले की वजह से बीते चार सालों के दौरान शिमला में तीन मौतें हो चुकी हैं.

शिमला प्रशासन असमंजस में है कि वो वहां की गलियों में, प्रसिद्ध मॉल रोड पर टहलते लोगों की और बच्चों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करे.

बीते हफ़्ते, हिमाचल प्रदेश वन विभाग की रिपोर्ट के बाद केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने शिमला के शहरी इलाकों में बंदरों को एक साल के लिए वर्मिन (विनाशक) घोषित कर दिया है.

यह लगातार तीसरी बार है जब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने वन्यजीव (संरक्षण) क़ानून 1972 की धारा 62 को लागू करते हुए इंसानी जीवन के लिए ख़तरा बने बंदरों को मारने पर अपनी मुहर लगायी है.

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मारने का ज़िम्मा कौन लेगा?

क़ानून तो लागू हो गया है लेकिन बंदरों को कौन मारेगा? अब तक यह तय नहीं हो पाया कि बंदरों को मारने का काम किसे सौंपा जाये. शिमला की 2.60 लाख की आबादी और सैकड़ों पर्यटकों के लिए यह दिलचस्प मुद्दा है क्योंकि बंदूक उठाकर बंदरों को गोली मारने के लिए कोई भी तैयार नहीं है.

आखिर, बंदरों से धार्मिक भावनाएं जुड़ी हैं. ये हिंदू भगवान हनुमान के प्रतीक हैं. देवभूमि होने के कारण हिमाचल में बंदरों की हत्या अकल्पनीय है. लेकिन विकट समस्या यह है कि इसका कोई उपयुक्त समाधान नहीं है.

जहां तक शिमला नगर निगम का सवाल है, शिमला की मेयर कुसुम सदरेट मानती हैं कि यह एक विवादित मुद्दा है.

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इस शख़्स के गले में बसते हैं बंदर और कछुए जैसे 50 जानवर

तब भी, बंदरों के आतंक से निजात पाने की मांग की जा रही है. एक समय प्रेम कुमार धुमल के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने न केवल शिमला में बल्कि समूचे राज्य में बंदरों की आबादी नियंत्रित करने के लिए नसबंदी का कार्यक्रम चलाया था. जिसे राज्य की हाई कोर्ट से भी समर्थन प्राप्त था. कोर्ट ने तब किसी भी जानलेवा उपाय का विरोध किया था.

वन्यजीव विभाग का दावा है कि 2007 के बाद से अब तक 1.55 लाख बंदरों की नसबंदी की गयी है. बंदर पकड़ने वाले लोगों को प्रति बंदर 700 से 1000 रुपये तक की प्रोत्साहन राशि देने की घोषणा की गयी. 2015 में जब आखिरी बार गिनती की गयी थी तब बंदरों की संख्या 2.17 लाख थी.

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नसबंदी कितनी कामयाब?

बीते 12 वर्षों के दौरान वन विभाग ने नसबंदी पर 30 करोड़ रुपये खर्च किये हैं. इसने 8 नसबंदी केंद्र खोले हैं. इस साल 20 हज़ार बंदरों की नसबंदी का लक्ष्य रखा गया है.

हालांकि, इससे समस्या से छुटकारा नहीं मिला. हर सुबह जब बंदरों की सेनाएं सुबह अपने भोजन की तलाश में निकलती है तो वो स्कूली बच्चों पर उनके बैग में टिफिन या खाना है यह जानकर हमला करती है.

दफ़्तर जाने वाले या सुबह टहलने निकले लोगों पर भी ये हमले करते हैं. उनमें से कई लोग इन हमलों में घायल हो गये.

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दुनिया के पहले क्लोन बंदर

बंदर के इन समूहों में उनके छोटे बच्चे भी साथ होते हैं. यह स्पष्ट संकेत है कि नसबंदी के दावे एक मज़ाक हैं.

आपसी प्रतिद्वंद्विता में बंदरों के दो समूह आपस में लड़ते भी हैं और इसके बाद वो इंसानों को अपना सॉफ़्ट टारगेट बनाते हैं.

सेवानिवृत वन संरक्षक प्रमुख वीपी मोहन मानते हैं, "नसबंदी पूरी तरह से अप्रभावी और लोगों के पैसों की बर्बादी है. बंदरों की समस्या का एक मात्र समाधान उन्हें मारना है. जनता न उन्हें मारने के लिए तैयार है और न ही सुसज्जित. समाधान वन विभाग को ही करना चाहिए. हम उस समस्या की तरफ बढ़ रहे है जहां शिमला में रहना एकदम असंभव हो जायेगा. बुर्ज़ुग और बच्चे अपने घर की छत पर मज़े में टहलने के बारे में सोच भी नहीं सकते."

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रिकॉर्ड हमले

इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध आंकड़े सभी को चौंका देंगे. 2015 से अब तक बंदरों के हमले/काटने के मामलों की संख्या ख़तरनाक दर से बढ़ी है.

2015, 2016, 2017 और 2018 की तुलना में जून 2019 में 141 ऐेसे मामले दर्ज किये गये, जो कि अब तक किसी एक महीने में रिपोर्ट की गयी अधिकतम संख्या है. ऐसे सबसे कम मामले दिसंबर 2015 में 13, नवंबर 2017 में 15 और जनवरी 2019 में 21 दर्ज किये गये थे.

आईजीएमएस शिमला के वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक जनक राज बताते हैं, "इस दौरान एक महीने में दर्ज किये गये मामलों की संख्या 97 और 84 भी रहे."

रेबीज़ यानी कुत्तों और बंदरों के काटने से फैलने वाले जानलेवा वायरस के इलाज को बेहद सस्ता और आम आदमी की पहुंच तक लाने के अपने अनूठे काम से पद्मश्री पुरस्कार हासिल करने वाले शिमला के एपिडेमीओलॉजिस्ट डॉक्टर ओमेश कुमार भारती कहते हैं, "बंदर के काटने के मामले चिंताजनक हैं. हमारे पास एंटी रेबीज़ क्लिनिक में हर दिन तीन से चार मामले आते हैं. मेरे शोध ने यह साबित किया है कि बंदरों का काटना रेबीज़ मुक्त नहीं है. लिहाज़ा, समस्या वाकई बहुत गंभीर है."

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क्यों बढ़ी बंदरों की आबादी?

सवाल यह है कि बंदरों के हमलों में इज़ाफ़ा क्यों हुआ. कई कारण गिनाये जाते हैं. लेकिन दो कारण बिल्कुल स्पष्ट हैं. बंदर और इंसान दोनों की आबादी शहर में रह रही है.

बंदर जंगल छोड़ कर शहर में आ गये हैं. वे साल में तीन बार प्रजनन करते हैं लिहाजा उनकी आबादी में हर साल तीन गुना वृद्धि हो रही है.

प्रख्यात न्यूरो सर्जन डॉक्टर जनक राय सुझाव देते हैं, "खानपान की उनकी आदतें भी बदल गयी हैं. वे पके हुए खाने, बर्गर, ब्रेड, मोमो, पिज्जा और आइसक्रीम खा रहे हैं. भूखे होने पर वो भोजन की चाह में इंसानों पर हमले करते हैं. हिमाचल में बंदरों को खिलाने पर प्रतिबंध है लेकिन मुझे नहीं लगता कि कभी किसी पर इस बाबत मामला दर्ज किया गया या दंडित किया गया है. उन्हें खाना देना बंद करना होगा."

प्रासंगिक सवाल अभी तक बना हुआ है कि बंदरों को कौन मारेगा?

शिमला के शहरी और ग्रामीण इलाकों में बंदरों को मारा जाये इससे वन्यजीव विभाग सहमत नहीं है.

मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉक्टर सविता के अनुसार बंदरों को वर्मिन (विनाशक) घोषित करने का मतलब यह नहीं है कि बड़ी संख्या में उन्हें मार दिया जाये. यह पर्यावरण मंत्रालय का किया गया एक विशेष उपाय मात्र है.

अगर बंदर इंसानी ज़िंदगी के लिए ख़तरनाक हो रहे हैं तो इस क़ानून के तहत लोगों को उन्हें जान से मारने की आज़ादी प्राप्त है.

अगर बंदर वर्मिन नहीं घोषित किये जाते तो ऐसा करने पर क़ानून के अनुसार लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज किया जाता. हिमाचल प्रदेश में 91 तहसील और शिमला शहर में बंदरों को वर्मिन घोषित किया गया है.

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दोबारा जनगणना होगी?

बंदरों की समस्या के समाधान की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हिमाचल किसान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर कुलदीप तंवर कहते हैं, "यह निहायत ही बेतूका है कि केवल बंदरों को वर्मिन घोषित कर समस्या से अपना पल्ला झाड़ लिया गया है."

तंवर कहते हैं, "बंदरों की वजह से यहां हर साल क़रीब 2,000 करोड़ रुपये की फ़सल बर्बाद होती है. किसानों ने खेती छोड़ दी है. वो बंदरों से अपनी फ़सलें नहीं बचा सकते. शिमला में तो यह समस्या और भी विकराल है. हर दिन बंदरों के हमलों के आंकड़े देखिये. स्कूल जाते बच्चे को ये चबा गये, वो बुरी तरह घायल होकर अस्पताल में अपने जीवन-मौत का संर्घष कर रहा है. उन्होंने जीवन को नरक बना दिया है."

भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी कुलदीप तंवर ने बीबीसी से कहा, "जब तक मेडिकल रिसर्च के लिए बंदरों के निर्यात पर केंद्र के लगाये प्रतिबंध को हटाया नहीं जाता या उन्हें मारा नहीं जाता, ये समस्या नहीं सुलझने वाली."

उन्होंने कई देशों का उदाहरण देते हुए बताया कि जंगली जानवरों की जनसंख्या नियंत्रण रहे इसके लिए वहां का क़ानून उन्हें मारने की अनुमति देता है.

राज्य के मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर भी बंदरों की समस्या से काफी परेशान हैं और मानते हैं कि नसबंदी से अब तक कोई ठोस समाधान नहीं हुआ. यहां तक कि उन्हें वर्मिन घोषित करना भी समस्या का हल नहीं है.

मुख्यमंत्री कहते हैं, "यह समस्या है और साथ ही चुनौती भी. हमें छोटे मोटे उपायों की जगह इस समस्या से निपटने के उचित समाधान के बारे में सोचना होगा."

वन्यजीव विभाग के 2015 के सर्वे में बंदरों की संख्या 2,07,614 बतायी गयी थी जो 2013 के 2,24,086 के मुक़ाबले कम थी. लेकिन, इन आंकड़ों पर संदेह है इसलिये विभाग ने नई जनगणना का प्रस्ताव दिया है.

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एक बंदर ऐसा जिसे बकरी से प्यार हो गया!

वही सवाल अब भी बरकरार

कुछ समय पहले इको टास्क फोर्स को बंदरों को मारने का काम सौंपाने का निर्णय लिया गया. अगर पंचायत ने इसकी मांग की तो टास्क फोर्स बंदरों को मारने में मदद करेगा. वन विभाग सुविधायें और उपकरणों को उपलब्ध करायेगा.

शिमला की मेयर शूटर्स को काम पर रखने की बात भी करती हैं. किसी पूर्व सैनिक को यह ज़िम्मेदारी सौंपने की बात की जा रही है. लेकिन आखिर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा?

एक प्रस्ताव यह भी है कि बंदरों को पकड़ कर पूर्वोत्तर के राज्यों में भेजा जाये लेकिन नागालैंड और मिजोरम ने इसके लिए मना कर दिया.

शिमला की जानी मानी शख्सियत और 'घोस्ट स्टोरीज़ ऑफ़ शिमला' की लेखिका मीनाक्षी चौधरी कहती हैं, "20-25 साल पहले बंदरों को शिमला का अभिन्न अंग माना जाता था. शिमला के बंदरों का (ईजे बक की लिखित) 'शिमला, पास्ट एंड प्रेजेंट' जैसी किताबों में उल्लेख है. आज यह दु:स्वप्न और बेहद दुखद कहानी है. इसका हल जितनी जल्दी हो सके, ढूंढा जाना चाहिए."

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