कारगिल के 20 साल पूरे होने पर गुरमेहर कौर के सवाल

  • 28 जुलाई 2019
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गुरमेहर कौर के पिता कैप्टन मंदीप सिंह भारतीय सेना में थे और कारगिल की जंग के दौरान वह मारे गए थे.

साल 2017 में गुरमेहर ने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर शेयर की थी जिसमें कहा गया था कि 'पाकिस्तान ने मेरा पिता को नहीं मारा, जंग ने मारा था.' इसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी ख़ासी आलोचना की गई थी.

गुरमेहर कौर ने कारगिल की लड़ाई के 20 साल पूरे होने पर बीबीसी उर्दू के लिए एक ब्लॉग में अपने विचार साझा किए हैं.

आगे पढ़े गुरमेहर कौर ने क्या लिखा है..

इस बात को कितने साल बीत चुके हैं, हमारे घर में कोई भी इसका हिसाब नहीं रखता है.

हां, अगर कभी ये बताने की ज़रूरत पड़ ही जाए कि ये घटना कब हुई थी तो हम लोग मेरी बहन से उसकी उम्र पूछ लेते हैं क्योंकि ऑपरेशन विजय की कामयाबी के चंद दिनों बाद हमारे पिता की मौत हुई थी. उस वक़्त हमारी छोटी बहन सिर्फ़ तीन महीने की थी.

उन गुज़रे सालों का हिसाब हमारी बहन की हड्डियों में लिखा हुआ है क्योंकि इतने वक़्त के दौरान उसके छोटे-छोटे बाज़ू और टांगें बहुत बड़ी हो चुकी हैं और वह तीन माह की बच्ची अब किशोरी बन चुकी है.

इन 20 सालों में हमने कभी उसकी ज़ुबान से उस घटना के बारे में एक लफ़्ज़ भी नहीं सुना. हम जब भी उस बारे में बात करते हैं, उससे कुछ पूछते हैं तो जवाब में वह मुश्किल से चंद शब्द ही कह पाती है और हल्के से सिर हिलाकर हां में हां मिला देती है.

मैं और मेरी मां उन मुट्ठी भर यादों का सोचकर ख़ुश हो जाते हैं जो हमारे पास बचे हैं.

हम दोनों उन दिनों की धुंधली तस्वीरों में मेरे पिता का चेहरा देखकर अर्थ तलाश करते हैं लेकिन ये तस्वीरें मेरी बहन के लिए सिवाए एक उदासी के कुछ नहीं हैं. वह कभी कुछ नहीं कहती और हमने भी कभी उसे मजबूर नहीं किया कि वह बात करे.

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मेरी मां से ग़म की उम्मीद की जाती है

आज जब भारत हर साल 26 जुलाई को 'कारगिल विजय दिवस' का जश्न मनाता है तो हम भी उसमें शामिल हो जाते हैं, पाकिस्तानी घुसपैठियों के ख़िलाफ़ हमारी बड़ी जीत का जश्न जो हमने 1999 में हासिल की थी.

बीते चंद सालों से जुलाई हमारे लिए एक ऐसा महीना बन चुका है जब ग़ैर सरकारी संगठन, राजनेताओं, लेडीज़ क्लब और इन जैसे अन्य लोगों की ओर से दावत मिलनी शुरू हो जाती है.

हर कोई चाहता है कि मेरी मां उनके समारोहों में शामिल होकर अपने साहस और बहादुरी के गुण गाएं और लोगों को बताएं कि वह अभी तक किस बहादुरी से ज़िंदगी का मुक़ाबला कर रही हैं.

मेरी मां अकसर उन समारोहों में जाने से कतराती थीं कि वहां उनसे उम्मीद की जाती है कि वह अपने ग़म को खुलकर बताएंगी, इतना खुलकर कि वहां मौजूद लोग उन्हें ग़ौर से सुनें.

वह लोगों की उम्मीद की वजह से दो हिस्सों में बंट जाती हैं. एक वह हिस्सा है जो अपने पति की याद में उनके बारे में होने वाली चर्चाओं में शामिल हो जाता है और दूसरा वह जो समझता है कि वह हमारे पिता के बारे में जितनी ज़्यादा बात करेंगी, वह उतने ही ज़्यादा याद आएंगे और हमें अपनी जिंदगी में उनकी कमी ज़्यादा महसूस होगी.

लेकिन मेरी सोच मेरे मां से हमेशा अलग रही है.

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मैंने ये कभी नहीं चाहा कि मैं समारोहों में जाकर अपने दुखों की खुलकर नुमाइश करूं. अपनी कहानी वहां आई हुई आंटियों को सुनाऊं और वह प्यार से मेरे गाल पर चुटकी काटकर मुझे एहसास दिलएं कि मैं किस क़दर बदक़िस्मत हूं. एक ऐसी बेटी जिसका पिता अब उसके पास नहीं है.

फिर उसके बाद आंटियां मुझे अपनी गोद में उठा लें, मुझे दिलासा दें और यूं अपने बारे में अच्छा महसूस कर सकें. ख़ैरात में हमदर्दी मुझे पसंद नहीं.

पाकिस्तानी फ़ौज से अपनी चौकियां छुड़ाए हुए अब हमें दो दशक गुज़र चुके हैं. लेकिन घाटी में बेचैनी अब भी उतनी ही है जैसी हमेशा रही है. संघर्ष विराम की घोषणाएं हो चुकी हैं लेकिन हिंसक कार्रवाइयां अब भी जारी हैं.

उस वक़्त से लेकर अब तक, कश्मीर में फ़ौज की तैनाती में कभी कोई कमी नहीं हुई है, फ़ौजियों और आम शहरियों के मारे जाने की संख्या बढ़ती ही जा रही है.

हालांकि, भारत और पाकिस्तान की इस आख़िरी लड़ाई को सिर्फ़ 20 साल हुए हैं लेकिन ये विवाद बंटवारे के वक़्त से जारी है.

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कारगिल की लड़ाई में ‘ये दिल माँगे मोर’ बोलकर विक्रम बत्रा हर युवा सैनिक का चेहरा बन गए थे.

'नेता पास तस्वीरे खिंचवाते हैं'

भारत में ये बात हमारे दिलों में शामिल की जा चुकी है कि कश्मीर हमारा अटूट अंग है और पाकिस्तान में ये बात दिलों में भर दी गई है कि कश्मीर बंटवारे का वो एजेंडा है जो अभी तक पूरा नहीं हुआ है. नतीजा ये है कि दोनों देशों के बीच रस्साकशी जारी है और कोई भी पक्ष नहीं चाहता कि उसका कोई हल तलाश करे.

बीते दस सालों में दोनों देशों के प्रधानमंत्री कई बार मुलाक़ात कर चुके हैं लेकिन उनकी तरफ़ से तस्वीरों के अलावा कुछ नहीं आया.

मेरे हिसाब से वक़्त आ गया है कि इन राजनेताओं को बताया जाए कि हमारे लिए उनकी वह तस्वीरें और वीडियो किसी काम के नहीं जिनमें वह या तो एक दूसरे से गले मिलते हुए दिखाई देते हैं. जब यह नेता यह खेल नहीं खेल रहे होते हैं तो एक दूसरे के ख़िलाफ़ नफ़रत के अंगारे उगल रहे होते हैं.

इससे न तो हमारा कोई मक़सद पूरा होता है और न ही हमारे ज़ख़्मों पर मरहम लगता है.

नियंत्रण रेखा न एक इंच इधर हुई है और न ही एक इंच उधर हुई है. लेकिन जैसे-जैसे साल गुज़र रहे हैं सीमा के आर-पार फ़ायरिंग जारी है और इस विवाद को ज़िंदा रखने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा पैसा ख़र्च किया जा रहा है.

जैसे-जैसे हिंसा बढ़ रही है लोगों के ख़ौफ़ में इज़ाफ़ा हो रहा है और इस सवाल का जवाब तलाश करना ज़रूरी हो गया है कि आख़िर ये सब कुछ कब और कहां जाकर रुकेगा?

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